Thursday, 27 August 2026

युवा, व्यवस्था और बदलता हुआ परिदृश्य

इधर के वर्षों में युवाओं में बहुत बेचैनी है। वे करना बहुत कुछ चाहते हैं, लेकिन उनके सामने जैसे एक ऐसा चक्रव्यूह पहले से तैयार कर दिया गया है, जिसमें प्रवेश करना तो आसान है, बाहर निकलना उतना ही कठिन। निर्माण और विध्वंस के इस जाल में फँसकर जिस तरह से युवा तड़फड़ा रहे हैं, वह सचमुच हतप्रभ करता है। उनके भीतर ऊर्जा है, सपने हैं, कुछ नया करने की आकांक्षा है, लेकिन रास्ते लगातार संकरे होते जा रहे हैं। वे आगे बढ़ना चाहते हैं, पर हर कदम पर कोई न कोई दीवार खड़ी मिलती है।

हम एक हद तक उम्मीद करते हैं बड़ों से कि वे विनम्रता से युवाओं को स्वीकार करेंगे, उनकी बेचैनी को समझेंगे और ठीक तरीके से उन्हें रास्ता दिखाएँगे। लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा हमेशा नहीं होता। कई बार ऐसा लगता है जैसे उन्होंने युवाओं को समझने के बजाय उन्हें भला-बुरा कहने और उनकी आलोचना करने का ही मन बना लिया है। समाज में कुछ भी गलत और बुरा हो रहा हो, उसका सारा ठीकरा युवाओं के सिर पर मढ़ दिया जाता है। जबकि व्यवस्था की बागडोर अधिकांशतः आज भी बुजुर्गों के हाथों में है। निर्णय लेने वाली संस्थाएँ, प्रशासनिक ढाँचे, राजनीतिक व्यवस्थाएँ और आर्थिक संसाधन मुख्यतः उन्हीं के नियंत्रण में हैं। फिर हर असफलता के लिए युवा ही क्यों जिम्मेदार हों?

युवाओं को हम एक धक्के में खारिज नहीं कर सकते। खासकर ऐसी स्थिति में, जब हम न तो उन्हें पर्याप्त अवसर दे रहे हैं और न ही ठीक तरीके से उनकी बात सुन रहे हैं। हर समय के युवाओं पर जिम्मेदारियों का बोझ रहा है, लेकिन इधर के युवाओं की समस्या कुछ अधिक जटिल दिखाई देती है। घर, परिवार, सगे-संबंधी, शिक्षा, रोजगार और फिर देश-समाजहर तरफ से उनसे अपेक्षाएँ हैं। उनसे कहा जाता है कि वे सफल हों, अच्छा पढ़ें, अच्छी नौकरी पाएँ, परिवार का नाम रोशन करें और देश के लिए कुछ करें। लेकिन यह कम ही पूछा जाता है कि आखिर उनके हिस्से में आया क्या है?

कभी-कभी मुझे न जाने क्यों लगता है कि वे जैसे हर जगह और हर किसी के साथ हैं, लेकिन उनके साथ और उनके लिए कोई नहीं है। वे परिवार में हैं, लेकिन उनकी बेचैनी को समझने वाला कोई नहीं। वे विद्यालय और विश्वविद्यालय में हैं, लेकिन उनकी जिज्ञासाओं और समस्याओं को सुनने वाला कोई नहीं। वे नौकरी की तलाश में हैं, लेकिन रोजगार की व्यवस्था उनके सामने बंद दरवाजे की तरह खड़ी है। वे समाज में हैं, लेकिन समाज उन्हें केवल अपनी अपेक्षाओं के आईने में देखना चाहता है। हर तरफ का परिदृश्य उनके लिए नकारात्मक और विषाक्त होता जा रहा है।

इसके बावजूद वे रुकते नहीं हैं। एक साथ बहुत कुछ पा लेना चाहते हैं और उसी वेग में बहुत सारे कार्य भी कर रहे होते हैं। कई बार जब आप एक साथ चार-पाँच काम निपटाते हुए उन्हें देखें तो उनके लिए हताश या आश्चर्य जैसा कुछ महसूस करने के बजाय उनके संघर्ष को समझने की कोशिश करनी चाहिए। वे जैसे विसंगतियों को झेलने और प्रताड़नाओं को सहने के लिए अभिशप्त हैं। न उनके लिए किसी के हृदय में वाहहै और न वे स्वयं अपनी आहकिसी के सामने निकाल सकते हैं। उनकी स्थिति कई बार ऐसी हो जाती है जैसे वे अपने ही समाज में अनाथ हों।

न उनका कोई गाँव दिखाई देता है, न प्रदेश और न देश। उनके पास यदि कुछ बचा है तो उनकी मेहनत, दृष्टि और जिद। हर हाल में जीवित रहने और मुस्कराने की जिद। वे लगातार संघर्ष करते हैं, गिरते हैं, उठते हैं और फिर चल पड़ते हैं। उनकी सबसे बड़ी पूँजी शायद यही है कि उन्होंने अभी तक उम्मीद करना पूरी तरह छोड़ा नहीं है।

कई बार मेरी निगाहों ने उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों से दूसरे राज्यों की ओर जाते, भटकते और धक्के खाते लोगों को गहरे में उतरकर देखा है। उनकी विवशता और दुर्दशा से कौन परिचित नहीं है? वे अपने घर-परिवार से दूर जाकर केवल इसलिए नहीं निकलते कि उन्हें दूसरे प्रदेश अधिक अच्छे लगते हैं। वे इसलिए निकलते हैं क्योंकि उनके अपने प्रदेश में उनके लिए पर्याप्त अवसर नहीं हैं। रोजगार की तलाश उन्हें घर की चौखट से बाहर खींच ले जाती है।

