Friday, 29 November 2019

जीवन, प्रकृति और समाज की अभिव्यक्ति : समकालीन हिंदी ग़ज़ल




ग़र जमीं पर बाँट देने की हवस बढ़ती रही
जंग कंधों पर उठाकर आसमां ले जाएगा|
खौफ़ की अंधी-अंधेरी घाटियों से भी परे
आदमी को आदमी जाने कहाँ ले जाएगा||  (माधव कौशिक)
                                                                    
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प्रकृति को समझने के लिए हमें पर्यावरण को दृष्टिगत करना पड़ेगा| “पर्यावरण शब्द संस्कृत भाषा के 'परि' उपसर्ग (चारों ओर) और 'आवरण' से मिलकर बना है जिसका अर्थ है ऐसी चीजों का समुच्चय जो किसी व्यक्ति या जीवधारी को चारों ओर से आवृत्त किये हुए हैं|” पर्यावरण में जीव-जंतु से लेकर निर्जीव वस्तु तक का अध्ययन किया जाता है| वह सभी चीजें, जो किसी न किसी रूप में मानवीय जीवन को प्रभावित करती हैं या मनुष्य द्वारा प्रभावित होती हैं, पर्यावरण के अंतर्गत आती हैं| सभी वस्तुओं के व्यावहारिक प्रवृत्तियों का जीवंत अध्ययन प्रकृति और पर्यावरण को समझने में सहायक सिद्ध होता है|

साहित्य में जब हम पर्यावरण की बात करते हैं तो कहीं गहरे में सामाजिक वातावारण पर पड़ने वाले व्यक्ति के चिंतनमूलक, मानसिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और पारिवेशिक परिस्थितियों का मूल्यांकन करते हैं| यूं तो हिंदी काव्य-परंपरा में प्रकृति के हाव-भाव का चित्रण बहुत पहले से होता आया है लेकिन ग़ज़ल विधा में प्रकृति और पर्यावरण को लेकर कम चर्चा की गयी है| सच यह भी है कि ग़ज़ल विधा अपने प्रारंभिक क्षण से ही प्रकृति की अनुगामिनी रही है लेकिन दुष्यंत के बाद से इस विधा में पर्यावरण और प्रकृति को खोजने का प्रयास कम किया गया|

आलोचकों का ध्यान ‘नारों’ के माध्यम से ‘पाठकों’ तक पहुंचने में लगा रहा| फिर इतनी मेहनत करता ही कौन कि ‘भावुक रचनाकार’ के साथ प्रदूषित होते खेत-खलिहान, पेड़-पौधे, गाँव-शहर, नगर-महानगर को देखने-परखने का उपक्रम करता| जिन्होंने किया भी उनके प्रयास को शोर में दबा दिया गया| उन्हें निरा भावुकता और दक्षिणपंथी घोषित करने की कोशिश तो की ही गयी, आलोचना के दायरे में उनके प्रयासों को लाने के लिए भी बहुत कम सक्रियता दिखाई गयी| 

इधर की गजलों में ऐसा नहीं है| ग़ज़ल का स्वरूप प्रकृति की तरह का है जिसमें बदलते सामाजिक परिवेश पर बहुत कुछ कहा गया है| बहुत कुछ लिखा गया है नदियों-तालाबों-पेड़-पौधों की घटती संख्या और विलुप्त के कगार पर पहुंची या होती प्राकृतिक संसाधनों पर| “ग़ज़ल बेहद शाइस्ता और महीन विधा है| हमने इस विधा से प्रकृति और मनुष्य से प्रेम करने की तरतीबें हासिल की हैं| जीव-जंतु बृक्ष, हवा, धूप, समन्दर, रेत, पानी, आकाश, सितारे, सूरज, चाँद ही नहीं, बेज़ान वस्तुएं भी ग़ज़ल के अश्आर में आकर साँस लेने लगती हैं| परिन्दे तो हमारी ग़ज़लों में गहरी सम्वेदना की तरह आते हैं|” गाँव के उजड़ने से जो हालात परिवेश के हुए हैं वह किसी से छुपा नहीं है, इसके विषय में विस्तार से चर्चा आगे की जाएगी| विघटित होती सामाजिक संरचना में सांस्कृतिक एवं सामाजिक प्रदूषण से जिस तरह मानवीयता हताहत हुई वह कोई छिपी हुई स्थिति नहीं है|

आज यदि हम प्रकृति और पर्यावरण की बात करें तो यह ख्याल हर हाल में रखना होता है कि “जीवन जीने के लिए यह सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है कि हम अपने परिवेश से अधिक से अधिक जुड़े हों, उनमें निहित समस्याओं से रूबरू होने की स्थिति में हों और उन प्रश्नों के निराकरण के लिए हर स्वयं को व्यस्तता जैसे माहौल में घिरे हुए पाते हैं| उक्त परिवेश में रहते हुए जितनी आवश्यकता हमारा अपनी जरूरत की चीजों को बनाये रखने की हो उससे कहीं अधिक आवश्यकता इस बात की हो कि हम निर्जन वातावरण में फैली और लगभग बिखरी हुई मानवीय सम्भावनाओं की तलाश के लिए यत्नशील हों| इसके लिए जनमानस के सम्वेदनात्मक धरातल की पहचान आवश्यक हो जाती है; और इस आवश्यकता की पूर्ती के लिए उससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण है आस-पास विद्यमान प्रश्नों से टकराने की इच्छा और आदत को बनाए रखना| तो ग़ज़ल विधा में प्रकृति और पर्यावरण से सम्बन्धित व्यवहार और सिद्धांतों की परख के लिए हम इस दृष्टि को बनाए रखने का प्रयास जारी रखेंगे|

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समय को परखने और समाज की संगति-विसंगति को अभिव्यक्त करने का एक सशक्त माध्यम है कविता| कविता में हम जीवन और जन की समस्याओं को देखते-महसूसते ही नहीं अपितु उसके निराकरण हेतु विकल्प की तलाश भी करते हैं| समय की गंभीरता को देखते हुए समाज की जरूरत को पूरा करने का प्रयास करते हैं| सच यह भी है कि किसी एक वस्तु या स्थिति से न तो समय की गंभीरता को परखा जा सकता है और न ही तो समाज की जरूरत को पूरा करने के लिए आवश्यक ‘विचारों’ में संतुलन स्थापित किया जा सकता है| इसके लिए कई-कई दिन विकल्प की तलाश में भटकना होता है| जब हम कविता में विकल्प की तलाश की बात करते हैं तो ग़ज़ल उपयुक्त और ज़िम्मेदार विधा के रूप में हमारे सामने होता है| ग़ज़ल विधा में इन दिनों ‘परिवेश-निर्माण’ की प्रतिबद्धता देखने को मिलती है| जीवन के वे सभी अवयव, जो एक हद तक आवश्यक हैं यहाँ प्रमुखता से अभिव्यक्त पा रहे हैं| समझना यह भी जरूरी है कि महज अभिव्यक्त ही नहीं पा रहे अपितु व्यापक जन समुदाय तक पहुंचकर व्यावहारिक जीवन का हिस्सा भी बन रहे हैं| इस अर्थ में यह विधा अन्य विधाओं की तरह ‘संस्कार’ भी जन-मानस को दे रही है|

