माधव कौशिक समकालीन हिंदी कविता में सांस्कृतिक अस्मिता
से उपजे गतिरोध को लेकर चिंतित दिखाई देते हैं| चिंता की यह
स्थिति अनावश्यक नहीं है| दरअसल यथार्थ परिदृश्य को प्रकट करने के चक्कर में कवियों
का एक बड़ा वर्ग प्रायोजित लेखन के लिए विवश हुआ है, जो अनघटी घटनाओं को भी केन्द्र
में लाकर विमर्श का मुद्दा बना देना चाहता है| पाठक की नजर में वे प्रायोजित मुद्दे
तो कहीं दिखाई नहीं देते, जिस पर हो-हल्ला मचाया जाता है, कविता भी संशय के दायरे
में आ जाती है| यथार्थ की अंधी दौड़ में आदर्शता की उपस्थिति कमतर न हो, इस दृष्टि
से समकालीन हिंदी कविता में माधव कौशिक की रचनाधर्मिता विशिष्ट है| यहाँ विशिष्टता
का पैमाना श्रम-संस्कृति की वह अनिवार्यता है जहाँ रचनाकार जन और जमीन से जुड़कर
चलता है| माधव कौशिक की कविताएँ हमारे समय की वह आईना हैं जिसमें सम्पूर्ण युग-बोध
समाहित है|
माधव कौशिक कविता की जमीन पर “कैंडल मार्च” की वेबसी के साथ
समय की निरंकुशता और मनुष्य की पशुविक प्रवृत्ति की विसंगतियों को लेकर पाठकों के
सामने उपस्थित हुए हैं| इस संग्रह में केन्द्र समाज है तो परिधि में परिवेश और
प्रकृति| कविताई की सहज सम्प्रेषण के साथ यहाँ जन, जीवन और कविता को लेकर कवि का
पक्ष स्पष्ट है| स्पष्टता में एक तरलता है, प्रवाह है, रचनाधार्मिता की श्रमशील
निर्वाह है| इस तरह का निर्वाह आज की हिंदी कविता में कम दिखाई देती है| जो है वह
निश्चित ही भीड़ से अलग है और अलग होने में पूरे समय के वैभवशाली होने की सम्भावना
बढ़ गई है| ऐसा इसलिए क्योंकि “भीड़ में से जब भी/ कोई इक्का-दुक्का आदमी/ सभी
कतारें तोड़कर/ अलग से चलने लगता है/ तो निरीह पगडण्डी भी/ राजमार्ग लगने लगती है|”
पगडंडियों पर चलते हुए राजमार्ग बना जाने की चाह इस संग्रह की कविताओं का मूल
उद्देश्य है|
राजमार्ग ‘खास’ का न होकर आम का हो ये स्वप्न माधव कौशिक का है| आम संघर्ष की
जमीन में लोट-पोट कर बड़ा हुआ होता है| धूल-कण में सनकर खड़ा हुआ होता है इसलिए समय
की विसंगतियों से लड़ना उसे अच्छी तरह आता है| यदि तमाम उपेक्षाओं के बावजूद वे चुप
हैं तो यह उनके लोक का संस्कार है जो उतापात मचाने से उन्हें रोकते हैं| इसलिए भी
क्योंकि निजी स्वार्थ से अधिक इन्हें दूसरों की जरूरतों का ख्याल रहता है| दूसरे
यदि इन्हें पागल और नासमझ समझें तो यह भी सच है कि “लालकिले की प्राचीरें/ झुक
जायेंगी उनके बोझ से/ संगीनों से थर्रा उठेंगें कंगूरे/ बिगुल की आवाज़/ सनसनी फैला
देंगी/ दीवाने आम में/ इक्कीस तोपों की गर्जना/ हिला देंगी/ जर्जर जनतंत्र की
चूलें/ स्वतंत्रता दिवस गौरवपूर्ण/ तो है ही/ मर्मांतक भी कम नहीं|” क्योंकि कितने
ही स्वप्नों की भ्रूण को साकार होने से पहले ही निरर्थकता के कगार पर छोड़ दिया गया