दूसरे प्रदेशों में पहुँचकर उन्हें अनेक प्रकार की पहचानें दी जाती हैं। कभी भैया’, कभी बाहरी’, कभी कोई और अपमानजनक संबोधन। व्यक्ति जो अपने घर से रोजी-रोटी की तलाश में निकला था, वहाँ पहुँचकर अचानक किसी दूसरे की राजनीति का पात्र बना दिया जाता है। महाराष्ट्र, गुजरात, पंजाब जैसे राज्यों में भी समय-समय पर प्रवासियों को लेकर राजनीतिक और सामाजिक तनाव सामने आते रहे हैं। जिन राज्यों को उदार और विशाल हृदय वाला कहा जाता है, वहाँ भी कई बार प्रवासी युवाओं के लिए वातावरण असहज हो जाता है।

चुनाव आते ही प्रवासी समुदाय अक्सर राजनीतिक निशाने पर आ जाता है। पंजाब जैसे समृद्ध प्रदेश में भैया भगाओ, पंजाब बचाओजैसे नारे जब राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनते हैं तो उन लोगों के भीतर डर पैदा होना स्वाभाविक है, जो वर्षों से वहाँ मेहनत कर रहे हैं। किसी भी राज्य की अपनी सीमाएँ और अपनी प्राथमिकताएँ होती हैं। वहाँ के संसाधनों पर स्थानीय नागरिकों का अधिकार होना स्वाभाविक है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं हो सकता कि दूसरे प्रदेश से आया हुआ श्रमिक, विद्यार्थी, कर्मचारी या कामगार मनुष्य होना ही भूल जाए।

प्रश्न यह भी है कि जो लोग प्रवासी होकर दूसरे राज्यों में जाने को मजबूर होते हैं, वे अपने प्रदेशों से क्यों नहीं पूछते कि वहाँ उनके लिए रोजगार के पर्याप्त अवसर क्यों नहीं हैं? कितने लोग यह सवाल पूछते हैं और यदि पूछते भी हैं तो क्या व्यवस्था उन्हें समुचित उत्तर दे पाती है? आखिर जिन प्रदेशों की योग्यताएँ दूसरे राज्यों में जाकर वहाँ की अर्थव्यवस्था को समृद्ध कर रही हैं, वही योग्यताएँ अपने प्रदेश में रहकर क्यों नहीं कार्य कर पा रही हैं?

यदि कल-कारखाने, फैक्ट्रियाँ, उद्योग और रोजगार के पर्याप्त अवसर अपने प्रदेशों में बनाए गए होते तो कोई क्यों हजारों किलोमीटर दूर जाने के लिए विवश होता? पाँच हजार से लेकर पच्चीस हजार रुपये तक की नौकरी के लिए लोग दिन भर धक्के खाते हैं, अपमान सहते हैं और तमाम विसंगतियों में जीवन यापन करते हैं। लेकिन उनकी व्यथा सुनने वाला कोई नहीं मिलता। वे अपनी समस्या किससे कहें, यह भी उनके लिए एक समस्या बन जाती है।

बात केवल उत्तर प्रदेश या बिहार की नहीं है। बात युवाओं की है। वे जिस भी प्रदेश में हैं, उनकी समस्याएँ कमोबेश एक जैसी हैं। आज पंजाब का युवा रोजगार के लिए संघर्ष कर रहा है तो उत्तर प्रदेश और बिहार का युवा भी। महाराष्ट्र का विद्यार्थी शिक्षा और रोजगार की चिंता से जूझ रहा है तो किसी दूसरे प्रदेश का विद्यार्थी भी उसी चिंता में है। जो परेशानी उत्तर प्रदेश और बिहार के युवाओं को पंजाब या महाराष्ट्र में उठानी पड़ती है, उससे कम परेशानी पंजाब के प्रवासी युवाओं को दूसरे प्रदेशों और देशों में नहीं उठानी पड़ती होगी।

हम कहने को कितने भी उन्नतशील और विकसित क्यों न हो जाएँ, राष्ट्रीय स्तर पर युवाओं की समस्या का समाधान अभी भी हमारे पास नहीं है। शिक्षा से लेकर रोजगार तक, प्रतियोगी परीक्षाओं से लेकर नियुक्तियों तक, हर जगह युवाओं को अनिश्चितता का सामना करना पड़ रहा है। देश की व्यवस्था जिस तरह अतीत में युवाओं के प्रति पूरी तरह जिम्मेदार नहीं थी, आज भी स्थिति बहुत अलग दिखाई नहीं देती।

पहले शायद कुछ व्यवस्थागत नैतिकता बची हुई थी। अभाव भी था, लेकिन अभाव को स्वीकार करने की ईमानदारी कहीं न कहीं दिखाई देती थी। आज समस्या यह है कि निर्लज्जता कई स्तरों पर सामान्य होती जा रही है। हर सिस्टम जैसे खास सिस्टम वालों के लिए निर्मित हो गया है। स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय से लेकर मिल, फैक्ट्री और बैंक तकयुवा लगातार इन संस्थाओं की परिक्रमा कर रहे हैं, लेकिन उनकी सुनवाई कितनी होती है?