जब यह सच है कि ग़ज़ल जीवन की व्याख्या ही नहीं संस्कार भी है तो उसे प्रेम या प्रतिरोध के दायरे में ही रखकर क्यों देखा जाता है? एक समय था जब यह प्रेमिका को खुश करने के लिए लिखी जाती थी, बाद उसके एक समय ऐसा आया जब इसे लोग अभिव्यक्ति-हथियार के रूप में प्रयोग करने लगे| प्रेम के चंगुल से मुक्त हुई ग़ज़ल विधा कब प्रतिरोध की गलियों में घेरकर सीमित कर दी गयी यह न तो लिखने वाले को पता चला और न ही तो ग़ज़ल-पाठकों को| आज जब ग़ज़ल के वैविध्य की बात जन-सामान्य के समक्ष की जाती है तो वे या तो प्रेम के कहकहे गढ़ते मिल जाते हैं या फिर अति बौद्धिकता के दायरे में रमते हुए परिवर्तन की हुंकार भरते नजर आने लगते हैं|

प्रेम और प्रतिरोध के अतिरिक्त भी ग़ज़ल के पास बहुत कुछ है, मसलन कि प्रकृति, सहयोग, सामंजस्य, सामाजिक एवं सांस्कृतिक फिसलन| इधर दृष्टि दौड़ाने की जोहमत हमारे हिन्दी ग़ज़ल आलोचकों द्वारा बहुत कम की गयी, अन्य तो खैर ग़ज़ल को पढ़ते हैं अच्छा भी लगता है उनको लेकिन अपना विचार देना किसी तौहीनी से कमतर नहीं समझते| ग़ज़ल में इन विषयों को लेकर जो थोड़ी-बहुत कोशिश होती रही है उसके केंद्र में ‘अतीत’ का मोह अधिक रहा है| मोह के दायरे में मूल्यांकन का जो विषय चुना गया अधिकांशतः हिन्दी ग़ज़ल दुष्यंत के बाद, हिन्दी ग़ज़ल दुष्यंत के पहले या थोड़ी और कोशिश किये तो कह दिये कि दुष्यंत की परम्परा पोषित करती समकालीन ग़ज़ल विधा|

आखिर यह समझ क्यों नहीं आ रहा है हमें कि हम उत्तर आधुनिकता में जीवन-यापन कर रहे हैं? दुष्यंत के समय में और आज के समय में बहुत परिवर्तन हुआ है| परिवर्तन का दृश्य यथार्थ है| ‘भूख’ और ‘भरे पेट’ के समीकरण उलझे हुए हैं| सम्पन्नता नितप्रति मुँह चिढ़ा रही है| ‘सूरत बदलनी चाहिए’ पर जोर देने से अधिक सूरत बदलने की ‘कोशिश’ पर बल दिया जा रहा है| जिन ‘नारों’ की जरूरत तब थी अब वे आज के परिदृश्य में आउटडेटेड हो चुके हैं| रहन-सहन, खान-पीन से लेकर चाल-चलन तक के स्वरूप में बड़े बदलाव चिह्नित हुए हैं| राजनीति से लेकर समाज-नीति तक को व्यापक परिवर्तित दृष्टि से देखने-समझने की जरूरत महसूस की जा रही है| ग़ज़लकार ऐसा करने में सफल हुए हैं और अनवरत कर भी रहे हैं लेकिन आलोचकों ने जैसे बंधी-बँधाई लीक पर चलने की कसम खा रखा है|

कुछ क्रन्तिकारी टाइप के आलोचक तो तुलसी को ग़ज़लकार और उनकी रचना विनय-पत्रिका को ग़ज़ल विधा की सर्वोत्कृष्ट सिद्ध करने में मशगूल हैं| कुछ ऐसे भी हैं जो उर्दू और हिन्दी की सीमाओं को स्पष्ट करने में मर-खप रहे हैं| यह तो भला मानिए उन पाठकों का जो ग़ज़ल को समझ-बूझ और अपना रहे हैं अन्यथा तो विचारे आलोचक ‘रेल सी गुजरती’ प्रेयसी को देखते हुए ‘पुल-सा’ थरथराते ही रहते| इधर ज्ञानप्रकाश विवेक, अनिरुद्ध सिन्हा  जैसे सिद्धस्त गज़लकारों की आलोचना-दृष्टि हमें प्रभावित करती है जो हिंदी ग़ज़ल को उसकी सम्पूर्णता में देखने की कोशिश कर रहे हैं| दरवेश भारती, माधव कौशिक, विज्ञान व्रत, अशोक मिज़ाज, देवेन्द्र आर्य, कृष्ण कुमार प्रजापति जैसे ग़ज़लकारों ने यथार्थ चित्रण का नया मुहावरा सृजित किया है जिसमें महज ‘नारे’ नहीं हैं अपितु श्रम-साध्यता का परिपक्व एवं जमीनी अभिव्यक्ति का साहस भी दिखाई देता है| यह साहस सीधे लोक से संस्कार ग्रहण करते हुए जन-समृद्धि का स्वप्न संजोता है| स्वप्न में धरती का सौंदर्य है तो आसमान का प्रदेय भी है| जन का श्रम है तो जीवन का समर्पण भी है| अभावों की पीड़ा है तो समृद्धि का बखान भी है| यह सब इसलिए क्योंकि ग़ज़लकारों ने ‘अंधी गलियों की सच्चाई’ लोगों के सामने रखने की ठान ली है| माधव कौशिक कहते भी हैं-
चाहे अब की बार लहू से ज्यादा महंगा पानी है
हमने भी ज़िन्दा रहने की हर हालत में ठानी है
रोशन सडकों का सन्नाटा चीख-चीख कर कहता है
अंधी गलियों की सच्चाई तुमको बाहर लानी है|” (माधव कौशिक)

‘लहू’ से महंगे ‘पानी’ के इस दौर में सच्चाई को सामने लाने की ‘जिद’ समकालीन हिंदी ग़ज़ल की विशेष पहचान है| यह आपको स्पष्ट दिखाई देगा कि उजाले की चमक-दमक से दूर अँधेरे की सच्चाई को देखने-परखने और लोगों के सामने उसे रखने का साहस दुष्यंत से कहीं अधिक इधर के रचनाकारों में है| ये रचनाकार अभी परिवर्तन के शैशवकाल में नहीं हैं अपितु अनुभव के समृद्ध संसार से बने-ठने हैं| ये जानते हैं कि इस विघटित होते समय में लोगों की सम्वेदनाएँ बिखरी हैं| किस तरह के ज़ख्म लोगों के हृदय में हैं यह उन्हीं बिखरी सम्वेदनाओं से स्पष्ट हो जाता है| अशोक ‘मिज़ाज’ के हवालें से कहें तो-
बदल रहे हैं यहाँ सब रिवाज़ क्या होगा
मुझे ये फ़िक्र है कल का समाज क्या होगा
दिलो-दिमाग के बीमार हैं जहाँ देखो,
मैं सोचता हूँ यहाँ रामराज क्या होगा” (अशोक मिज़ाज)