है| प्रतिभावों को तोड़-मरोड़कर कूड़ेदान फैंकने लायक बना दिया गया है| जो तो कुछ
प्रतिरोधी स्वभाव के थे उनके लिए पहरे इस कदर कड़े कर दिए गये हैं कि उनकी
हंसी-मुस्कराहट-आँसू सबके हिसाब-किताब लिए जा रहे हैं| सब सीसीटीवी कैमरे की जद और
हद में हैं| थोडा भी विरोध में हुए कि लटकाए गये| कवि ‘मुनादी’ के माध्यम से “वक्त
के अंधे अक्षरों में लिखा फरमान” जारी करता है और संशय के दायरे में जनधर्मी
प्रवृत्ति के पोषक लोगों से अपेक्षा करता है “कि तुम हंसो/ मगर तुम्हारी हँसी/
अधरों से बाहर न टपके/ रोओ किन्तु आँसू/ पलकों की दहलीज न लांघें/ गाओ लेकिन तुम्हारी
आवाज़/ हलक में तड़पती रहे/ जीओ लेकिन मृत्यु-शैया पर/ काल के गाल में रहते हुए/
अतिक्रमण करो काल का|” इस तरह ही प्रतिरोध की संस्कृति बची रह सकती है अन्यथा तो
बोलने वालों को एक-एक कर या तो गायब किया जा रहा है या फिर मार ही दिया जा रहा है|

एक सच यह भी है कि जन की सुरक्षा में सक्रिय तन्त्र जिस तरह से जन-सम्भावनाओं
पर कुठाराघात करते हुए जीवन-जरूरत के मुद्दों को गायब किया है समाज तो आतंकित है
ही समय भी पनाह मांग रहा है| तन्त्र-पिंजड़े में सुरक्षित नर-पशुओं के नंगे नाच से
पूरी बस्ती हैरान और हतप्रभ है| लोक लज्जित है और जन असुरक्षित है| सांड बने घूम
रहे तन्त्र के नुमाइंदे घुन की तरह भारतीय परिवेश की शालीनता और स्वर्ग के समान
आभासित होने वाले भविष्य को निगल रहे हैं| हम हैं कि इस ‘झूठी उम्मीद’ में कि “कहीं
से तो किरण कोई/ हमारे घर में आयेगी/ कहीं से तो कोई बदली/ हमारे मन पे छायेगी/
कहीं से तो कोई सूरज/ हमारे दिल में निकलेगा/ कहीं से तो कोई चन्दा/ अंधेरी रात
बदलेगा/ कहीं से तो कोई/ ऐसा फ़रिश्ता घर में आयेगा/ हमारे दर्द की चट्टान को/ पल
में गिराएगा/ इसी उम्मीद पर/ बैठे रहे हम
लोग जीवन भर|” और इसके बाद हम तो चले गये या चलते बनते हैं लेकिन इस प्रकार की
‘झूठी उम्मीद’ का परिणाम आने वाली पीढ़ियों को भुगतना पड़ता है|
यह अपनी तरह का सच है कि जनसामान्य की उपेक्षा से राजभवन
कभी चिंतित नहीं होता| जितना जन उपेक्षित और प्रताड़ित होता है जनप्रतिनिधि उतना ही
फलता और फूलता है| जन उपेक्षा में अपनी सुरक्षा तलाशने वाली सत्ता क्यों चाहेगी कि
सामान्य विशिष्ट की भूमिका में रेखांकित हो? कभी आकर्षण के लिजलिजे में फंसकर तो
कभी हाशिए पर जाने के दुहस्वप्न से साधारण आदमी भी मजबूर होकर तन्त्र की ढाल बनना
स्वीकार कर लेता है| यह दौर है भी ऐसा जहाँ “उठा पटक को कोई बुरा नहीं कहता है/
सारे सच के साथ खेलते/ आँख-मिचौनी/ धक्का मुक्की करने/ में सबके सब अव्वल/ सर से
पानी गुजर रहा है/ या आँखों का पानी बिलकुल/ सूख चुका है” यह निर्धारण कर पाना