यदि प्रतिदिन व्यवस्था के दरवाजों पर दस्तक देने वाले युवाओं की ऊर्जा को सही दिशा में लगाया जाए तो परिदृश्य बिल्कुल अलग हो सकता है। जिस युवा को हम बेरोजगार कहते हैं, उसके भीतर ऊर्जा है। जिसे हम दिशाहीन कहते हैं, उसके भीतर संभावनाएँ हैं। जिसे हम अधीर कहते हैं, उसके भीतर परिवर्तन की बेचैनी है। समस्या यह नहीं कि युवा कुछ करना नहीं चाहता; समस्या यह है कि उसके करने की ऊर्जा को अवसर में बदलने वाली व्यवस्था कमजोर है।

दिक्कत यह भी है कि कहीं कोई किसी भी प्रकार का मूल्यांकन करने के लिए तैयार नहीं है। परीक्षाओं में हेर-फेर के किस्से और उनके यथार्थ हम सुनते और देखते रहते हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाला विद्यार्थी वर्षों तक अपनी जवानी पुस्तकों और कोचिंग के बीच खर्च कर देता है। परीक्षा हो जाए तो परिणाम की प्रतीक्षा, परिणाम आए तो नियुक्ति की प्रतीक्षा और नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू हो तो किसी न किसी नए विवाद की आशंका। इस पूरी प्रक्रिया में सबसे अधिक खर्च यदि किसी चीज का होता है तो वह युवा का समय और उसका विश्वास है।

बैंकिंग, प्रशासन, शिक्षा और रोजगार से जुड़े क्षेत्रों में यदि भ्रष्टाचार और अनियमितताओं पर गंभीरता से निगाह डाली जाए तो प्रश्न उठता हैहम आखिर कहाँ आ गए हैं? एक ओर युवाओं को ईमानदारी, मेहनत और धैर्य का पाठ पढ़ाया जाता है, दूसरी ओर उन्हें बार-बार ऐसे उदाहरण दिखाई देते हैं जहाँ योग्यता से अधिक पहुँच, संबंध और संसाधन प्रभावी दिखाई देते हैं। तब युवा के भीतर व्यवस्था के प्रति विश्वास कैसे बना रहे?

परिदृश्य एकदम से बदल गया है। आप कितने भी अभावों में जी रहे हों, धन कुछ बड़े हाथों के पिंजरे में कैद होता जा रहा है। समाज के एक हिस्से के पास संसाधनों की भरमार है और दूसरे हिस्से के पास अवसरों की कमी। कहीं महँगी गाड़ियों में जीवन गुजर रहा है और कहीं सूखी रोटी से पेट भरना कठिन होता जा रहा है। आर्थिक असमानता केवल आँकड़ों की बात नहीं है; यह रोजमर्रा के जीवन में दिखाई देने वाली वास्तविकता है।

ऐसे वातावरण में युवा सपने कैसे देखें? और यदि देखें तो उनकी देखभाल कौन करे? एक वैकेंसी पर हजारों आवेदन पड़ते हों तो यह केवल रोजगार की समस्या नहीं रह जाती, यह पूरे सामाजिक ढाँचे पर प्रश्नचिह्न बन जाती है। हजारों योग्य युवाओं को एक अवसर के लिए प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती है। उनमें से अधिकांश को असफलता मिलती है, जबकि उन्हें असफल कह देना सबसे आसान काम है। लेकिन क्या हमने कभी यह पूछा कि इतनी बड़ी संख्या में युवाओं के सपनों का क्या होगा?

युवा केवल नौकरी माँगने वाला व्यक्ति नहीं है। वह समाज की सबसे बड़ी रचनात्मक शक्ति है। उसके पास कल्पना है, तकनीक है, श्रम है, नई दृष्टि है और परिवर्तन की इच्छा है। यदि इस शक्ति को सही दिशा मिल जाए तो वही युवा उद्योग खड़ा कर सकता है, शोध कर सकता है, खेती को नई तकनीक से जोड़ सकता है, शिक्षा को बदल सकता है और समाज के भीतर नई चेतना पैदा कर सकता है।

इसलिए आवश्यकता युवाओं को दोष देने की नहीं, उन्हें समझने की है। उन्हें भाषण नहीं, अवसर चाहिए। उन्हें केवल उपदेश नहीं, संवाद चाहिए। उन्हें दया नहीं, सम्मान चाहिए। उन्हें यह बताने की आवश्यकता नहीं कि वे असफल हैं; उन्हें यह अवसर देने की आवश्यकता है कि वे अपनी क्षमता को साबित कर सकें।

बड़ों की भूमिका यहाँ समाप्त नहीं होती, बल्कि यहीं से शुरू होती है। अनुभव और ऊर्जा का संवाद हो तो समाज आगे बढ़ता है। यदि अनुभव युवाओं को दबाएगा और युवा अनुभव को पूरी तरह नकार देगा तो दोनों के बीच दूरी बढ़ती जाएगी। आवश्यकता ऐसी व्यवस्था की है जहाँ बुजुर्ग अपने अनुभव से रास्ता दिखाएँ और युवा अपनी ऊर्जा से उस रास्ते को नया आकार दें।

हमें यह स्वीकार करना होगा कि आज का युवा केवल अपने भविष्य के लिए नहीं लड़ रहा। वह अपने अस्तित्व, सम्मान और पहचान के लिए भी संघर्ष कर रहा है। वह अपने घर में बेहतर जीवन चाहता है, अपने प्रदेश में रोजगार चाहता है, दूसरे प्रदेश में सम्मान चाहता है और देश में अवसरों की समानता चाहता है। यह माँग असाधारण नहीं है। यह किसी भी लोकतांत्रिक और मानवीय समाज की सामान्य अपेक्षा है।

यदि हम सचमुच विकसित समाज बनना चाहते हैं तो हमें अपने युवाओं की बेचैनी को अपराध की तरह देखना बंद करना होगा। उनकी अधीरता के पीछे छिपे कारणों को समझना होगा। उनके सवालों को सुनना होगा। उनके सपनों को केवल चुनावी भाषणों का हिस्सा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाना होगा।

युवाओं के पास अभी भी बहुत कुछ हैमेहनत, दृष्टि और जिद। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उनमें उम्मीद की थोड़ी-सी रोशनी अभी बाकी है। यही रोशनी किसी समाज को बचा सकती है। जरूरत केवल इतनी है कि हम उस रोशनी को बुझाने के बजाय उसके लिए रास्ता तैयार करें।