चिन्तन के विषय यहाँ दो चीजें हैं-एक है ‘समाज’ और दूसरा ‘रामराज्य’| समाज जहाँ सहभागी जीवन प्रवृत्ति का परिचायक है वहीं रामराज्य लोकतंत्रीय जीवन पद्धति की अवधारणा| अब जहाँ ‘व्यक्ति’ से लेकर ‘साहित्यकार’ तक की स्थिति ‘भीड़’ में शामिल होकर परिवेश को अशांति के मुहाने छोड़ देने की हो; वहाँ इन दोनों स्थितियों का अस्तित्व खतरे में नज़र आएगा ही| यह वह समय है जब लोग एक दूसरे पर विश्वास करने की बजाय अविश्वास करना अधिक पसंद करते हैं| यही वजह है कि छोटे से परिवार में भी टूटन-फूटन की शिकायत लगी रहती है|
सिलसिले बढ़ने लगे ये इस नये माहौल में
घर के अंदर रोज़ कितने घर नए बनने लगे
घुट रहे हालात के दम मौसमों की धार से
पेड़ के कच्चे समर भी टूटकर झरने लगे (अनिरुद्ध सिन्हा)

‘घर के अन्दर रोज़’ ‘घर नए बनने’ की प्रक्रिया सामाजिक अवधारणा को मजबूती के साथ तोड़ने की प्रक्रिया है| यह इस देश में पनप रही नयी रवायत है जिसे किसी भी रूप में आज का गज़लकार नहीं होने देना चाहता है| सामाजिकता बनी रहेगी तो कृति की अनिवार्यता और प्रकृति की सकारात्मकता अपने सही अर्थों में बनी रहेगी ही| विशेष यही है कि ग़ज़लकार रागात्मक अनुभूतियों के माध्यम से यथार्थ परिदृश्य का चित्रांकन कुछ इस तरह कर रहे हैं कि हमारे समय का जन-जीवन अपनी विविधता के साथ व्याख्यायित हो रहा है|

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यह समय सही अर्थों में कृति और प्रकृति के बीच गहरे द्वंद्व का समय है| तहस-नहस की प्रवृत्ति से दोनों आच्छादित हैं| घटनाओं की शक्ल में प्राकृतिक आपदाओं की आवृत्ति और प्राकृतिक आपदाओं से भी बड़े स्तर पर कृत्रिम घटनाओं की पुनरावृत्ति ने हमें लगभग हाशिए पर ला खड़ा किया है| वैयक्तिक इच्छाओं से लेकर सामाजिक सहभागिता तक की स्थिति पर ‘विध्वंस’ का जो डर हमारे मन-मस्तिष्क पर छाया है वह इसी द्वंद्व का प्रतीक है| यह अक्सर हमारे लिए अनिर्णय की स्थिति होती है कि मनुष्य द्वारा बनाए गए कृत्रिम घटनाओं से सुरक्षित रहने के उपाय सोचें या फिर प्राकृतिक घटनाओं से स्वयं को बचाए रखने के तरीके विकसित करें? मन ऐसी आशंकाओं से व्यथित रहता है कि यह आवाज़ धीरे से आकर और भी चिंतित कर जाती है-
अभी जो दुःख-भरी आवाज़ सुनी है तुमने
अभी आकाश से टूटा है सितारा यारों
कोई परदे को गिरा देगा अचानक इक दिन
खत्म हो जाएगा सब खेल-तमाशा यारों|” (ज्ञानप्रकाश विवेक)  

आसमान से सितारा का ‘टूटना’ और परदे को अचानक ‘गिरा' देने की जो आशंका कवि ने यहाँ व्यक्त की है दरअसल यही वह ‘घटना’ है जिसके केन्द्र में मनुष्य का सारा अस्तित्व टिका हुआ है| ‘टूटना’ ही आसमान की नियति है और ‘गिराना’ मनुष्य का स्वभाव|  ‘सहना’ मजबूरी बन ‘घटनाओं’ को आत्मसात करना है| सहने की स्थिति में कई बार इन दोनों परिस्थितियों की ‘मार’ हम पर पड़ती है और देखते ही देखते पूरा परिवेश मलवे के ढेर में परिवर्तित होकर रह जाता है| परिवेश मलवे की ढेर में परिवर्तित न हो इसके लिए ‘हालात’ को ध्यान में रखकर चलने की बात गज़लकार करता है| वह चाहता है कि समय और परिस्थिति के अनुकूल ही व्यक्ति आचरण करे| जो नहीं करता उसके लिए माधव कौशिक की ये सलाह कुछ हद तक जरूरी हो सकती है-
हमारी बात को मद्देनजर रखते हुए चलना
बुरे हालात को मद्देनजर रखते हुए चलना
ज़रा-सा भीगने से तन की मिट्टी छूट जाती है
तो फिर बरसात को मद्देनजर रखते हुए चलना
कहीं ऐसा न हो जज़्ब कर ले भीड़ तुमको भी
तुम आदमजात को मद्देनजर रखते हुए चलना
सुबह के शोख सूरज का उजाला देखने वालों
अँधेरी रात को मद्देनजर रखते हुए चलना” (माधव कौशिक)

‘भीड़’ में विवेक की सामर्थ्य नहीं होती अनुसरण की प्रवृत्ति जरूर होती है| अनुसरण में भी अंधानुसरण की स्थिति विशेष पायी जाती है| इस स्थिति से बाहर निकलकर चलने की जरूरत है| जो सूरज की रोशनी के कायल हैं उन्हें अँधेरे को पहचानने की सामर्थ्य विकसित करनी होगी| जहाँ सामर्थ्य की बात होगी वहां विनाश नहीं निर्माण की बात होगी| प्रकृति निर्माण की सम्वाहक हो तो कुछ बात बने लेकिन मनुष्य की अन्धानुकरण प्रवृत्तियाँ उसे ऐसा नहीं रहने देतीं| वह अपनी व्यक्तिगत स्वार्थों की पूर्ति के लिए प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करता रहता है| एक समय के बाद न तो उसका स्वार्थ सिद्ध हो पाता है और न ही तो प्रकृति संतुलित रह पाती है| प्रकृति के असंतुलित होने के विशेष कारणों में जंगलों का खाली होना, पेड़ों की अंधाधुंध कटाई चर्चित हैं| कहाँ तो मनुष्य के लिए जंगल खतरनाक हुआ करते थे कहाँ तो गज़लकार ने जंगल के लिए आदमी को ही एक ‘ख़तरे’ के रूप में चिह्नित किया है|
जंगलों को आदमी से आज खतरे हैं बहुत
शहर तो बसते गये पर पेड़ उजड़े हैं बहुत|
सोचता हूँ अब परिंदे घर बनाएंगे कहाँ
अबके अंधे आँधियों में पेड़ उखड़े हैं बहुत|” (कुंअर बेचैन)