मुश्किल हो गया है|
कवि परछाहीं की तरह
हर दृष्टि से जन के समर्थन और साथ में होता है| रचनाकार ही है जो जोखिम उठाकर भी
उसकी सम्भावनाओं को जिन्दा रखने का उपक्रम करता है| कवि के इस उद्घोस पर, “कोई तो
हो जो/ व्यवस्था के बिगडैल सांड के/ सींगों में/ विश्वास का फंदा डालकर/ बीच
चौराहे के/ धराशायी कर दे उसे” सदियों से उपेक्षित होता आया लोक अपनी गरिमा के साथ
उठ खड़ा हुआ है| दलित, आदिवासी, और अन्य अनेक उपेक्षित-दमित वर्गों से अटा पड़ा वही
लोक, जिसे पूंजीपतियों और कार्पोरेट घरानों के रहीशों द्वारा उपेक्षा की तपती
भट्टियों में तपाकर पंगु बना देने की साज़िश रची जा रही थी, लामबंद होकर शोषण के
खिलाफ बिगुल बजा दिया है| यह सच है कि इन सभी के लामबंद होने से भारतीय समाज में-
“एक दिन वह भी आया/ जब सारी घुटन/ सड़कों पर आक्रोश के लावे/
में तब्दील हो कर/ धधक उठी/
अधनंगे लोगों के अस्थि
पंजर/ बख्तरबंद गाड़ियों के/ परखचे उड़ाने दौड़ पड़े/
कटे हुए हाथ/ तलवारों में बदल कर/ टूट पड़े/ सत्ता की
मीनारों पर/
और देखते ही देखते/ लोक ने
लोक के लिए/ लोक के द्वारा/ कई अलौकिक लोगों को/ परलोक भिजवा कर ही दम लिया|”
अलौकिक को परलोक में भिजवाने का क्रम अनवरत जारी है| यह इसी का परिणाम है कि
आए दिन ऐसे भ्रष्टाचारियों का विरोध किया जा रहा है जो जनता को कंगाल बनाने में
अपनी कोई कसर बाकी न रखे| उन आतताइयों को खींच कर बाहर किया जा रहा, जिनके शरीर पर
आम आदमी की आशाओं एवं आकांक्षाओं के विनष्ट होने के दाग हैं| उन्हीं की हथियार से
उन्हें भरी सभा में नंगा कर बेनकाब किया जा रहा है, जो मान बैठे थे, इस देश के लोग
सब कुछ बहुत जल्दी भुला बैठते हैं| ऐसा मानने वालों को शायद यह नहीं पता है कि
“वक्त बहुत बेचैन/ बहुत ही दुखी/ बहुत गुस्से में है/ वक्त के सब्र का/ पैमाना भर
गया कब का/ वक्त की आँख से/ आँसू नहीं/ लहू टपका” जो उनकी परिधि बताने और लोक को
उसकी शक्ति-सामर्थ्य दिखाने के लिए महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रही है| ध्यान देने
की बात है ये कि आँसू गिरने में तो कलेजे के सभी अंश तड़प उठते हैं, लहू टपकने की
स्थिति में समय के क्या हालात हैं इसका अंदाजा लगाया जा सकता है| देश और समाज के
हालत-हालात तो ऐसे हैं कि “अब किसी मजलूम के हक़ में/ कोई कब बोलता है/ अब किसी की
चीख सुनकर/ कौन कब दर खोलता है/ अब शहर के लोगों की खुदगर्जियाँ/ बढ़ने लगी हैं/ अब
ज़रा सी बात पर ही/ त्योरियाँ चढ़ने लगी हैं/ शाम को घर लौट आना/ एक सपना हो गया है/
चैन शायद भीड़ में/ बालक सरीखा खो गया है/ अब कहाँ सच्चा सही इंसान/ मिलता है यहाँ
पर/ अब बता इंसानियत का/ फूल खिलता है कहाँ पर|” प्रश्न की ऐसी मुखरता से इस अकाल