क्योंकि किसी देश का भविष्य उसकी इमारतों, सड़कों या बड़े-बड़े नारों से नहीं बनता। उसका भविष्य उन युवाओं से बनता है जो आज किसी छोटे कमरे में बैठकर अपने सपनों की तैयारी कर रहे हैं, किसी रेलवे स्टेशन से दूसरे शहर की ओर जा रहे हैं, किसी परीक्षा के परिणाम की प्रतीक्षा कर रहे हैं, किसी फैक्ट्री में काम कर रहे हैं या किसी नए विचार को आकार दे रहे हैं।

उनकी मेहनत को पहचानना होगा। उनकी बेचैनी को समझना होगा। उनकी आवाज को सुनना होगा। वरना एक दिन हम फिर पूछेंगेये कहाँ आ गए हम, तेरे साथ चलते-चलते? और तब शायद हमारे पास इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए कोई युवा बचा ही न हो, बल्कि केवल उसकी अधूरी उम्मीदें बची हों।


Thursday, 22 May 2025

निरुपाय और वेबस जीवन

 

जीवन में अपना लगने वाला कोई व्यक्तित्व एक ही पल में कैसे अनजाना लगने लगता है? जिसके साथ आप रह रहे हों, जिसके बगैर आप रह नहीं सकते हैं इतना अप्रिय, अरुचिकर एवं नीरस कैसे लगने लगता है? आपके पक्ष का समय इतना क्रूर और कठोर कैसे हो जाता है कि एक ही क्षण में जिए गए हजारों हजार घंटे झूठे और बनावटी-से लगने लगते हैं?

कभी-कभी सोचता हूँ और फिर सोचने में तल्लीन हो जाता हूँ| क्या वाकई मनुष्य परिस्थितियों का दास होता है? क्या वाकई वह समय के हाथ का महज एक खिलौना भर होता है? क्या वह सचमुच एक मात्र पात्र है जिसकी संरचना और क्रिया-कलाप पहले कोई निर्धारित करके बैठा हुआ है? सोचता हूँ और बस सोचता रह जाता हूँ|

मैत्री एक कठिन परीक्षा है तो भयानक भूल भी

मनुष्य का जीवन जितनी अनिश्चितताओं से भरा पड़ा है शायद ही किसी अन्य प्राणी का होगा| हर कदम नया और हर राह अनजाना| जिस क्षण और स्थिति से जुड़ाव है वह भी और जिससे उसका कोई सम्बन्ध तक नहीं है, वह भी उसे प्रभावित करते हैं| वह कभी उनका स्वागत करता है तो कभी उनसे विद्रोह| दुःख दोनों स्थितियों में उसको होता है|

सुख की एक छोटी-सी अभिलाषा में दुःख का विशाल पहाड़ अपने ऊपर वह लाद लेता है| गिरते-पड़ते-सम्भलते वह पहुँचता तो है लेकिन तब तक बहुत कुछ छूट चुका होता है| बहुत कुछ गायब हो चुका होता है| छूटे और गायब होने का मोह उसे छोड़ता नहीं और जो नया मिलता है उसे वह चाहता नहीं| टूटन यहाँ भी है| एक को अपनाने में तो दूसरे को त्यागने में|

मैत्री एक कठिन परीक्षा है तो भयानक भूल भी है| सम्बन्धों में जितनी प्रगाढ़ता है अलगाव भी उतना ही है| संसार का सब सुख इसके आगे फीका लगता है तो दुःख का कोई हिस्सा इससे बड़ा भी नहीं है| उपस्थिति में सब कुछ सुन्दर और अनुपस्थिति में सब कुछ असुन्दर| सूरदास का ये पद न जाने क्यों याद आ रहा है "तब ये लता लगति अति सीतल, अब भई विषम ज्वाल की पुंजैं॥"

Wednesday, 23 April 2025

धर्मनिरपेक्ष रहे तो धार्मिक उन्मादी मार देंगे और यदि धार्मिक रहे तो धर्मनिरपेक्षी जीने नहीं देंगे...

 

हम उस समय में जी रहे हैं जहाँ सच के न जाने कितने झूठ हैं| आपकी आँखों के सामने घटित घटना को इतनी दूर का बता दिया जाएगा कि यकीन नहीं कर पाएंगे कि वह आपके सामने ही घटित हुआ था| आप उसके गवाह ही नहीं भुक्तभोगी भी रहे हों फिर भी ऐसा प्रदर्शित करेगा सामने वाला जैसे वह उस घटना का यथार्थ हो न कि आप|

बहुत दिन से यह समझते-समझते जैसे अब स्पष्ट-सा होने लगा है कि आम आदमी तो जैसे पैदा ही हुआ है मारे जाने के लिए| कहीं धर्म के नाम पर तो कहीं जाति के नाम पर| मजे लेने वाले हर तरफ हैं| सही पक्ष तो होते ही हैं हर गलत के भी अपने पक्ष हैं| अपना एंगल निकालने वाले हर तरफ हैं| आपका यथार्थ कोई सुनने वाला नहीं है| जैसे सारा दोष सिर्फ और सिर्फ आपका है क्योंकि आप एक ऐसे देश में जन्म लिए हैं जहाँ की व्यवस्था से लेकर समाज तक की कोई ज़िम्मेदारी नहीं है| 

मैं नहीं चाहता कि ऐसे मुद्दों पर बोलूँ... न जाने किसका मन दुःख जाए और मैं दोषी करार दे दिया जाऊँ? सोचता हूँ और फिर शांत हो जाता हूँ| चीजें साफ़-साफ़ दिखती हैं फिर भी नहीं कुछ कहता-लिखता| दलितों पर लिखो तो वे नाराज़ हो जाते हैं सवर्णों पर लिखो तो वे नाराज़ हो जाते हैं| पिछले दिनों अनुराग कश्यप ने सरेआम ब्राह्मण समुदाय को गाली दी, अपशब्द कहे, बतौर ब्राह्मण भी कुछ कहने की हिम्मत नहीं रख पाया क्योंकि बहुत से दलित क्रांतिकारियों को लगा कि मनुवाद अब यहीं समाप्त हो जाएगा? अब कह और बोल कर भी क्या ही मिल जाता? उस बंदे ने अपना एजेंडा सक्सेज होते ही माफ़ी मांग ली| अब न मनुवाद गायब हुआ और न ही तो दलितवाद पुष्पित और पल्लवित|