आँधी-तूफ़ान ऐसे ही नहीं आते| ऐसे ही पेड़ों का उखड़ना नहीं हो जाता है| पंक्षी घर से बेघर हो जाने के लिए यूं ही नहीं वेबस हो जाते| यह सब हमारी स्वार्थता की वजह से होता है| यह इसी स्वार्थता का परिणाम है कि हम स्वयं को एक घुटन भरे बंद कमरे में कैद कर लिए हैं और पंछियों आदि के बसेरे को लेकर लापरवाह हो गये हैं| पूछे गये हालचाल के परिप्रेक्ष्य में ज्ञान प्रकाश विवेक का यह कहना मनुष्य को यथार्थ परिदृश्य से अवगत कराना है-
“शेष तो सब कुशल है, अमन है
बन्द कमरे में थोड़ी घुटन है
पेड़ को काटने वालों सोचो
ये परिंदों का भी इक वतन है”         ज्ञानप्रकाश विवेक  

जिस समय से प्रकृति द्वारा दिए गये सभी संसाधनों पर हमने अपना एकाधिकार रखना प्रारंभ कर दिया, सही अर्थों में समस्याएँ उसी दिन से हम पर हावी होने लगीं| आज पक्षियों की ही नहीं स्वयं अपने समानधर्मी समुदाय के प्रति भी बेफिक्री के स्वभाव में हैं| हम तरह के संसाधनों का दोहन ही हमारी प्रकृति होती जा रही है| इस दोहन-क्रिया में हम इतने अधिक मशगूल हुए कि नदियों-तालाबो को लगभग ख़तम करने पर तुल पड़े| अशोक मिज़ाज का इस रूप में सचेत करना उचित लगता है कि दोहन-प्रक्रिया से दूर होकर हमें धरती के लिए कुछ विशेष करने की जरूरत है ताकि आने वाली सदियाँ हमें हमारे उस देन की वजह से जाने न कि स्वार्थपूर्ण आचरण पर अपना क्षोभ प्रकट करे-
खींचकर नदियों का पानी सब समन्दर पी गये
चीख़ती है प्यास हरसू हमको पानी चाहिए
हो गये कागज़ के टुकड़े, फूल भी मुरझा गये
जिनको सदियाँ याद रक्खें वो निशानी चाहिए (अशोक मिज़ाज)|”

 कौन कहे सदियों तक याद रखने वाली निशानी देने की इधर का मनुष्य अपनी गलत नीतियों और हीनताबोध की ग्रंथि से उलझे मानसिकता द्वारा मनुष्य प्रकृति को हर समय दिग्भ्रमित करने का कार्य करता आया है| कहने को तो वह चालाक दिखाई देने लगा लेकिन यथार्थतः अपने ही परिवेश को विनष्ट करता हुआ मिला| जिस परिवेश फूलों, पेड़-पौधों की सघन छाया हुआ करती थी उसी परिवेश में यदि गहराई से देखो तो “बबूलों के बनों का पर्यटन है/ यहाँ प्रारब्ध में सबके चुभन है/ वृथा है दोष आरोपन किसी पे/ हमारा दुःख हमारा ही सृजन है (डॉ. शिव ओम अम्बर)|” जिसके जनमदाता हम स्वयं हों उसके लिए किसी और पर दोषारोपण ठीक नहीं| यह भी कि हम अपनी कुनीतियों पर विचार करने से अधिक दोषारोपण पर विचार पहले किया करते हैं|

यही वजह है कि कुछ विशेष गुणों की वजह से जिस मनुष्य को सामाजिक प्राणी कहा गया उसके सामने “बाघों की क्या बात करें/ आदमी आदमखोर बहुत है|” यह आदमखोरी परिवेश को प्रदूषित करने में लगाई गयी, यह सबसे बड़ी विसंगति रही हमारे समय की| कहते हैं कि अपने समूह और अपनी नस्ल के प्रति प्राणी बहुत ही सम्वेदनशील होता है लेकिन यह भी सही है कि एक आदमी दूसरे आदमी को नहीं देखना चाहता| माधव कौशिक कहते हैं कि “ऐसा क्या बँटवारा, तौबा/ पेड़ अलग है, पात अलग है/ बहुत संभल कर इससे मिलना/ इंसानों की जात अलग है|” विरोध और घृणा को लेकर आज हमारे परिवेश की स्थिति यहाँ तक आ गयी है कि “रोज़ भरा है रोज़नामचा हत्यारों के बीच/ खड़ा हुआ हूँ बिजली की नंगी तारों के बीच (ज्ञानप्रकाश विवेक)|”

यहाँ से न चलना बनता है और न ही तो ठहरना| हर व्यक्ति इसी हालत और हालात में है और ऐसा भी नहीं है कि इस तरह के माहौल पैदा करने वाले लोग किसी दूसरी दुनिया से आते हैं; “दिन में जो गोलियां चलाते हैं/ रात में जश्न वो मनाते हैं|” जश्न मनाने के तौर-तरीके में भी इधर बड़ा बदलाव दिखाई दिया है, इसलिए माधव कौशिक सरीखे गज़लकार अपने घर के दीवालों को देखते रहने की बात करते हैं-“जाने किस कोने में रख जाये कोई बारूद-आग/ ऐहतियातन तू भी अपने घर की दीवारों को देख (माधव कौशिक)|”  यह सही अर्थों में दर-ओ-दीवारों देखकर देखते रहने का समय है क्योंकि आँधी-तूफ़ान से तो आदमी फिर भी बच निकल सकता है लेकिन गोला-बारूद और पिस्तौल से बचने की उम्मीदें रखना मूर्खता है|

समय प्रकृति द्वारा अनुशासित होता है तो समाज मनुष्य द्वारा| प्रकृति के विरोध में जब समय होता है (जिसे मनुष्य स्वयं के संरक्षण में देखने-परखने की कोशिश करता है) तो विध्वंस निश्चित माना जाता है| समाज मनुष्य के अनुकूल न हो तो परिवेश असंतुलित बन कलह और द्वेष को आमंत्रित करता है| कवि ‘रक्षक’ की भूमिका में भावुकता का सृजन करता है जहाँ से सम्बन्धों को जीवित रखने की जरूरत महसूस होती है| रागात्मक अनुभूतियाँ समय और समाज के बीच सामंजस्य बनाने का कार्य करती हैं| अनुभूतियों का सम्बन्ध मनुष्य द्वारा अर्जित अनुभव से है| जो वह भोगता है दृष्टि-विकास वहीं से करता है| वहीं से वह दूसरों को भी चलते और बढ़ते रहने के लिए प्रेरित करता है| 

