Thursday, 27 August 2020
पांजाब में साहित्य की अलख जगा रहे हैं यू०पी०पूर्वांचल के होनहार युवा अनिल पांडेय
संस्था हो, और उसका एक मजबूत व सांगठनिक ढांचा हो, जिसके अंतर्गत साहित्य व समाज के लिए कुछ बेहतर करने का मौका मिल सके, हालाँकि इस कार्य योजना पर तभी से कार्य आरंभ किया जा चुका था। किंतु अनेक आर्थिक व सामाजिक परिस्थितियों के कारण इसे मूर्त रूप दे पाने में कुछ अड़चनें आ रही थी, परंतु अब समय अपनी सही गति से आगे बढ़ रहा है, साथ ही अनेक साहित्यिक व सामाजिक संस्थाओं व समाज के प्रबुद्ध वर्ग खासकर मीडिया, व अनेक साहित्यकारों बुद्धिजीवियों एवं स्वयंसेवी संथाओं के सहमति से संस्था के सांगठनिक ढांचे को मूर्त रूप दिए जाने का कार्य आज सम्पन्न किया गया।
विपरीत परिस्थितियों में भी यह संस्था अपने कार्यों नियमो के अंतर्गत साहित्यिक और सामाजिक क्षेत्र में अपना विशेष योगदान देती रहेगी | संस्था के संस्थापक अध्यक्ष का कार्यभार श्री दिलीप कुमार पाण्डेय जी को सौंपते हुए उन्होंने यह विश्वास जताया कि इनके नेतृत्व में यह संस्था अपने मूल उद्देश्यों पर अडिग रहते हुए उत्तरोत्तर गतिशील बनी रहेगी।
साहित्य, संस्कृति और समाज-हित के लिए सक्रिय रहेगा संस्थान : अनिल पाण्डेय
26 अगस्त, 2020 को बिम्ब-प्रतिबिम्ब सृजन संस्थान, फगवाड़ा, पंजाब की नींव रखी गयी| संस्थान के संस्थापक निदेशक अनिल पाण्डेय ने संस्थान की अध्यक्षता श्री दिलीप कुमार पाण्डेय को सौंपी| संस्थान के प्रथम सांगठनिक मीटिंग में यह निर्णय लिया गया कि यह संस्था साहित्य, संस्कृति और समाज के क्षेत्र में कार्य करने के लिए प्रतिबद्ध होगी| रचनावली और बिम्ब-प्रतिबिम्ब पत्रिका का
प्रकाशन तो इस संस्था के अंतर्गत होगा ही बिम्ब-प्रतिबिम्ब प्रकाशन का कार्य भी इस संस्थान के अंतर्गत किया जाएगा| यह संस्था जरूरतमंद लोगों के लिए एक आश्रयदाता के रूप में कार्य कर सके, इसको लेकर भी कुछ निर्णय लिए गए|
यह भी सुनिश्चित हुआ कि संस्थान का एक पुस्तकालय होगा जिसमें विशेष सदस्यता के
तहत विभिन्न विषयों की पुस्तकें पढ़ी जा सकेंगी| संस्थान के निदेशक अनिल पाण्डेय का
कहना था कि “हम अपने कर्तव्यों के निर्वहन में कभी कोई कमी नहीं आनें देंगे|
विपरीत परिस्थितियों में भी इस संस्था के अंतर्गत साहित्यिक और सामाजिक क्षेत्र
में कार्य किया जाता रहेगा|” संस्थान के अध्यक्ष का कार्यभार श्री दिलीप कुमार
पाण्डेय को सौंपते हुए उन्होंने यह विश्वास जताया कि इनके नेतृत्व में यह संस्थान
अपने उद्देश्यों में सफल सिद्ध होगा|
संस्थान के अध्यक्ष श्री दिलीप कुमार पाण्डेय ने कहा कि “जो भी साहित्य प्रेमी और सामाजिक कार्यकर्ता हमारे संस्थान से जुड़कर कार्य करना चाहते हैं, उनका हर समय स्वागत है| बगैर किसी गुटबंदी और दलबंदी के यह संस्था कार्य करेगी और सबके साथ चलते हुए एक नए परिवेश के निर्माण में अपना सर्वश्रेष्ठ देगी|”
कोरोना के इस दौर में बहुत कम लोगों की उपलब्धता में यह बैठक आयोजित हुई
जिसमें संस्थान के निदेशक अनिल पाण्डेय, अध्यक्ष श्री दिलीप कुमार पाण्डेय, वित्त-सचिव
परमजीत कुमार, शहर के ख्यातनाम ग़ज़लकार मनोज फगवाडी, श्री अशोक खुराना प्रीतम
पाण्डेय उपस्थित रहे| बैठक के अंत में यह भी निर्णय लिया गया अभी बहुत कम संख्या
में ही सही कम से कम 15 दिन में एक बैठक संस्थान की होगी जिसमें नामित सदस्यों का
होना जरूरी होगा| विस्तृत पदाधिकारियों के नाम की सूची जल्द ही दी जाएगी|
Monday, 24 August 2020
स्त्री जीवन की व्यथा-कथा का यथार्थ ‘विदआउट मैन’
साहित्यिक दुनिया में कहानी विधा ने विचार और विमर्श के नये आयाम प्रस्तुत
किये हैं| कविता की जो लोकप्रियता
थी कभी वह इस विधा के समक्ष कुछ हद तक घटी है, हो सकता है कारण और भी हों लेकिन कहानी का सहज स्वाभविक रूप
से अपनी स्मृतियों का हिस्सा हो जाना, एक विशेष कारण तो है ही| पाठक से लेकर
आलोचक तक का रुझान इधर मुखर हुआ है| इसके पीछे का जो एक बड़ा कारण है, वह है यथार्थ जीवन की विसंगतियों का सूक्ष्म अवलोकन| समकालीन कथाकारों में अपनी एक ही कहानी संग्रह से स्थान बना
चुकी गीता पंडित की कहानी संग्रह ‘विदआउट मैन’
ने इस विश्वास को और भी अधिक मजबूती प्रदान की