पश्चिम बंगाल में क्या नहीं हुआ? घर जलाए गये, लोग मारे गये, लोग भाग गये और भगाए गये लेकिन मजाल क्या है कि कुछ लिख दूँ| मुझे पता है लोग हमें न जाने क्या कह देंगे? बोल कर कर भी क्या देता सिवाय चार अच्छे मित्रों को दुश्मन बना देने के? हमारे दोस्त मुस्लिम हैं तो क्या जो गलत हैं उन्हें गलत कहना छोड़ दूँ? मैं हिन्दू हूँ तो इसका मतलब यह कैसे कि जो गलत है वह जस्टिफाई कर दूँ? फिर भी कुछ नहीं कर सकता हूँ क्योंकि सर्टिफिकेट देने वालों की कमी नहीं है अब|

अब पहलगाम पर ही मेरे बोलने का क्या ही फर्क पड़ने वाला है? बुद्धिमान लोग मोर्चा सम्भाल लिये हैं| अपने-अपने एंगल निकाल लिए हैं और वे उसे सिद्ध भी कर लेंगे| जैसा चाहेंगे वैसा रूप-शक्ल भी दे देंगे| क्या फ़र्क पड़ता है कि मारने वाले कौन थे और मरने वाले कौन थे? यहाँ बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक की राजनीति भी कम भयानक नहीं है अब| सोचता हूँ तो सिहर जाता हूँ| अभी एक सज्जन के वाल पर अल्पसंख्यक को बचाओ लोकतंत्र बचाओ आन्दोलन का पोस्टर देखा अवाक रह गया| बहुसंख्यक सरेराह उडाए जा रहे हैं और बचा अल्पसंख्यक को रहे हैं|

इस्लाम और हिंदुत्व के नाम पर कम खून नहीं बहे हैं| अभी भी मौका पड़ने पर कोई चूकने वाला नहीं है| लेकिन सब जानते हुए भी इतनी हिम्मत कहाँ से लाते हैं कि अनहोनी घट ही जाती है? क्या विचार करें? क्या सोचें? सोच कर ही क्या मिलेगा? विचार कर कर ही क्या लेंगे? अपना खून जलाने और दिमाग को प्रदूषित करने के अतिरिक्त हमें कुछ न मिलेगा| इस देश की जनता सच में दिग्भ्रमित है| वह धर्मनिरपेक्ष रहे तो धार्मिक उन्मादी मार देंगे और यदि धार्मिक रहे तो धर्मनिरपेक्षी जीने नहीं देंगे|

Monday, 26 August 2024

बेरोजगारी के प्रश्न और कोरोजीवी कविता

 

1

 

‘कोरोजीवी कविता का सांस्कृतिक सन्दर्भ’ लेख में लिखते हुए यह कहा था एक दिन कि “कविता या साहित्य कभी भी ऊँगली पकड़ कर चलाए भले न लेकिन ऐसा सूत्र उसमें से प्राप्त होता है कि आप (खुद के साथ) दूसरों को ऊँगली पकड़ कर रास्ता जरूर दिखा सकते हैं| कोरोजीवी कविता ने निःसंदेह कोरोना के भयंकर दौर में आपको जीवन-सूत्र दिया है| वह दृष्टि दी जिसके जरिये आप न सिर्फ लम्बी दूरी चल सकते हैं अपितु सार्थकता के साथ निर्माण के स्वप्न को हकीकत में भी बदल सकते हैं| हाँ दावे और वायदे यहाँ नहीं मिलेंगे आपको|” रोजगार का प्रश्न कम महत्त्वपूर्ण नहीं है| यह उनसे पूछा जाना चाहिए जो बेरोजगार हैं| काम-धाम नहीं है कोई खर्चे तमाम हैं| उनसे भी पता कर सकते हैं जो उनकी यथास्थिति से परिचित हैं| दो वक्त की रोटी के लाले पड़ जाते हैं| शौक-साधन की तो बात ही जाने दीजिये| जेब में पैसे का न होना और घर-परिवार की ज़रूरतों का नित-प्रतिदिन सामना करना किसी असह्य पीड़ा को आत्मसात करने से कमतर तो नहीं है|

हिंदी कविता में बेगारी-बेरोजगारी का जिक्र बराबर आया है| मिलों, फैक्ट्रियों, कारख़ानों में दिहाड़ी पर कार्य करने वाले मजदूर, गाँवों, शहरों आदि में खटने वाले मजदूर कवियों की संवेदना के पात्र रहे हैं| छोटे से उदहारण में निराला की 'वह तोड़ती पत्थर' कविता को आप विस्मृत नहीं कर सकते हैं| ‘चल रहा लकुटिया टेक’ निराला की ही कविता है| इसके पहले यदि तुलसीदास के यहाँ जाएँगे तो 'जीविका बिहीन लोग सीद्यमान सोच बस/ कहैं एक एकन सों, ‘कहाँ जाई, का करी?’ जैसा यथार्थ आँखें खोल देती हैं| ‘कहाँ जाइ का करी पर थोड़ी देर ठहरिये| सोचिए कि ये प्रश्न कितनी हताशा और निराशा लिए हुए है? कितनी वेबसी और दर्द लिए हुए है? तुलसी का समय और आपका समय यहाँ आकर एकमेक हो जाते हैं| नागार्जुन द्वारा रचित ‘प्रेत का बयान’ में प्रेत जो कुछ कहता है गलत कहाँ कहता है? विसंगतियाँ इस कदर घेर लेती हैं कि न आप इधर के होते हैं न उधर के|  