मनुष्य और प्रकृति के बीच जितना प्रेम रहा है उससे कहीं अधिक अंतर्द्वंद्व दिखाई देता है| प्रकृति ने दिया है अधिक लिया बहुत कम लेकिन मनुष्य ने जब भी प्रकृति की तरफ देखा है लेने के लिए देखा है| तुलसीदास ने भी कहा था-‘हरो चरहिं तापहिं बरत फरत पसारहिं हाथ’| प्रकृति ने मनुष्य को बनाया है यह तो शाश्वत सच है लेकिन मनुष्य ने भी प्रकृति को सजाया और संवारा है इनकार इस सच से भी नहीं किया जा सकता है| कृति-प्रकृति के अन्तर्सम्बन्ध को प्रगाढ़ता प्रदान करने में इस विधा के योगदान कभी को विस्मृत नहीं किया जा सकता| जन-जल-जंगल-जमीन-जीवन इस धरती पर उपहार है प्रकृति का| इनमें से किसी की उपेक्षा प्रकृति के नियमों के खिलाफ लाकर खड़ी कर देती है| हम जब विकास की धारणा को लेकर आगे बढ़ते हैं तो कहीं न कहीं ‘विनाश-प्रक्रिया’ का हिस्सा होने से स्वयं को रोक नहीं पाते| ग़ज़लकारों की यह विशेष इच्छा रही है कि ‘विनाश’ की भावना को तजकर ‘निर्माण’ की नीयति को महत्त्व दिया जाए|  


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आज हमारे लिए स्पेस कम हुआ है ऐसा हर कोई कह रहा है जो वर्तमान है| वर्तमान होना सम्पूर्ण चेतना के साथ दिखाई देना ही नहीं अपनी भूमिका में सक्रिय होना है| सक्रिय व्यक्तित्व अच्छी तरह से परिचित है कि इधर के दिनों में गाँव का नवीनीकरण किया गया है| वह गाँव, जो कभी मोह और ममता का पर्याय हुआ करता था, आज व्यापार और बाज़ार का एक माध्यम बनाया जा रहा है|

गाँव की स्वस्थ प्रकृति पर कभी भोजपुरी का एक गीत सुनने को मिला था – “चारों ओरी ताल तलैया/ घन बगिया के छांव रे!/ स्वर्ग से सुंदर लागे बबुआ/ आपन गाँव बिराँव रे|” अब ‘घन बगिया’ का स्थान जंगली बबूल के पेड़ों, छोटे-छोटे पगडंडियों के सहारे विभाजित खेतों और प्लाटों आदि ने ले लिया है तो ‘ताल-तलैया’ लगभग ख़तम होने के कगार पर पहुँच गयी हैं| दूर-दूर तक पेड़-पौधों के दर्शन नहीं होते-“धूप बिखरी है सारे रास्तों पर/ पेड़ भी अब खड़े नहीं मिलते (अशोक मिज़ाज)” बड़े बाग़ या तो काट दिए गये हैं या फिर लगातार काटे जा रहे हैं- “पहले जैसा गाँव नहीं है/ पेड़ बहुत छाँव नहीं है बाहर (धुप खड़ी है)” ये परिदृश्य विकास के नाम पर है| फॉर-लेन सडकों के लिए स्पेस चाहिए तो उसके लिए बलि बृक्षों की दी जाती है| ऐसा करते हुए थोडा भी नहीं सोचा जाता कि परिवेश की स्थिति का क्या होगा? हवा, पानी और मौसम का क्या होगा?

एक समय था जब मौसम की रूमानियत को गाँव में रहते हुए अच्छे तरह से समझा जाता था-“मौसम को समझा करता था/ वो जब गाँव हुआ करता था एक समय आज है कि गाँव से निकलकर लोग शहरों और महानगरों की तरफ पलायन करने लगे हैं| यहाँ आने के बाद भी गाँवों का अतीत उन्हें जीने नहीं देता और स्वस्थ बगीचों और प्रेम भरा अपनत्व उन्हें सालता रहता है| ऐसे समय में कृष्णकुमार प्रजापति का ये प्रश्न प्रासंगिक हो उठता है कि-“गलियों में नीम, पीपल की छाँव ढूँढता है/ नादान, शहर आकर क्यूँ गाँव ढूँढता है|शहर में आकर गाँव को ढूंढना नादानी नहीं है अपनत्व और सम्बन्धों की ऊष्मा है जो उसे ऐसा करने के लिए प्रेरित करती है| गाँव यही तो सिखाता है आखिर? शहर और महानगर अपनी प्रारंभिक अवस्था से ही संवेदनहीन रहे हैं| इतने संवेदनहीन कि अक्सर इनके विषय में कहा जाता है कि “महानगर में एक मरे या मरें हज़ारों लोग/ मौत सभी की खो जाती है अख़बारों के बीच (ज्ञानप्रकाश विवेक)|” जहाँ मौत जैसे अति भयानक हादसे अख़बारों की सुर्खियाँ बनकर खो जाती हैं वहां जैसी दयनीय स्थिति और क्या होगी भला? गाँव से निकलकर शहर में आने की व्यथा-कथा को माधव कौशिक कुछ इस तरह अभिव्यक्त करते हैं-यथा,
“गाँव से निकले कि सब फंस कर शहर में रह गये
सिर्फ उन की याद के पत्थर ही घर में रह गये|
मंजिलों पर पहुँच कर लोगों को दिखलाऊँगा क्या
पाँव के छाले तो सारे रहगुज़र में रह गये|
क्या हुआ, हँसते हुये लोगों को सड़कें खा गईं
सिर्फ पथराये हुये चेहरे नगर में रह गये|
मैं तो उन लोगों का सबसे पूछता हूँ हालचाल
जो सफर में साथ थे लेकिन सफर में रह गये|

          सफ़र में साथ रहने वाले व्यक्ति के साथ का सफ़र में छूट जाना कितना कष्टदायी होता है यह शहर में रहने वाला नहीं, क्योंकि उसे अधिकतर ऐसी घटनाओं को सहने की आदत होती है, गाँव में रहने वाला ही बता सकता है| यहाँ रहने वाले चेहरों पर मुस्कान नहीं पत्थरों की तरह निर्जीवता निवास करती है| आज के शहरों के हालात तो और भी बदतर होते जा रहे हैं जब शहर का कालोनी-संस्कृति में तेजी से विकास हो रहा है| ऐसे में यादों के रूप में जो पुराने घर बचे हैं और जिनसे स्मृतियाँ कुछ ताज़ी होती हैं, उन्हें खोने का डर भी ग़ज़लकारों को है| “शहर के चारों तरफ कालोनियां बनने लगीं/ एक दिन ये घर पुराने लापता हो जायेंगे  (अशोक मिज़ाज)” सच यह भी है कि शहरों का परिदृश्य अब इतना भयानक हो गया है कि यह कहना किसी प्रकार का कोई अतिश्योक्ति नहीं है-अब न लपटें ही निकलती हैं न उठता है धुआँ/ जल रहा है एक ऐसी आग में मेरा शहर|” (अशोक रावत)