पड़ते समय में वक्त का इस तरह मानवीयता के उलट खड़ा होना कवि की भूमिका को और अधिक
बढ़ा देता है|
कवि लोक की सक्रियता पर नजर रखता है|
वह देखता है कि लम्बे अरसे तक सब कुछ भूल कर जीवन-यापन की दैनिकी में व्यस्त होने
वाले लोक को अब सब कुछ याद रखने की जिजीविषा स्पष्ट दिखाई दे रही है| यही लोक
भविष्य की सम्भावनाशील प्रवृत्तियों की तलाश में “आने वाला कल भी अपना/ कल से बेहतर होगा’ की उम्मीद लिए सीधे
सम्वाद के लिए निकल पड़ा है| लोक की यथास्थिति को सुधारने के लिए प्रतिबद्ध ऐसे
व्यक्तियों में जो उत्सुकता है, उसमें राह आसान है और मंजिल पास| इस राह में निकल
पड़े लोगों के अन्दर की उत्सुकता को देखकर कवि का यह कहना वाजिब है कि “कभी न कभी/
शांत हो जाता है ज्वार/ थम जाती हैं तूफानी हवाएं/ जम जाती हैं तलछट/ कभी न कभी/
टूट ही जाता है सन्नाटा/ पिघल जाती है बर्फ/ चरमराकर/ खुल जाते हैं कपाट/ कभी न
कभी/ फूट ही पड़ता है लावा/ बह निकलता है आक्रोश/ चीख उठता है आदमी|” आदमी का चीखना
नियतिवाद के प्रति विद्रोह की भावना का प्रथम चरण माना जाता है| इस चरण में अतीत
कम वर्तमान अधिक मायने रखता है| भविष्य इस हद तक विचलित नहीं करता कि वह सुरक्षित
रहेगा अपनी स्थिति तक, खासकर तब जब अतीत को साधता हुआ वर्तमान संतुलित रहता
है|
वर्तमान को
सुन्दर और सुदृढ़ बनाने में जुटा भारतीय समाज आज जड़ रूढ़ियों को समाप्त कर देना
चाहता है| विभाजनकारी और अलगाववादी प्रवृत्तियों पर अबिलम्ब रोक चाहता है|
राजनीतिक और अन्य कारणों से संकीर्णता की विभीषिका में जकड़ा समाज स्वतंत्र होकर
मनुष्यता के पक्ष में खड़ा होना चाहता है| कवि भी यही चाहता है| समाज के चाहने में
कवि का अटल विश्वास है कि “चाहे सैकड़ों, हज़ारों वर्षों बाद सही/ ये सभी लकीरें मिट
जायेंगी/ समाप्त हो जायेंगी/ ये सारी सीमाएं/ मनुष्य और मनुष्यता के मध्य/ सिवा
मनुष्यता के/ हो भी क्या सकता है” और यथार्थतः कुछ होना भी नहीं चाहिए यदि
मनुष्यता की स्थायित्व को प्राप्त कर लिया जाय तो| दरअसल सारी कोशिशें तो मनुष्यता
की भावभूमि को स्पर्श करते हुए उसे विकसित करने की ही है| आदर्श स्थिति में तो हम
दिखाई देते हैं मनुष्यत्व के रंग में लेकिन जब यथार्थ का अवलोकन करते हैं तो विवश
होना पड़ता है और आगे बढ़ते रहने के लिए|

इस संग्रह की अधिकांश रचनाओं के सहारे आदर्श और यथार्थ के मध्य गुम हो रही
मानवीयता की वर्तमानता को सुनिश्चित करना कवि अपना कर्तव्य समझता है| मानव-मूल्यों और
मानवीय-संबंधों की गरिमा बरक़रार रहे इसके लिए शास्वत संवाद की भूमिका को बनाए रखना
आवश्यक मानता है| कवि के समय का यथार्थ तो ये है कि “जीवन की बुनियादी बातें/ धीरे-धीरे बदल रही हैं/ धीरे-धीरे