आने की पाबंदी और जाने की बंदी जहाँ हो वहां का यथार्थ अलग हो जाता है| परिवार की रोटी का बन्दोबस्त करेंगे या फिर व्यवस्था का विरोध करेंगे? प्रश्न अनुत्तरित ही रहेगा| एक बात और है कि साधारण समय की बेरोजगारी और किसी विशेष-परिस्थिति की बेरोजगारी में भी अंतर होता है| महामारियों का इतिहास जो कुछ कहता है, गलत नहीं है| अच्छे-अच्छे सड़कों पर आ जाते हैं, वे भी जो रोजगार दे रहे होते हैं, जिनके पास नहीं है कुछ तो उनका क्या हाल होता होगा, यह पूछने की ज़रूरत नहीं है| खुद का भी यथार्थ देखेंगे तो स्पष्ट होता जाएगा| ‘बेरोजगार मित्र की डायरी से’ कविता है दिनेश कुशवाहा की| कवि एक बेरोजगार की यथास्थिति को किस तरह अभिव्यक्त करता है वह आप यहाँ देख सकते हैं-

“अभी तो मैं जवान हूँ

मुझे भी आते हैं सतरंगी सपने

पर जब देखता हूँ

धीरे-धीरे बुझ रही हैं पिता की आँखें

तो मुझे अपने रंगीन सपनों से

वितृष्णा होने लगती है।

 

यूँ तो रोज़ ही जन्मती-मरती हैं

छोटी-मोटी इच्छाएँ

कि पी लूँ एक कप कॉफ़ी रेस्तराँ में बैठकर

धुला लूँ लॉन्ड्री में कभी रीठ गए कपड़े

बनवा लूँ एक नई कमीज़|”

लेकिन फिलहाल यह सब महज स्वप्न ही रह जाते हैं| नौकरी नहीं है तो करेगा क्या कोई कुछ? इधर की कविता को लेकर यहाँ एक अलग तरीके का यथार्थ भी है| कवि के लिए ‘दुःख’ स्थाई विकल्प है कविता में| वह तमाम मुद्दों पर दुखी होता रहा है, होता है| बेरोजगारी जैसे प्रश्न पर उसके यहाँ मौन दिखेगा आपको| जैसे यह सरकार की ज़िम्मेदारी मात्र हो| राजनीतिक व्यवस्था के प्रतिरोध में तमतमाए कवियों के पास विरोध का यह विकल्प सीधे क्यों नहीं आता, आप इस पर विचार कर सकते हैं| यह सीधे शायद उनको न झकझोरती हो? उनके दिमाग पर बल न पड़ता हो? यहाँ युवा कवि गोलेन्द्र पटेल की एक कविता ‘रीढ़-राग’को देखना ज़रूरी हो जाता है –

जो भूमि में जीवन बोते हैं

उनके गीतों में श्रम के राग होते हैं

वे मेड और मचान पर सोते हैं

वे खेतों में अक्सर रोते हैं

 

करुणा की क्यारी में कवि बहुत हैं

किन्तु, कविता किसी के पास नहीं है

क्योंकि, कर्ज के बोझ से टूटी हुई रीढ़ कह रही है

कि भाषा की आँख है भूख

और उसकी आत्मा है दुःख|” (गोलेन्द्र पटेल)

सही कहूँ जितनी ज़िम्मेदारी से रोजगार और भूख को केंद्र में रखकर कविताएँ लिखी जानी थीं, इधर दो तीन वर्षों में बेरोज़गारी और पेपरलीक जैसे विषयों पर कवियों की संवेदनाएँ कम ही जगी हैं| समाज के बड़े हिस्से के पास कोई साधन नहीं है| किस तरह से दो वक्त की रोटी का जुगाड़ हो, यह नहीं पता है| युवा दिन-रात श्रम करके भी परिवार का खर्च नहीं पूरा कर पा रहे हैं| कवि बावजूद इन सबके ऐसे विषयों से अनभिज्ञ रह जा रहे हैं? क्या यह सच है कि उनके समय में अब रोजगार कोई समस्या नहीं है? भुखमरी, भाड़े की मजदूरी, बँधुआ मजदूरी, बेगारी आदि के दायरे में जीवन यापन करने वाले लोग क्या हमारे परिवेश से गायब हैं?

कोरोजीवी कविता में इस बात पर विचार हुआ है| कविता जिस समय एक फैशन की तरह विकसित हो रही हो वहीँ कोरोजीवी कविता के दायरे में कवि सुरक्षित जोन से बाहर निकल कर जोख़िम लेता है और पाता है कि -

 

इधर, अभी

पेट की आग व अन्न का

समीकरण है अनसुलझा हुआ|

 

कलमुँही महामारी की आड़ में

कामवाली की पगार और

सूरते राजगीर की दिहाड़ी को

अड़ंगी लगी है ज़बर्जस्त|” (बल्वेन्द्र सिंह)

इधर महज कवि की वेबसी नहीं है| एक सम्पूर्ण लोक की वेबसी है| एक रोजगार संपन्न होते हुए जब कवि की यथास्थिति ऐसी है तो सोचो कि कवि जब कामवाली और सूरते राजगीर की दिहाड़ी देने में असफल हो रहा है तो जो दिहाड़ी पर है और जो कामवाली है उसकी क्या स्थिति होगी? कहाँ से घर का खर्च निकल रहा होगा उसके, कहाँ रोजमर्रा की ज़िन्दगी की ज़रूरतों को पूरी करते होंगे ऐसे लोग? प्रश्नों की संख्या बढ़ती जाती है और कवि की पक्षधरता और कविता का वास्तविक संघर्ष यहाँ से परिभाषित होता जाता है| यह भी समझ सकते हैं कि जिनके पास यह साधारण सी नौकरी भी नहीं है उनका क्या होता होगा? किस तरह से होंगे उनके बाल-बच्चे और किस तरह से पूरी होती होंगी उनकी ज़रूरतें-‘बेरोजगार पिता के बेटे’ कविता में आलोक मिश्र लिखते हैं कि-