          यह सच है कि समकालीन हिन्दी ग़ज़ल अपनी सम्पूर्ण ऊर्जा के साथ ऐसे परिवेश निर्माण के प्रति प्रतिबद्ध है कि कुछ हो न हो मनुष्य अपने मानवीय मार्ग पर बढ़ता रहे| प्रकृति के अंश को हड़प लेने से मनुष्य-परिवेश समृद्ध कभी नहीं हो सकता क्योंकि वह स्वयं प्रकृति का एक हिस्सा है| अपनी जरूरतों से अधिक तोड़-फोड़ की नीयति को यदि समय रहते हम अपना लें तो न तो पर्यावरण को कोई क्षति पहुंचे और न ही तो समाज को किसी अनिष्टकारी समस्याओं का सामना करने के लिए भयभीत रहना पड़े| अकाल, भूकंप, बाढ़ ये जितनी भी प्राकृतिक आपदाएं हैं कहीं न कहीं हमारे-आप द्वारा ही सृजित की गयी हैं| यदि हम सही तरीके से समय और समाज की जरूरतों पर स्वयं खरा साबित करें तो समस्याएँ विकराल रूप कभी न ले पाएं|

(नई धारा में अगस्त-सितम्बर 2019 के अंक में 'समकालीन हिंदी ग़ज़ल' के नाम से प्रकाशित)





Thursday, 28 November 2019

परिवेश के बड़े-बुजुर्ग जिदिया गये हैं



कई जगह वर्षा हो रही है| घरों में पानी का जमाव शुरू हो चुका है| खेत में फसल को भारी नुक्सान  पहुंचा है| लगातार हो रही बारिस से जन-जीवन प्रभावित है| अफरा-तफरी मची हुई है| लोग कभी इन्द्र को कोस रहे हैं तो कभी पेड़-पौधे के प्रति हमारी लापरवाही को| वर्षा नहीं हो रही थी तब भी यही स्थिति थी| कोसने का कार्य यही था|

इधर परिवेश के बड़े-बुजुर्ग जिदिया गये हैं| इस जिदियाने की स्थिति को मैं वर्षा से हटकर साहित्य में देख रहा हूँ| इधर के विमर्श भयानक बारिस का रूप ले लिए हैं| लगातार हो रही विमर्श-वर्षा इस समय साहित्य-जगत के लिए बहुत ही हानिप्रद महसूस हो रही है| कई लोग जो अपने किले सुरक्षित किये हुए थे अब या तो जर्जर होकर गिर रहे हैं या फिर विमर्श-बूँद के जमाव से मुसीबतों को झेलना पड़ रहा है| पानी के लिए हम इन्द्र या फिर असंतुलित पर्यावरण को दोषी मान रहे हैं तो विमर्श-वर्षा के लिए युवाओं और फेसबुक को दोषी ठहरा रहे हैं|

जितने निरंकुश इन्द्र हैं उतने निरंकुश युवा हैं| जितनी समस्या पर्यवारण के असंतुलन से उत्पन्न हो रही है उनकी नजर में वही असंतुलन फेसबुक के बढ़ते कदम से पैदा हुई है| बुजुर्ग अपने समय की बात रखते हैं| क्या मजाल कोई युवा आचार्य द्विवेदी, शुक्ल, राजेन्द्र यादव, धर्मवीर भारती जैसे सहृदय से प्रश्न करने की हिमाकत कर सके? एक लेख भेजते थे छापना या न छापना उनका ही मसला हुआ करता था| कितने लोग बुढ़ा गये लेकिन सरस्वती से लेकर धर्मयुग तक छपने के काबिल नहीं हुए| यह भी समय था साहित्य का| गिने चुने तो कवि और लेखक हुआ करते थे|

किले सुरक्षित करके बैठे बुजुर्गों की यह भी एक बड़ी चिंता है कि आज तो हर कोई धर्मवीर भारती बने घूम रहा है| आचार्य द्विवेदी से ज्यादे ओहदे का स्वयं को मान रहा है| सभी राजेन्द्र यादव हुआ चाहते हैं| लेखिकाएँ अब इन्हीं के इर्द-गिर्द रहती हैं| साहित्य-पितामहों की ऐसी उपेक्षा और कभी हुई थी क्या? कैसा तो युग आ गया है कि बड़े बुजुर्ग की कोई गिनती ही नहीं है|

विमर्श-वर्षा की मूसलधार बूँदों से भयभीत बुजुर्ग कोसने की प्रक्रिया में ईर्ष्या को सामिल करते हुए यह भी कह रहे हैं कि कितने तो बेशर्म हैं आज के लोग, स्त्रियों पर ऐसा लिखते हैं जैसे उनकी सारी समस्याएँ यही लोग झेलते हैं| हमारे समय में भी स्त्री विमर्श हुआ करता था| मजाल क्या कि घूंघट से बाहर की स्थिति का वर्णन करें| यह बात और है कि लेखिका बनने-बनाने की प्रक्रिया में घूँघट के पट खुलते हमारे ही यहाँ थे|

बारिस जैसे-जैसे बढ़ रही है बुजुर्ग कवियों/लेखकों का पश्चाताप वैसे-वैसे बढ़ रहा है| अब यह पश्चाताप गाली के रूप में परिवर्तित होता चला जा रहा है| देखो तो ससुरे.....

क्रमशः  

Tuesday, 26 November 2019

हिमाचली टोपी का आकर्षण.....

यूं तो हिमाचल प्रदेश मेरे लिए बड़े आकर्षण का केंद्र रहा है लेकिन इधर कुछ अधिक ही प्रिय लगने लगा है| लोग तो फिलहाल पहाड़ के अच्छे हैं ही लेकिन और भी कहूं तो यहाँ के कवि और कविताएँ मुझे बहुत प्रिय हैं| जन और जमीन से जुड़ी सम्वेदनाओं को परखना हो तो इधर आशा भरी निगाहों से देखना पड़ता है|
खैर... आज का विषय मेरे लिए कवि और कविता नहीं हैं| पहाड़ के सौंदर्य और सौदर्यशाली लोग भी नहीं हैं| आज जो मैं कहना चाहता हूँ वह यहाँ की टोपी से जुड़ा हुआ मामला है|
दरअसल पिछले कई वर्षों से जब भी किसी हिमाचली को टोपी पहने हुए देखता हूँ तो उसकी तरफ आकर्षित होते चला जाता हूँ| कई बार तो कल्पना में बहुत सुन्दर टोपी पहन भी चुका हूँ| पहने हुए मैं बहुत अच्छा लगा हूँ कई बार| कई बार यह सोचता रहा हूँ कि कोई आए और एक टोपी गिफ्ट कर जाए|