है|
संग्रह में कुल आठ, विदाउट मैन,
फेसबुकिया मॉम , मसीहा, आदम और ईव,
एक और दीपा, अजनबी गंध, मुड़ी-तुड़ी काग़ज़
की पर्ची, ऐसे नहीं, कहानियाँ शामिल हैं| इन कहानियों में अतीत से कहीं अधिक वर्तमान का संघर्ष
रूपायित हुआ है| समकालीन परिवेश
के यथार्थ परिदृश्य को दृष्टिगत कर के लिखी गई ये कहानियाँ स्त्री जीवन में घटित
होने वाली तमाम विडम्बनाओं के बावजूद स्त्रियों के जीवन जीने की जिजीविषा, संघर्ष, यातना और छटपटाहट का यथार्थ चित्र उकेरती हैं| इस संग्रह के सभी पात्र हमारे आपके जीवन का हिस्सा
हैं|
इन कहानियों को पढ़ कर स्त्री जीवन का यथार्थ आँखों के सामने नाचने लगता है| ‘विदआउट मैन’ में पुरुष स्त्री जीवन में एक यातना बनकर सालता है| जो स्त्रियाँ पुरुष के साथ हैं और जिनके जीवन में पुरुष का अभाव है, दोनों के यथार्थ एक समान हैं| नायिका इसीलिए ‘सेरोगेटिड मदर’ बनना उचित
समझती है लेकिन विवाह जैसे बंधन को अस्वीकार करती है| उसका ये विश्वास है कि विवाह के बाद जीवन को जी ले जाना स्वाभाविक नहीं, बंधन है क्योंकि “वहां केवल देह का मिलन होता है, मन का नहीं| मन तो डस्टबिन में पड़ा कराहता है|” एक तो भारत की पारिवारिक संरचना इस प्रकार की है जहाँ दांपत्य को बहुत कम स्पेस होता है सम्वाद का दूसरे शादी की हुई औरत हर हाल में विवश होती है सम्बन्धों की गरिमा बनाए रखने के लिए|इधर इस साइबर युग में सम्वेदना के जो आधार हुआ करते हैं उनमें व्यापक बदलाव
लक्षित हुआ है| व्यक्ति-परिवार
आदि से भले टूटा हो लेकिन आभासी दुनिया ने एक नया संसार और रिश्तों की एक नई
दुनिया बसाई है| ‘फेसबुकिया मॉम’
कहानी सुदूर शिक्षा अथवा जीवन-जरूरतों को पूर्ण
करने के लिए संघर्ष कर रही युवतियों की दास्ताँ को बयान करती है| स्त्री, स्त्री के दुःख को सहसा महसूस कर सकती है| उनके दुःख और प्रेम एक समान होते हैं| मोना का आभासी दुनिया से यथार्थ जीवन तक की
यात्रा से विदा हो जाना लेखिका को अखरता है| सम्पूर्ण समाज में घटित होने वाली घटनाएं एक-एक कर उसके
दिमाग में कौंध जाती हैं| प्रेम अपराध,
ऑनर किलिंग, रेप, आत्महत्या जिन
यातनाओं से देश-समाज स्त्री जीवन को लेकर आक्रांत रहता है वह कथा लेखिका को सालती
है| यह कहानी इसलिए भी हमें
प्रभावित करती है क्योंकि ‘अवसाद’ युवा-पीढ़ी का अभिन्न अंग बनता जा रहा है|
हम महानगरों में अपनी बच्चियों को पढाई आदि के
नाम अकेला छोड़कर निश्चिन्त तो हो गए हैं. लेकिन उस ‘अकेलेपन’ में वह क्या कर
सकती है और क्या उस पर घटित हो सकता है; इन चिंताओं से भी हम स्वयं को दूर रखने लगे हैं| इसका परिणाम तमाम अनिष्ट खबरों के माध्यम से हमें आए दिन
मिल रहा है|
‘मसीहा’ कहानी वृद्ध आश्रम की
यथार्थ विडम्बनाओं से उपजी विसंगतियों को दर्शाती है| वृद्धों पर बनावटी बातें करना अलग बात है लेकिन उनके जीवन
यथार्थ का सामना करना आसान नहीं है| पुरुष की अपेक्षा एक स्त्री यदि वृद्धाआश्रम में रह रही है तो इसका प्रभाव उस
पर अधिक पड़ता है| ‘आदम और ईव’
तथा ‘अजनबी गंध’ कहानी में दिखाया
गया है कि ग्रामीण परिवेश में अशिक्षा और जड़ रूढ़ियों की आड़ में स्त्री जीवन कैसे
छला जाता है| कभी टोन-टोटके के
रूप में तो कभी भटकती आत्माओं का संज्ञान देकर स्त्रियों का शोषण होता है, जिसे एक नहीं पूरा परिवार और पूरा समाज मौन
होकर देखता है|
‘एक और दीपा’
कहानी कैसे धन और सम्पदा की लालच में कम उम्र
की लडकियों की इच्छाओं का दमन कर दिया जाता है, यह तो दिखाती ही है, यदि मजबूत इच्छा शक्ति है तो एक स्त्री दूसरी स्त्री की
अधिकारों के लिए लड़ भी सकती है, यह भी दिखाती है|
‘मुड़ी-तुड़ी काग़ज़ की पर्ची’ रिश्तों के बीच लड़कियों की असुरक्षा को दर्शाती
है| समाज में जिस तरह स्त्री
शोषण की खबरें हम पढ़ते हैं दरअसल, वह खबरें बाहर से
नहीं आती हैं, हमारे आपके
परिवेश से सृजित होती हैं और आकार पाती हैं| कई बार हम यह सोचते हैं कि ‘रिश्ते’ की गरिमा में
आदमी गलत कदम नहीं उठाएगा, लेकिन सत्यता यही
है कि ‘स्त्री’ एक उपभोग की वस्तु रूप में ही हमारे समाज में
वर्तमान है| स्त्री कुछ होने
से पहले एक ‘देह’ है जिसे प्राप्त करने के लिए व्यक्ति अपनी आयु