बदल रहा है/ जीवन से जीवन का रिश्ता/ धीरे-धीरे लोग, पुरानी/ जड़ों से अपनी उखड़ रहे
हैं/ रहते हैं महलों में लेकिन/ अपने मन से उजड़ रहे हैं|” मन से उजड़े हुए यही लोग
विषबेल की तरह समाज में छाते हैं और फिर एक दिन पूरा परिवेश संक्रमण और विखंडन के
मार्ग पर निकल पड़ता है| ऐसी स्थिति में कवि स्वयं को जीवन के “सबसे मुश्किल मोड़
पर” पाता है| ऐसे मोड़ सांस्कृतिक शून्यता और सामाजिक गिरावट के धुंधली तस्वीर पेश
करते हैं जहाँ “तीसरी दुनिया की/ सारी भूख को दिल में समेटे/ और अफ्रीका के अंधे
जंगलों से/ आदिवासी लोगों की चीत्कार लेकर/ मिस्त्र के बाज़ार से गाती तवायफ/ युद्ध
में मारे गये/ इराकी लोगों के जनाजे/ और काबुल में हज़ारों/ तोप के गोले उठाये/ वक्त
के कन्धों को/ झुकता देखता हूँ/ देखता हूँ सैनिकों की लाशें/ उल्टी बंदूकें उठाये/
फौजियों के सख्त चेहरे/ देखता हूँ मैं/ शिखर-सम्मेलनों में मुस्कुराते/
राजाध्यक्षों की कतारें/ ड्रोन के हमलों में घायल/ पक्षियों की चीख/ सुनकर चौंकता
हूँ/ रोज दहशतगर्द/ दुनिया के बदन को नोच खाते/ रोज पागलपन का तांडव/ देखता हूँ हर
जगह पर” तो यह शक गहरा उठता है कि क्या हम हैं भी मनुष्य लोक में? क्या हम उसी
समाज में हैं जिसे बनाने में सदियों गुजार दी गईं? स्वस्थ और समृद्ध सामाजिक
परंपरा वाले उसी भूमि पर हैं जहाँ आने के लिए देवता भी तरसा करते हैं?
इस संग्रह की कविताओं को पढ़ते हुए यह स्पष्ट होता है कि समझ के धरातल पर कवि
एक विशेष प्रकार की जिम्मदारी लिए पदार्पण करता है तो इस जिम्मदारी से अनवरत
संघर्ष की राह का ही चयन करना श्रेयस्कर समझता है| जुगाड़ और जुमले की प्रवृत्ति में विश्वास न
करके श्रम की अनिवार्यता को चिह्नित करना कवि का उद्देश्य रहा है| यही वजह है कि इस कवि को न तो वाम खांचे में फिट करके देखा जा सकता है और
न ही तो राष्ट्रवादी खांचे में| माधव इन दोनों खेमों की
राजनीतिक नारों से कहीं अधिक जरूरी समझते हैं कि मानवीय तरलता का पक्ष रखा जाए|
माधव कौशिक मानते हैं कि राजनीतिक पार्टियों के पक्ष-विपक्ष में खड़े होने से अधिक
“ठीक तो यही
रहता/ कि हम/ मौसम के मिजाज को सुरक्षित रखते/ सहेज कर रखते/ वनस्पतियों का हरापन/
हवाओं की सौंधी सीलन/ बचा कर रख पाते/ पृथ्वी का कौमार्य/ गगन का सौभाग्य/ कितना
अच्छा होता/ यदि मनुष्य/ बना रहता मनुष्य ही|” मनुष्य
को मनुष्य की तरह बनाए रखने के लिए जिस शास्वत खेमा को सुरक्षित रखकर परख की जमीन
तैयार करनी होती है, वह है मानवीय अस्मिता और संघर्ष का खेमा| माधव कौशिक इसी खेमें
के सशक्त हस्ताक्षर हैं और ताउम्र बनकर रहना भी चाहते हैं ताकि वर्तमान में
लहलहाती फसलें सुरक्षित रह सकें और आने वाली नस्लें दम-खम के साथ खड़ी हो सकें|