हिमाचल के कोई भी साथी मिलते हैं तो यह आकांक्षा बलवती हो उठती है कि क्या पता जाते-जाते वह टोपी पहना जाएं....? लेकिन ऐसा होता नहीं| जो आता है वह चला भी जाता है और मैं बस यह सोचते हुए फिर पीछे रह जाता हूँ कि क्या पता कोई फिर आए और हिमाचली टोपी दे जाए| ऐसा क्यों होता है कि आप कुछ सोचते रहते हैं और वह पूरा नहीं हो पाता है?
इधर मेरे साथ कई बार धोखा हुआ| कई बार लोग आए टोपी हाथ में लिए हुए और चले गये लेकिन मेरी इच्छा पूरी न हो सकी| अब मैं उनसे मांग भी नहीं पाया| मांगते-मांगते कई बार रुक भी गया| सोचा कि क्या सोचेंगे लोग कि देखो एक टोपी के लिए मरा जा रहा है?
अब ऐसा भी नहीं है कि हिमाचल वाले जानते नहीं मुझे| सब जानते हैं| मानते भी हैं लेकिन टोपी नहीं पहनाते| पता नहीं क्यों? जबकि यह भी सच है कि मैं हिमाचली संस्कृति से लेकर वहां की टोपी संस्कृति का भी पूरा सम्मान करता हूँ |
हिमाचली टोपी का शौक बढ़ा जा रहा है इधर| इधर एक ख़ुशी भरा खबर है| जालन्धर की कवयित्री डॉ. वीणा विज जी ने टोपी गिफ्ट करने का वायदा किया है| यह मेरे लिए ख़ुशी की बात है| ख़ुशी हकीकत में तब्दील हो इसके लिए जालंधर पहुंचना मेरा आवश्यक है| अब यदि पहुँचने से पहले ही टोपी किसी और को दे दी गयी तो...? यह बड़ा दुर्भाग्य होगा| खैर देखते हैं....भविष्य क्या कहता है....|

अवनीश के पास अपने समय को लेकर कई प्रश्न हैं




नवगीत विधा ने निश्चित तौर पर गीतों की शुष्कता को समाप्त करते हुए विषयों के चयन और कहन को विशिष्ट बनाया है| समाज का अंतिम आदमी से लेकर अंतिम स्थिति तक इस विधा के अभिव्यक्ति-दायरे में है| पाठक यहाँ आने के बाद रोता और हँसता नहीं अपितु समय की शिला पर बैठकर बदलते समाज की रंगतों पर चिंतन करने के लिए विवश होता है| यह विवशता इसलिए नहीं है कि कोई मजबूर कर रहा है उसे अपितु इसलिए है क्योंकि यथार्थ परिदृश्य यथास्थिति को त्याग कर बदलाव की मांग पर है| यह मांग मनुष्य को मनुष्यता के मार्ग पर लाने की तो है ही उसे निराशा के गहरे खोहों से बाहर निकालकर उत्सवधर्मी बनाने की भी है|

यह सच है कि समाज का अधिकांश अभावों से भरा जीवन जीने के लिए अभिशप्त है लेकिन सच यह भी है कि अधिकांश जीवन-निर्वहन के प्रति गैर-जिम्मेदार और अव्यावहारिक है| यह अव्यावहारिकता कहीं और से नहीं आई है हमारे अपने परिवेश ने दिया है| उस परिवेश ने जहाँ सूचना क्रांति का उत्सव मनाया जा रहा है| डिजिटल इण्डिया की तैयारियां की जा रही हैं| जन्म और मृत्यु पर विजय प्राप्त करने की खोज की जा रही है| जीवन को किस तरीके संतुलित रखा जाए इस पर कम, किस तरीके उसे झंझावातों में उलझा कर झूलने के लिए प्रेरित किया जाए, इस पर अधिक ध्यान दिया जा रहा है|
इन सभी स्थितियों पर विचार करते हुए हम इस पर भी विचार करते हैं कि आम आदमी के जीवन में छांव के कितने भी सुखद एहसास उसके हृदय को उत्सवधर्मी बनाते हों लेकिन छाओं की ईर्ष्या में “दिन कटे हैं धूप चुनते” इस सच से वह इंकार नहीं कर सकता| यह स्वीकार ही कविता का स्थापत्य है और रचनाकार का दायित्वबोध| अवनीश त्रिपाठी का रचनाकार मन इस दायित्वबोध से कितने गहरे में जुड़ा हुआ है वह अपने संघर्षों के उन लम्हों में जाकर आप देख-पढ़ सकते हैं जहाँ “दिन कटे हैं धूप चुनते|” यह संग्रह बेस्ट बुक बडीज, नई दिल्ली से प्रकाशित होकर आया है|

अवनीश के पास अपने समय को लेकर कई प्रश्न हैं| सृजन से लेकर समाज की संगति-विसंगति में हो रहे परिवर्तन उन्हें व्यथित करते हैं तो गति-दुरगति के प्रति एक जिम्मेदार भी बनाते हैं| जब उनका व्यथित कवि-हृदय जानना चाहता है कि----
“क्यों जगाकर
दर्द के अहसास को
मन अचानक मौन होना चाहता है?
तो यह प्रश्न भी सहज रूप में जन्म लेता है कि
“चन्दन घिसते
तुलसी बाबा
औ’ कबीर की बानी
राम रहीम सभी आतुर हैं
कहाँ गए सब ज्ञानी?”
इधर जिस तरह से ज्ञान का विस्फोट हुआ है हर तरफ वक्ताओं की नई फ़ौज खड़ी दिखाई दे रही है| हर कोई समय का अपनी तरह से अनुवाद कर रहा है लेकिन सार्थक मुद्दों तक न तो पहुँच पा रहा है और न ही तो किसी को पहुँचने दे रहा है| अवनीश यह मानते हैं हवा-हवाई हाथ झटकने से कुछ भी नहीं होने वाला है--
चुभन बहुत है
वर्तमान में
कुछ विमर्श की बातें हों अब
तर्क-वितर्कों से
पीड़ित हम
आओ समकालीन बनें|
जब हम समकालीन बनेंगे तो हमारे पास समय की जरूरतों पर विमर्श करने का विवेक विकसित होगा न कि विद्वता दिखाने की मूर्खता|