और सम्बन्ध को तिलांजलि दे देता है| ‘ऐसे नहीं’ कहानी के माध्यम
से प्रेम के मानवीय रूप को प्रदर्शित किया गया है, जहाँ बिखराव के बाद काम अपने ही आते हैं, स्पष्टता के साथ चिह्नित किया गया है| यह कहानी पढ़ते हुए आप ‘दूर और पास’ एकांकी की याद आ
जाए तो गलत नहीं है|
गीता के पास समृद्ध भाषा है जिसमें रवानगी है और ताजगी है| जीवन का यथार्थ देने के लिए यदि भाषा का अस्त्र
आपके पास नहीं है तो वह अभिव्यक्ति नहीं बन पाती, जिससे कहानी पाठक को अपनी तरफ आकर्षित कर सके| गीता पंडित के पास यह तो कहानी के भविष्य के
लिए सुखद संदेश है| जब आप कहानी
संग्रह को पढेंगे तो पायेंगे कि प्रभावपूर्ण कवित्व शैली में संवाद की नवीनता
संग्रह के आकर्षण हैं| ध्यान देने की
बात ये भी है कि इस आकर्षण में वह रूककर पीछे नहीं देखतीं अपितु आगे बढ़ती जाती हैं
जिससे ‘कहन’ का जो प्रभाव है वह संग्रह के अंत तक बना रहता
है|
उपर्युक्त सभी विशेषताओं के अतिरिक्त संग्रह की लगभग कहानियों की ये सच्चाई है कि स्त्री जीवन के यथार्थ को दिखाने के लिए पुरुष संवेदना की अवहेलना कथाकार द्वारा जिद के साथ की गयी है, जिससे बचा जा सकता था| हर पुरुष इतना क्रूर कहाँ होता है कि उसके यातना के डर से स्त्रियाँ विवाह करना ही छोड़ दें? बच्चे पैदा करने के मोह में सेरोगेसी प्रथा को अपनाएं? यह जरूरी नहीं है| दरअसल यह स्त्रीवादी मानसिकता की स्वच्छंदता भी हो सकती है जो समाज को धीरे-धीरे अलगाव की तरफ ले जा रही है| लेकिन जब आप स्त्री जीवन की यातनाओं से दो-चार होते हैं तो कहीं न कहीं ऐसा मन में आना स्वाभाविक भी है, जिसका यथार्थ कथाकार आपके सामने रखने की कोशिश की है| इस कोशिश में हालांकि कठिन कथानुशासन के माध्यम से गीता ने कई अन्य कहानियों में इस तरह की स्थिति को ‘विराम’ देने के लिए हाथ बढाया है जो हमें आश्वस्त करती है| अभी तक महत्त्वपूर्ण उपन्यासों का सृजन कर चुकीं गीता पंडित से दूसरे कहानी संग्रह की अपेक्षा बढ़ गयी है जो शायद जल्द हम सबको पढने को मिले|
Sunday, 23 August 2020
जब पथरा गईं उनकी आँखें पैदल चलते - चलते (अमरजीत राम की कोरोजीवी कविताएँ)
अमरजीत
राम युवा हैं| दृश्य को देखते भर नहीं हैं उससे उपजी विसंगतियों के यथार्थ तक जाते
हैं| जाना इस अर्थ में कि यह पता चल सके ऐसा क्यों हुआ? घटनाओं को कविता में ढालने
के लिए निरर्थक श्रम नहीं करते, खुद-ब-खुद रूपायित होती जाती हैं| सबके यथार्थ में
और उनके यथार्थ में एक फर्क है| जो अधिकांश कवि कल्पना से प्राप्त करते हैं वह
अमरजीत के यहाँ स्थाई है| अनुभव और अनुभूति का जो दायरा है इनके यहाँ उसका अपना एक
नजदीकी सम्बन्ध है| यह भी कि कवि में एक तड़प है| वह तड़प उसी यथार्थ से निकलकर आई
तड़प है जहाँ से तमाम दुखों का जन्म होता है| मैं यदि यह कहूँ कि अभाव के जिस
खालीपन से एक युवा टूटता बिखरता है वैसा एक उम्रदराज व्यक्ति के यहाँ नहीं देखा
जाता, तो गलत न होगा| यह टूटन और बिखराव अमरजीत की कविताओं के केन्द्र में है|
ध्यान रहे युवा का टूटना बिखरना समाज का टूटना और बिखरना है| अमरजीत जब कहते हैं “विकलांगता
के इस दौर में/ संवेदनाएं शून्य हो गयी हैं/ हर मोड़ पर लूट ,
हत्या ,बलात्कार/ मुँह फैलाये खड़ी है और/ एक -
एक कर निगलते जा रही है”, तो सामाजिक बिखराव की स्थिति को कहीं गहरे में स्पष्ट
करते हैं|
कोरोना समय में टूटन और सामाजिक बिखराव की समस्याएँ बढ़ी हैं| रिश्तों-सम्बन्धों और व्यावहारिकता को लेकर इधर नए समीकरण बने हैं| बहुत ही घनिष्ठ बेगाने हुए हैं और बेगाने अपनों की भूमिका में आए हैं| यह भी सच है कि समाज में साधारण व्यवहार की जो स्थितियां कोरोना के
पहले थीं, इधर गहरे में प्रभावित हुई हैं| लोगों के अन्दर एक नकार ने जन्म ले लिया है| इस नकार से हज़ारों-हज़ार संकट में आ गए| बेरोजगारी, बेगारी और भूख की समस्या बढ़ने लगी| कवि इस ‘संकट के समय में’ अपनी कविता के माध्यम से लोगों को सचेत करता है और पूछता भी है कि- “सोचो तब क्या होगा?/जब संकट के समय में/ इंसानों की तरह
सूर्य
मना करेगा रोशनी देने से/ चाँद शीतलता/
पेड़-
पौधे मना करेंगे/ फल - फूल छाया देने से/
बादल
पानी/ सोचो तब क्या होगा ?