“बेरोजगार पिता का बेटा

देखता है रोज़ एक सपना

कि उसके पिता जा रहे हैं काम पर

और लौट रहे हैं वहाँ से

कंधे पर लटकाये एक भरा हुआ झोला

 

बेरोजगार पिता का बेटा

लहककर लपकता है उस तक

पर वह झोला है या कोई झोल

कि लपकते ही वह और सपना

दोनों हो जाते हैं गोल|”

दरअसल ऐसे बच्चों का कोई संसार इतना सुखद नहीं होता| कुशल है कि वह बच्चे हैं और कुछ समय के बाद भूल जाते हैं लेकिन पिता की यथास्थिति कैसी होगी? विचार इस पर किया जाना चाहिए| कोरोजीवी कविता में यथार्थ शिद्दत से अभिव्यक्त होता है| बगैर किसी घुमाव के और बगैर किसी लाग-लपेट के| जितना यथार्थ आपको इस कविता में मिलेगा, कहीं और नहीं देखेंगे|

2

 

कोरोना समय का यथार्थ विचलित करता है| डराता है| जब मैं कोरोजीवी कविता का अध्ययन करता हूँ तो इस समस्या ने कवियों को अंदर तक झकझोरा है| वे युवाओं की बदहाली और परिवार के बिखराव देखकर विलख पड़े| भूख, प्यास, असीम पीड़ा, वेदना आह! बहुत कुछ| श्रीप्रकाश शुक्ल सरीखे कवि लिए हर क्षण दुखद है| ‘इंतज़ार’ कविता में एक जगह वह लिखते हैं-

“हाय कैसे कहूँ कि हर क्षण एक  बीतता हुआ क्षण है

और जो बीत  रहा है

वह किसी अनबीते का महज़  इंतज़ार लगता  है

जिसमें सीझती हुई करुणा

गुजरते समय की उदासी बन

कंठ में अटक सी गई है!” (श्रीप्रकाश शुक्ल)

हलक तो हर किसी के सूखे ही रहे| यह सच है कि सरकारें जहाँ विज्ञापन में ‘सब अच्छा है’ का स्वप्न दिखा रही थीं, कविगण अच्छा होने, दिखने और करने के बीच के फासले को महसूस कर रहे थे| उन्हें किसी भी हालत में ख़तम करने में तल्लीन थे| उनके सामने एक ऐसी लाचार-वेबस-लुटी-पिटी युवा पीढ़ी थी जिनके पास हज़ारों-हज़ार योग्यता होने के बावजूद रोज़गार के अभाव में या तो दम तोड़ रहे थे या फिर मरते-घिसटते आत्मीय लोगों को यथावत देखने पर विवश थे| ‘कोरोना फ़ैल रहा है’ कविता में विनोद पदरज लिखते हैं कि-

“कोरोना फैल रहा है

लोग मर रहे हैं

डॉक्टर, नर्सें, पुलिसकर्मी संक्रमित हो रहे हैं

रोज़गार बंद हैं

मजूर सड़कों पर हैं

सबको गाँव जाना है

कई भूख से मर गए हैं

कई ट्रेन से कुचल गए हैं

उधर गैस रिसी है

कई दम तोड़ चुके हैं

कई भर्ती हैं

इधर फिर से घाटी में

जवान हताहत हो रहे हैं... (विनोद पदरज)

यह चित्र एक साथ कई तरह की विसंगतियों का यथार्थ है| दिमाग-बंद यथास्थिति का चित्रण मात्र नहीं है यह| भूख, बेबसी, बेरोजगारी आदि तो है ही वह आत्मपीड़ा भी है जिसके दायरे में कोरोना विकसित होता है और लगभग मानवीयता को संकट में डालता है| फिलहाल देश में यह संकट कोई नया नहीं है| भूख यहाँ की स्थायी विशेषता रही है| हम इससे निजात पाए भी नहीं थे कि ‘आत्मनिर्भर’ देश की परिकल्पना का स्वप्न दे दिया गया| कवि श्रीप्रकाश शुक्ल की एक कविता है ‘रोटी’ इस कविता में वह ‘आत्म निर्भर होता देश अब/ रोटियों से आगे निकल चुका है!” का यथार्थ रखते हैं-

“रोटी का बिखरना

नहीं है कोई घटना

 

जनता अभी भी सड़क पर है

और उसके पलट प्रवाह के बीच

देश आत्म निर्भर हो रहा है|” (श्रीप्रकाश शुक्ल)

रोटी जिस तरह से बिखरी हुई है वह बिखरी हुई मनुष्यता का हवाला दे रही है| आत्मनिर्भर की संकल्पना पर हँस रही है| यथार्थ को दरअसल झुठलाया नहीं जा सकता है लेकिन उसके उलट प्रवाह में स्वप्न को उछाला जा सकता है| सत्ता महज स्वप्न उछालती है| जनता उस स्वप्न के दायरे में स्वयं को देखने के लिए विवश होती है| यह विवशता कहीं और से नहीं आई थी| कवि जानता है| कविताओं में दर्ज है| कोरोजीवी कविता इसी अर्थ में ज़िम्मेदार है| एक समझ से परिपूर्ण ईमानदार नागरिक की तरह| कौन घर से बेघर हुआ, किसकी नोकरी छूटी, किसको बैंक ने ईएमआई एक्सटेंड करने के एवज में ठगा, किसकी ईएमआई नहीं गयी और वह डिफाल्टर हो गया या कर दिया गया, खाने-पीने की असुविधा में ईएमआई की चिंता में युवा वर्ग कितना अधिक तबाह हो होता रहा, यह सब कवि को पता है| संजय कुंदन के यहाँ एक कविता है ‘अमरता’| इस कविता में एक ही कामगार है जो वास्तविकतः पूरे परिवार का खर्च चलाती है| गुंडों के हाथ लगने पर स्वयं को बलात्कृत होने के लिए यह कहते हुए तैयार करती है कि-