समकालीन होने की स्थिति में अवनीश युवा हैं इसलिए संघर्ष की अधिकांश चिंता अभी-अभी समाज में आए विसंगतियों को लेकर है| यह विसंगतियाँ मीठे में पड़े उस जहर के समान हैं जिन्हें हम खाए जा रहे हैं और यह नहीं समझ पा रहे हैं कि हमारा अंत हो रहा है--
"इंटेरनेट, /सोशल साईट से /रिश्ता-अपनापन" बढ़ाकर “टी.वी. चेहरे/मुस्कानों के/मँहगे विज्ञापन” में हम मशगूल होते जा रहे हैं| यही दुनिया है और यही संसार है|
प्यार-तकरार से लेकर मान-मनुहार तक की स्थितियां यहीं घटित हो रहीं हैं और यहीं पर समाप्त हो जा रही हैं| समाज और समुदाय की खोज-खबर तो दूर घर-परिवार में क्या कुछ चल रहा है यह भी देखने-समझने का समय हमारे पास नहीं है| परिणाम यह है कि हमारे सामने “धूप-रेत/ काँटों के जंगल/ ढेरों नागफनी” उग आईं हैं और “एक बूँद/ बंजर जमीन पर/ गाँड़र, कुश, बभनी” फ़ैल चुकी हैं|

भारत देश में ‘जमीन की उर्वरता’ वैसे भी एक समस्या थी इन समस्याओं ने सामाजिकों को और अधिक उलझा दिया है| जो कुछ ‘खाद, पानी, बिसार’ पूर्वजों के हिस्से से मिल रहे थे उसे इन नव्य माध्यमों ने मृतप्राय कर दिया है| यहाँ आकर जब अवनीश कहते हैं कि “भोजपत्रों के गये दिन” तो यह समझते देर नहीं लगती-
“खुरदरी
होने लगीं जब से
समय की सीढ़ियाँ
स्याह
होती रात की
बढ़ने लगीं खामोशियाँ
और
चिंतन का चितेरा
बन गया जब से अँधेरा
फुनगियों
पर शाम को बस
रौशनी आती है पलछिन
एक बूढ़ी-सी उदासी
काटती है जब घरों में
सिलवटें,आहट, उबासी
सुगबुगाहट बिस्तरों में|”

रातें खामोश होती गयीं और सुबहें निराशा में तब्दील| ‘एक बूढ़ी-सी उदासी’ घरों में जो फैली उसके लिए सम्वादहीनता कारण बनी| घर का हर आदमी अपरिचित लगने लगा| कवि यह चिंता उसे अपने समय के यथार्थ से गहरे में जोडती है|
सामाजिक संरचना वर्तमान की कुछ ऐसी ही है| परिवेश और परिवार की बदहाली में जातीय विभेदता भी अपना महत्त्वपूर्ण रोल निभा रही है| यहाँ मनुष्य मनुष्य को नहीं देखना चाहता| इस अर्थ में कवि अपने समय की राजनीतिक दुरभिसंधियों से गहरे में पीड़ित रहा| जनता जिस तरीके से वोट का हेतु बनाई जाती है उससे यह तो प्रमाणित हो ही जाता है कि--
‘जीत हार के
पाटों में हम
घुन जैसे पिसते हैं
भींच मुट्ठियाँ
कान छेदतीं
दुत्कारें सहते हैं|”
इस दुत्कार में स्वाभिमान तो जाता ही है अस्तित्व के समाप्त होने का भय भी बना रहता है| भय से बचाव के रास्ते में भारतीय ‘लोक’ ‘तंत्र’ से बेदखल तो पहले से था इधर गायब होता जा रहा है| ‘टूटी खटिया पर नेता जी/ बैठ रहे हैं जान-बूझकर/ खेत और खलिहान झूमते/ बोतल, वादे हरी नोट पर/ टुन्न पड़ा है रामखिलावन|” अब यहाँ ऐसा नहीं है कि रामखिलावन पागल या नादान है; दरअसल वह राजनीतिक षड्यंत्रों का शिकार है| देने वाले नेता दारु की बोतल पकड़ा सकते हैं लेकिन उनके जीवन-यापन के साधन उपलब्ध नहीं करवा सकेंगे| इन्हीं विसंगतियों में पड़कर आम आदमी गायब हो जाता है|

लोक के गायब होने में ‘अर्थ’ की भूमिका केन्द्र में रही जहाँ ‘क्रूर ग्रहों के कालचक्र में/ फूले-पिचके तन हैं मन हैं|’ ग्रह न रूठते तो कोई गरीब क्योंकर बनता? आम आदमी के पास शक्ति ही क्या है आखिर? वह अभी उठ ही रहा था कि“मीट्रिक टन-क्विंटल ने आखिर/ कुचल दिया माशा-रत्ती को|” ये रत्ती कोई और नहीं इस अर्थतन्त्र का सबसे अहम् अंग है-आम आदमी| वह खटता रहा और उसे वास्तविक स्थिति से दूर ही रखा गया| जिन्होंने कुछ किया नहीं उसे सब कुछ सौंप कर मुक्त हो जाने का आश्वासन दिया गया| जब अवनीश कहते हैं कि “हम रहे अनजान/ हरदम ही यहाँ/ हाथ के तोते/ अचानक उड़ गये” तो ठगा हुआ चेहरा अपना वर्तमान हो उठता है| विकसित हो रहे समय में यहाँ सामाजिकता नहीं अर्थ महत्त्वपूर्ण है|

इधर जब से ‘अंधियारों ने उजियारों के बिस्तर बाँध दिये’ तभी से पर्यावरण की समस्याएँ अपने मूल रूप में वर्तमान है| पूरा ‘सावन रीत’ जाता है बूंद तक का अता-पता नहीं होता| किसानों से लेकर परयावरण पारिस्थितिकी तक के संकट को शब्दों में कह जाना सहज नहीं है क्योंकि इधर ‘चीख, तल्खियों वाले मौसम हैं, बरसात नहीं|” जिस दिन बरसात होगी उस दिन“नदी-ताल-पोखर की भाषा/ रेत नहीं, पानी समझेगा|” यहीं उम्मीदें हरी होंगी और यहीं समय अपने हरेपन में होने का एहसास कर सकेगा| यह एहसास ही उम्मीदों को पंख देने के लिए पर्याप्त हैं|

ऐसी बहुत-सी चिंताएं हैं अवनीश त्रिपाठी की जिनके आसपास हम और आप मंडरा रहे हैं| ऐसी बहुत-सी स्थापनाएं हैं इस संग्रह की जो आपको सोचने के लिए विवश करती हैं| बहुत-बातें हैं जिनके माध्यम से आप अपने समय और समाज को दो कदम पीछे हटकर देखने का प्रयास करते हैं तो दो चार कदम आगे बढ़कर उनमें आ रही परिवर्तनों को मानव-जगत के अनुकूल बनाने का साहस करते हैं| यह साहस जितनी सिद्दत से वर्तमान है इस संग्रह में उसका स्वागत किया जाना चाहिए| गीत की भावुकता से दूर तर्कशील प्रश्नों को लाने की वजह से भाषा थोड़ी दुरूह जरूर हुई है लेकिन सम्प्रेषण बहुत सुन्दर बन पड़ा है| यहाँ पाठन के समय शब्दों की खनखन आराम सुनी जा सकती है|