सोचो
तब क्या होगा?/ जब पृथ्वी मना
करेगी
अपने
ऊपर रहने से/ अग्नि आग देने से/ हवाएं मना करेंगी
हवा
देने से/ सोचो तब क्या होगा?/ सोचो
तब क्या होगा?
जब
नदियां लौट जाएँगी/ जैसे आई थीं
सागर
मना करेगा कुछ भी लेने से/ आकाश के तारे टिम - टिमाने से
सोचो
तब क्या होगा ?
सोचो
तब क्या होगा?/ जब कलियाँ मना
करेंगी/ खिलने से/
भौरें
गुनगुनाने से/ वसंत मना करेगा आने से
चिड़ियाँ
गीत गाने से/ सोचो तब क्या होगा ?
सोचो
तब क्या होगा?/ जब बीज मना करेगा
अँखुआने
से/ ऋतुएं आने से/ जब पृथ्वी का एक - एक कण
असहमत
होगा इंसानों से/ इंसानों की तरह/ फिर सोचो तब क्या होगा?”
इस
धरती पर जीव से लेकर जंतु तक का एक-दूसरे पर सहयोगात्मक भाव रहा है| फिर नकार के
भाव से व्यवहार कब चला है किसी का? ऐसा नहीं है तो फिर कोरोना काल की ‘संकट के समय
में’ एक राज्य की सरकार का दूसरे राज्य के नागरिकों को सुविधा न देना, मिल मालिकों
का मजदूरों को तनख्वाह न देना, मकान मालिकों का किराए के मकान में सहूलियतें न
देना, बैंकों का किश्त से राहत न देना आखिर क्या है? जैसे इन सबों ने आम आदमी को
‘कुछ न देने’ से मना कर दिया वैसे ही प्रकृति-प्रदत्त संसाधनों द्वारा हमें देने
से मना कर दिया जाए, ‘सोचो तब क्या होगा?’ क्या जीवन-गति रुक नहीं जाएगी? क्या हम
आप ऐसे ही रह पायेंगे जैसे कि अभी हैं? नहीं न? तो अभावग्रस्त और साधनहीन लोग कैसे
रह पा रहे होंगे, कल्पना करके देखिये|
इधर
अभावग्रस्त और साधनहीन ऐसे लोगों के लिए मीडिया और सुविधा-सम्पन्न लोगों द्वारा
नया जुमला गढ़ा गया है| भूख से बेजार और अभाव से हताश लोग गांवों की तरफ लौटने को
मजबूर हुए हैं या हो रहे हैं| यह एक विसंगति है जो सुधा-सम्पन्न की नकार से
उत्पन्न हुआ है| उस नकारवादी प्रवृत्ति पर चोट करने की अपेक्षा ऐसे लोग मजबूर
मजदूरों की वतन ‘वापसी’ का नाम दे रहे हैं, जो गलत है| गलत इसलिए भी है कि एक तो
घर में ही प्रवासी बना दिए गए बड़ी चालाकी से और दूसरे ‘घर’ बेघर होने के लिए मजबूर
कर दिए गए| अमरजीत राम इस विसंगति पर करारा प्रहार करते हैं और यह मानते हैं कि जब
तमाम समस्याएँ मुंह बाए खड़ी हैं ऐसे समय में उसे ‘वापसी’ की बात कहना कहाँ तक उचित
है? यथा-
“चलते
- चलते छिले पाँवों और
अंगूठों
को छोड़ चुके नाखूनों के घाव/ अभी भरे नहीं/
लाठियों
की चोट का निशान
अभी
हरा है/ कपोलों से लुढकते आंसूओं की लकीरें/ अभी मिटी नहीं
श्मशानों
पर जल चुकी हड्डियों की राख/ अभी धुली नहीं
कब्रिस्तानों
पर जलते दिए/ अभी बुझे नहीं/
रास्तों
में फंसे श्रमिक/ अभी घर लौटे नहीं
किसानों
का अनाज/ अभी भी खेत में पड़ा है
विश्वव्यापी
विपत्ति का बेनूर अँधेरा डटा है/ अभी भी वक़्त बैठा है
हर
कन्धों पर चाबुक लिये और/ तुम हो कि वापसी की बात करते हो|”
यह भी समझना जरूरी है कि व्यक्ति जब ‘वापसी’ करता है तो पूरी तैयारी से करता है और जब समस्याओं से घिरकर भगता है तो ‘विपत्ति’ के वशीभूत हो सब कुछ छोड़कर आता है| यहाँ वापसी न होकर छोड़कर आना है, जिसे समझने का प्रयास नहीं किया गया, नहीं किया जा रहा है| यह ‘विश्वव्यापी विपत्ति’ एक कठिन समस्या बनकर आई है जिसमें कवि अपने दुखों को भूल गया है| वह
भूल गया है अपनी सुख-सुविधाओं को| उसे कुछ दिखाई दे रहा है तो यही कि समस्याएँ बढती जा रही हैं| आम आदमी, दलित, मजदूर ठगे जा रहे हैं| कवि आक्रोशित है और उसी आक्रोश में आवाज लगाता है-“ओ मेरे गूंगे , बहरे , भूखे , नंगे दलित देश/ मेरे अनाम पुरखों के हड्डियों को कंपा देने वाले शोषकों/ कहाँ मर गए तुम ?/ किस कुत्ते , सूअर के शारीर में/ प्रवेश कर गयी तुम्हारी आत्मा/ अब क्यों नहीं सुनते/ मेरी आत्मा की आवाज़?” लोग निकाले जा रहे हैं, मारे जा रहे हैं, भगाए जा रहे हैं और तुम हो कि अपने दरबे में घुसे क्वारंटाइन हुए पड़े हो? निकलो और देखो किस तरह लोग असहाय हुए पड़े हैं|कवि