“मेरी ही नौकरी से चलता है घर

पिताजी दो साल पहले गुज़र गए

भाई अभी स्कूल में ही है

बहन बॉक्सर बनना चाहती है

बहुत पैसा लगता है

उसकी ट्रेनिंग में

मां के घुटनों में दर्द रहता है

जल्दी ही ऑपरेशन कराना पड़ेगा”

निहायत ही असहनीय पीड़ा है ये| ऐसा दर्द है जिसे कहा नहीं जा सकता है महज महसूस जा सकता है| संजय कुंदन जैसे कवि से यह इसलिए संभव हुआ क्योंकि ये आम जीवन के बीच गंभीरता से रह रहे हैं| उनके मुद्दे उठा रहे हैं और उनके बीच रहते हुए कविता को लिख रहे हैं|

पता है कोरोजीवी कवि को कि कितने मजदूर नौकरी से निकाल दिए गये| कितने की सैलरी कम कर दी गयी| कितने की तनख्वाह रोक दी गयी और आज तक उसका कोई हिसाब-किताब नहीं किया गया| कोरोना समय की एक खोज ‘वर्क फ्रॉम होम’ एक अलग तरह की समस्या लेकर आई| इस प्रक्रिया ने लोगों से काम खूब लिया लेकिन घर के नाम पर उनकी सैलरी बड़ी मात्रा में कट कर दी| यह अमूमन सबको पता है| जिनकी सरकारी नौकरियां थीं उनकी तो खैर सब ठीक-ठाक लेकिन जो प्राइवेट नौकरी में उनका घर-बार चलना मुश्किल हो गया| अभी भी बहुत-से संस्थान ‘वर्क फ्रॉम होम’ के कॉन्सेप्ट पर ही कार्य करवा रहे हैं| वे आज भी सैलरी कुछ हिस्सा काट रहे हैं| परिवार का कौन-सा सदस्य महज पैसा न होने की वजह से गुजर गया, किसके घर का बच्चा तीन दिन से भूखा है और किसी रोजगार संपन्न परिवार का न होने की वजह से दम तोड़ गया, यह सब कविता में दर्ज़ है| एक जगह पंकज चौधरी अपनी कविता ‘कोरोना और दिहाड़ी मजदूर’ में कोरोना समय का वर्तमान और उसके बाद की भयावह स्थिति पर विचार करते हुए लिखते हैं-

“परदेस में उनके हाथों को जब कोई काम ही नहीं रहा

घरों से उनको बेघर ही कर दिया गया

राशन की दुकानें जब ख़ाक ही हो गईं

तब वे करें तो क्‍या करें      

जाएँ तो कहाँ जाएँ।

 

वे उसी वतन को लौट रहे हैं

जिनको मुक्ति की अभिलाषा में छोड़ना

उन्‍हें क़तई अनैतिक-अनुचित नहीं लगा था

यह जानते हुए भी

फिर वहीं लौट रहे हैं

कि वह उनके लिए किसी नरक के द्वार से कम नहीं है

उन्‍हें पता है कि

जिनसे मुक्ति के लिए उन्‍होंने गाँवों को छोड़ा था

वे उनसे इस बार कहीं ज़्यादा क़ीमत वसूलेंगे

उन्‍हें उनकी मजूरी के लिए

दो सेर नहीं एक सेर अनाज देंगे

उनके जिगर के टुकड़ों को

बाल और बंधुआ मज़दूर बनाएँगे

उनकी बेटियों-पत्नियों को दिनदहाड़े नोचेंगे-खसोटेंगे

शिकायत करने पर

रस्‍सा लगाकर

ट्रकों में बाँधकर गाँवों में घसीटेंगे|”

जिन विसंगतियों से ऊबकर आम आदमी शहरों की तरफ पलायन किया था उन्हीं विसंगतियों में उनकी फिर वापसी हो रही है| जो सक्षम तब थे वह अपनी तरह से सक्षम अब भी हैं| अभी न तो उनके उन्माद कम हुए हैं और न ही तो उनकी जड़ताएँ| बेचैनियाँ बढ़ी ज़रूर हैं| ऐसे में कोई वापस लौटकर खाली हाथ जाता है गाँव, उसकी यथास्थिति पर पंकज चौधरी की यह कविता पूरी तरह बेबाक है|

फिर कह रहा हूँ कि जहाँ सभी अपनी भूमिका निर्वहन करने में नाकाम रहे, कवि एवं कविता ने अपनी ज़िम्मेदारी निभाई| विपत्ति के दिनों में दूर से आवाज़ देने वाला भी बड़ा हमदर्द होता है यहाँ तो कविता का संग-साथ पूरी गम्भीरता से मिला| कवि संग-साथ ही नहीं रहा, व्यवस्थागत ढांचे में बदलाव के लिए प्रतिरोध का विकल्प भी सर्जित किया| यह वही सर्जना है जिसके दम पर श्मशान में तब्दील हो चुके परिवेश को पुनः ऊर्जस्वित किया| कोरोजीवी कविता की सबसे बड़ी भूमिका यह भी रही कि मुक्ति और युक्ति का संकल्प लेकर आई वह इन दिनों| यह ऐसा संकल्प है जिसमें जन की भूमिका विशेष हो उठती है और समाज अपनी ज़िम्मेदारी का सार्थक निर्वहन करना शुरू कर देता है|