तमाम विसंगतियों से इतना दुखी है कि कोरोना काल में कहीं भी व्यक्तिगत दुखों को
जाहिर नहीं होने देता| ऐसा भी नहीं है कि वह दुखी नहीं है लेकिन सामाजिक दयनीयता
के वास्तविक चित्र उसे अधिक परेशान करते हैं| वह देखता है कि “कुछ तो मरे विषाणु
से/ कुछ मर गए भूखे – प्यासे/ कुछ फांसी पर झूले और/ कुछ कट गए पटरी नीचे/ रोटी के
खातिर निकले थे/ छूट गया रोटी का साथ|’ रोटी की खातिर आए लोगों से रोटी का साथ
छूटना तो हुआ ही यह भी हुआ कि यहाँ बहुत से लोग घर से बेघर हुए| दर-ब-दर हुए|
दीनता और दयनीयता की नई तस्वीरें सामने आईं| कवि वेदना के आधिक्य से हतप्रभ और
मायूस हुआ| जब सामाजिक परिवेश का जायजा लेने लगा तो यह सच्चाई निकल कर आई-“इस
आतंक से/ छिन गए कितनो के प्रेम/ लाखों - करोङों की रोजी – रोटी/ हुए कितने विधुर
– विधवा/ कितने मातृविहीन/ ओह ! और ओ बेहद मासूम बच्चें/ जिनके होठों से माँ के स्तन का दूध भी नहीं
धुला था|” भला इन बच्चों ने, जिन्हें अभी देश-दुनिया को देखना था, क्या बिगाड़ा
था किसी का? ‘विधवा-विधुर’ होते लोगों ने ऐसा कब सोचा था?
कवि
यह भी देखता है कि कैसे उसके लोक का सौन्दर्य इस कोरोना ने छीन लिया? लोक-सौन्दर्य
कवि की दृष्टि में नायक-नायिका का प्रेम-प्रलाप न होकर ‘बुनकरों के करघे’ और
‘राजगीर के करनी-बसुली’ हैं| हकीकत यही है कि स्व-कौशल के लिए विख्यात लोक में “अब
तो न बुनकरों के करघे की आवाज सुनाई पड़ती/न राजगीर के करनी - बसुली की संगीत/ इस
कठिन वक़्त में” हर तरफ एक मरघट शांति छाई हुई है| इस मरघट-शांति में बहुत से
लोगों का टाइम नहीं पास हुआ तो कितने ही लोग अपने घरों से ऊबे, थके और हारे रहे|
कवि अकर्मण्य होने की अपेक्षा अपनी सामाजिक-सक्रियता बढ़ाता है और भूख-प्यास से
लिपटे जनों के पास जाने का साहस करता है| साहस इसलिए क्योंकि जिन बस्तियों की तरफ
उसकी निगाह है उधर लोग जाना उचित नहीं समझते| दो पल खड़े होना अपनी तौहीनी समझते
हैं| क्यों? क्योंकि उनके पास भूख और प्यास छोड़कर कुछ और है ही नहीं|
कवि
अपनी आँखों से देखता है कि जिस कोरोना काल में लोग अपने-अपने घरों में बंद हैं,
सोशल और फिजिकल दूरी पर बहस किए हुए हैं, मिनट-मिनट पर सेनिटाइज हो रहे हैं, पग-पग
पर हाथ धो रहे हैं उसी कोरोना समय में ‘वे दुखी हैं’, निराशा और हताशा में डूबे
परेशान हैं| ये सच तो विल्कुल कल्पना नहीं है कि “हम हथेलियों पर साबुन मल रहे
हैं/ वे दुःखी हैं/ झोपड़ियों में आँसू मल रहे हैं/ हम ख़ुशी के दीप जला रहे हैं/ वे
अपने सपने/ हम हथेलियों को रगड़ - रगड़ चमका
रहे हैं/ वे अपने खुरदरे भाग्य पर तरस खा रहे हैं/ हम बैठे घरों में रस - मलाई काट
रहे हैं/ वे सड़कों पर सरेआम धूल फांक रहे हैं|” हो सकता है ये सच्चाई आपके गले न उतरे लेकिन
महसूस करिए कि ‘अपने सपने’ को जलते देखना कितना कठिन होता है? कितना कठिन होता है
‘अपने खुरदरे भाग्य पर तरस’ खाना यह उनसे पूछिए जो ‘सडकों पर सरेआम धूल फांक रहे
हैं|’ कुछ लोग इन पर हँस रहे हैं तो कुछ लोग असभ्य और जंगली करार दे रहे हैं| कोई
मूर्ख तो कोई जानवर करार दे रहा है| कवि लोगों की इस प्रवृत्ति से दुखी है| इस
कोरोना आपदा के समय जिन्हें लोग असभ्य, जंगली और जानवर समझ रहे हैं कवि-दृष्टि में
“वे जानते हैं/ प्रेम का अर्थ और/ प्रेम की परिभाषा/ पैदा हुए हैं/ इंसानियत की
कोख से/ विपदाएं उन्हें विरासत में मिली हैं/ वे उदास जरूर हैं/ लेकिन हारे नहीं|”
एक वाक्य कितना परेशान करता है हमें-“विपदाएँ उन्हें विरासत में मिली हैं” धन, ऐश्वर्य, रुतबा उनके हिस्से कब रहा? बावजूद इसके वे संघर्ष कर रहे हैं| अभाव की खाईं में पैदा हुए और उसी को भर रहे हैं फिर भी हारना उन्होंने सीखा ही कब? यह बात और है कि उनके संघर्ष को देखते हुए
लोगों ने उन्हें ‘इंसान’ समझना छोड़ दिया| इस ‘समझने’ में हालांकि ‘भूख का शास्त्र’ काम करता है और वह लौह पुरुष, इस्पाती, पत्थर पता नहीं क्या-से-क्या बना दिया जाता है लेकिन ऐसा कहने वालों को कवि बड़ी शालीनता से जवाब देता है; पढ़िए इस कविता को –“लोग कहते हैं/ वे इस्पाती हैं/ लोहे के बने हैं/ जानते हैं ढ़लना समय से/ लोहे की तरह/ वे पत्थर से पानी निकालते हैं/ वे/ नाप देंगे/ समुद्र/ आकाश/ पृथ्वी/ एक ही बार में/ मैं कहता हूँ/ ओ इंसान हैं|” उन्हें भी दुःख होता है| चोट लगती है| वे भी रोते हैं| लोग नहीं समझते क्योंकि सम्पन्नता का ज्वर उनके सिर पर सवार होता है|महानगरों
ने मनुष्य के संघर्ष को कभी महत्त्व नहीं दिया| इसीलिए महानगरों में इंसान नहीं
रहते यह इसी कोरोना काल में स्पष्ट हुआ| ‘दिल्ली दूर है’ जैसे मुहावरे ऐसे नहीं
बने हैं| इनके बनने में इंसानियत के संकीर्ण होने और मनुष्य के अमानवीय होने की
कहानी छिपी हुई है| बचपन में मुहावरे की समझ होती ही कितनी है लेकिन इधर कवि इस
कहानी के भाव को कहीं गहरे में समझता है और अभिव्यक्त करता है|
लोग
कहते हैं/ दिल्ली दूर है/ माँ भी कहती थी
साफ़
–
साफ़/ मुहावरे की भाषा में
मैं
समझा/ लेकिन देर से ।
जब
पथरा गईं उनकी आँखें/ पैदल चलते - चलते
जब
सूख गए/ उनके कप कपाते होंठ बिन पानी के
जब
ऐंठ गईं/ उनकी आँतें भूख की आग से
जब
सो गए/ दूध मुँहें बच्चें कन्धों से चिपक कर
जब
दिखने लगा/ उनके चेहरों पर
महामारी
का दहशत/ और हो गए
किसी
कार दुर्घटना का शिकार/ चलते - चलते
मैं
समझा/ लेकिन देर से।
इस देर से समझने में कवि का भोलापन नहीं आम आदमी की नादानी और सबको अपना समझ लेने की भूल दृष्टिगत होती है| यह वही भूल है जिसमें पड़कर इधर लगातार पलायन जारी था| कितने तो
विवशता बस इधर आए थे लेकिन बहुतों को शौक भी था| इस शौक में अपनों को त्यागकर दूसरों को अपनाने की वृत्ति स्पष्ट थी, जो इधर टूटी है| इधर यह समझ में आया है कि ‘शहर’ कभी हमारा नहीं हो सकता जितना ‘गाँव’ अपना बनकर रहता है| कितने ही साधनहीन और अभावग्रस्त लोग क्यों न हों, शहरों की अपेक्षा गाँव आत्मीयता से स्वागत करता है| कवि गाँव कविता में स्वयं इस बात को स्वीकार करता है-“जब
कभी लौटता हूँ/ शहर से गाँव
अपनों
के सुख - दुःख से
होठों
पर जगती है मुस्कान
फिर
आँखें भीग जाती हैं ।
रोमांचित
हो उठती हैं बाहें
मिलते
ही गाहे - बगाहे
जब
ओ पूछते हैं अपना हाल
मिट
जाता है सारा मलाल
फिर
आँखें भीग जाती हैं|”
इधर
तो आँखें भीगी ही नहीं रोई भी हैं| कोरोना में में लॉकडाउन संकट से दुःख तो है पर
अपनों से अपनों के बीच होने की ख़ुशी भी है| यह ख़ुशी न होती तो बस्ती की बस्तियां
अब तक स्वयं को समाप्त कर चुकी होतीं|
अमरजीत
राम इधर लगातार सक्रिय रहे और कोरोना समय की संगति-विसंगति पर अपनी कवि-दृष्टि
जमाए रखे| इससे एक तो उनके कवि-हृदय को एक दिशा मिली दूसरे ‘गूंगे,
बहरे, भूखे, नंगे दलित
देश’ की सच्चाई निकलकर सामने आई और लोगों को यथार्थ परिवेश की विसंगतियों पर सोचने
के लिए विवश होना पड़ा| निश्चित ही एक कवि इस संकट के समय में जो कर सकता है अपनी
तरफ से अमरजीत ने वह किया| युवा कविता के जिस स्वर से इधर उम्मीदें बढ़ी हैं उनमें
अमरजीत एक नाम तो हैं और इधर इन्होंने अपनी जगह को बहुत जिम्मेदारी से कब्जाया भी
है| यह समकालीन कविता के लिए विशेष है|
Saturday, 22 August 2020
संत रविदास का जन्म—जीवन : संघर्ष के पर्याय
हिन्दी
साहित्य का मध्यकाल कई दृष्टियों से विचार-विमर्श के क्षेत्र में विवाद एवं संवाद
का विषय बना रहा है| यह विषय जितना अधिक पहले के समय में वर्तमान था उससे कहीं
अधिक अब भी है| पुराने आलोचक जहाँ अपनी स्थापनाएं देने के बाद हिन्दी साहित्य के
जिज्ञासु अध्येताओं के अतीत हो गए तो नए आलोचक उन स्थापनाओं को दरकिनार करते हुए
नवीनता की मांग एवं सृजन को भविष्य का वर्तमान सच बनाने में जुट गए| हालाँकि,
इसमें कोई शक नहीं है कि ऐसा होने से कई नए तथ्य निकल कर सामने आए और आगे भी आने
की संभावना है; लेकिन विद्वानों के अंतर्विरोधों को लेकर जिस तरह से अध्येता और आम
जन-मानस को इनके जन्म-जीवन-व्यक्तित्व को जानने और समझने में जिन परेशानियों का
सामना करना पड़ा, मध्यकालीन कवियों में से कई एक कवियों का अब तक प्रकाश में न आ
पाने का यह भी एक महत्त्वपूर्ण कारण साबित हुआ है|
संत रविदास का जीवन इन विसंगतियों से अछूता नहीं है| उनके जन्म एवं जीवन से सम्बंधित अन्य घटनाओं के लिए आज भी अटकलों और कल्पनाओं का सहारा लेना पड़ता है| यह सच है कि “श्री गुरु रविदास जी के जीवन, शिक्षा और कर्म-क्षेत्र के विषय में अब तक हिन्दी, पंजाबी व अंग्रेजी आदि
विभिन्न भाषाओँ में पर्याप्त सामग्री अप्रकाशित और प्रकशित रूप में उपलब्ध हो चुकी है, मगर तो भी उनके जीवन के सम्बन्ध में कतिपय विवरणों यथा, जन्म-समय, जन्म स्थान, माता-पिता, गुरु एवं शिष्य परंपरा, यात्राओं, निधन काल, वाणी रचना, सत्संग, गोष्ठियां आदि के विषय में अभी भी प्रमाणिक रूप से कुछ कह पाना सहज साध्य नहीं है|”[1] यह साध्य इसलिए भी नहीं है क्योंकि जब हम किसी भी स्थिति की जानकारी प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं तो यह आवश्यक हो जाता है कि हमारी सहायता इतिहास के रूप में सुरक्षित वह पांडुलिपियाँ या विद्वानों द्वारा लिखित कुछ विशेष दस्तावेज करें, यहाँ हमारा इतिहास प्रायः मौन दिखाई देता है और इतिहासकार सदी-विशेष की तरफ इशारा करके शांत हो जाते हैं| यह भी एक बड़ी विडंबना की स्थिति है कि एक
तो संत रविदास सरीखे हमारे संत साहित्य के पुरोधा अधिकतर मौलिक एवं मौखिक परंपरा
का निर्वहन किया करते थे, जो कुछ बोला जाता था उसे ही प्रवचन के रूप में सुना
मात्र जाता था, लेखन का प्रयास लगभग कम ही होता था, दूसरे , जो कुछ होता भी था तो
इनके वचनों एवं वाणियों को विद्वानों की वाणी न मानकर एक साधारण व्यक्ति की वाणी
समझा जाता था| लगभग यह धारणा-सी लोगों के अन्दर घर कर गयी थी कि ‘ऐसे लोग मात्र
सांप्रदायिक भावना से ग्रसित होकर ही अपनी वाणियों का प्रयोग किया करते थे|[2]
साधारण व्यक्ति आज भी बोल रहे हैं, लिख रहे हैं और एक हद तक तथाकथित विद्वानों से
अधिक उनको समाज के लोग पढ़ और समझ भी रहे हैं, इसके बावजूद यदि ध्यान से यथास्थिति
का अवलोकन किया जाय तो उनकी तरफ कम ही ध्यान लोगों का जाता है| बहरहाल, यहाँ
उद्देश्य इन विसंगतियों का लेखा-जोखा देना नहीं, संत रविदास के सन्दर्भ में और
उनके साथ-साथ कई ऐसे महत्त्वपूर्ण संतों के सन्दर्भ में इतिहासकारों के अभाव और
उपलब्धता को देखना था|
संत रविदास वाणी के सन्दर्भ में आलोचकों के विचारों एवं प्रकाशित सामग्रियों का अध्ययन करने से उनके जन्म तिथि के सम्बन्ध में विद्वानों में मतान्तर होने के बावजूद कुछ हद तक एकमतता दिखलाई देती हैं| आचार्य पृथ्वीसिंह आजाद के अनुसार “संत रविदास जी का जन्म विक्रमी संवत
1433 (सन् 1376 ई०) में माघ शुक्ल पूर्णिमा तिथि रविवार को हुआ था| रविदासी भाई प्रतिवर्ष इसी दिन संत रविदासजी की पुण्य जन्म-तिथि मनाते आए हैं| इस सन्दर्भ में सिक्खों के दसवें गुरु गोविन्द सिंह के समकालीन संत करमसिंह का मत समझना जरूरी है, जो रविदासी संप्रदाय में प्रचलित है :चौदह सौ तैंतीस की, माघ सुदी पंदरास |
दुखियों के कल्याण हित, प्रगटे श्री रविदास ||”[3]
उपर्युक्त दोहे और आचार्य पृथ्वीसिंह आजाद
के मत का समर्थन करते हुए डॉ० एन० सिंह ने लिखा है “संत रविदास के इसी जन्म संवत
को डॉ० पद्म गुरुचरण सिंह ने भी मान्यता दी है| हमारे विचार से जब तक कोई प्रमाणिक
जन्म वर्ष नहीं मिलता तब तक आचार्य पृथ्वीसिंह आजाद के दिए हुए सम्वत् 1433 को ही
उपयुक्त समझना चाहिए| यही मत डॉ० शरणदास भनोत का भी है| यदि आजाद साहब द्वारा दिए
गए इसी जन्म सम्वत् को मान लिया जाए तो संत रविदास की आयु 151 वर्ष बैठती है| जिस
पर सहज संदेह किया जा सकता है |”[4]
डॉ० एन सिंह के इस ‘सहज संदेह’ की
बात को लगभग समर्थन देते हुए धर्मपाल मैनी ने लिखा है कि “सं० 1433 की माघ
पूर्णिमा मान लेने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए थी, लेकिन इनकी मृत्यु की तिथि
सं० 1584 पर्याप्त विश्वसनीय प्रतीत होती है| इस प्रकार उनकी आयु 151 वर्ष बैठती,
जो बहुत संभाव्य नहीं| दूसरा रैदास के कबीर से कुछ छोटा होने की बात में भी कुछ बल
लगता है, अतः यदि जन्म समय सम्वत 1456 के आस पास मान लिया जाए तो रामानंद के शिष्य
होने में, कबीर से कुछ छोटे और समकालीन होने में तथा लगभग 128 वर्ष की आयु पाने में
विशेष आपत्तियों को स्थान नहीं रहता|”[5]
यहाँ यदि कबीर के जन्म काल के साथ संत रविदास के जन्मकाल को मानने का मोह-संवरण
होता है तो यह गलत है| कबीर के सम्बन्ध में माना जाता है कि उनका जन्म “चौदह सौ
पचपन साल गए” पर होता है यानि संवत 1456 इनके जन्म का वर्तमान वर्ष माना जाता
है| इस दृष्टि से संत रविदास का भी जन्म वर्ष इसे स्वीकार करना उचित नहीं होता|
दूसरे, रविदास कबीर से बड़े भी हो
सकते हैं| छोटा होने के प्रति यह तर्क दिया जाता है कि रविदास कबीर के विचारों से
प्रभावित थे; प्रभावित व्यक्ति अपने से छोटों के भी व्यक्तित्व से हो सकता है| अतः
धर्मपाल मैनी के आपत्ति का निराकरण यदि आचार्य पृथ्वीसिंह आजाद के ही शब्दों में
सुझाते हुए कहा जाए कि “रविदास जैसे परमयोगी, आचारवान, सात्विक वृत्ति वाले
वीतराग, इन्द्रिय निग्रही सद्गृहस्थ के लिए इतनी लम्बी आयु भोगना कोई असंभव तथा
विस्मयजनक बात नहीं है”[6]
तो गलत नहीं होगा|
यह बात संत रविदास स्वयं कई जगह
स्वीकार करते हैं कि वे बनारस के आस-पास के इलाके में वर्तमान थे—“मेरी जाति कूट
बाढ़ला ढोर ढोवंता| नितहि बनारसी आसपास|”[7]
बनारस के आस-पास होने का ख़ास बनारास का तो होना विल्कुल नहीं हो सकता| नव्य
प्राप्त विवरणों एवं शोध में प्राप्त परिणामों के आधार पर अब इनका जन्म-स्थान
‘मांडूर’ को माना गया है| यह स्थान अब ‘मांडूर’ से ‘मडुवाडीह’ में परिवर्तित हो
गया है जो मुगलशराय स्टेशन से डेढ़-दो मील की दूरी पर ग्रांट ट्रंक रोड पर स्थित है|
जिसका उल्लेख ‘रैदास रामायण’ में इस प्रकार किया गया है—यथा,
कासी ढिंग मांडूर सथाना, शुद वरण करत गुजराना|
मांडूर नगर लीन औतारा, रैदास सुभ नाम हमारा|”[8]
इस तरह से विद्वानों द्वारा संत
रविदास जी का जन्म स्थान ‘मंडुवाडीह’ को माना गया है| आचार्य परशुराम चतुर्वेदी,
बेणीप्रसाद शर्मा, तथा आचार्य पृथ्वीसिंह आजाद आदि ने ‘मांडूर’ अथवा ‘मंडुवाडीह’ को
ही उनका जन्म-स्थान माना है|
मंडुवाडीह में पिता श्री संतोख दास’ तथा
माता कलसीदेवी के घर जन्मे संत रविदास का जन्म-जीवन कई प्रकार की विसंगतियों एवं
विरोधाभासों का परिणाम था| विसंगतियाँ इसलिए कि एक तो संत रैदास शूद्र-कुल में
जन्म लिए थे[9]
जिसे समाज में कमीनी एवं नीच जाति के रूप में लिया जाता है| जो उस समय के समाज में
हँसी एवं उपेक्षा के पात्र समझे जाते थे|[10]
इस जाति के लोगों को कौंचफली के छूना तक अहितकर और गुनाह समझा जाता था और ऐसा माना
जाता था कि जो इन्हें छुएगा उसके पूरे शरीर में मिर्चों जैसी चरमराहट हो जाएगी;[11]
व्यवसाय भी इनका कोई आदर्श व्यवसाय न था; मरे हुए जीवों की खाल उतारकर उसे
व्यावसायिक आकार देना इनके कर्तव्य एवं इनकी आजीविका का साधन था|[12]
दूसरे किसी भी व्यक्तित्व का वास्तविक एवं व्यावहारिक धरातल पर विकास कर पाना तभी संभव है जब उसका संरक्षण किसी सुयोग्य व्यक्तित्व की छाया में हो या होना सुनिश्चित हो; यह व्यक्तित्व भारतीय परिवेश में गुरु कहलाता है| गुरु की महिमा का वर्णन संत साहित्य में बड़ी
तल्लीनता से हुआ है| संत रविदास भी गुरु की संगति एवं उनकी छाया को शुभ तथा व्यक्तित्व-विकास के लिए आवश्यक बताया है|[13] गुरु के चरण-शरण को प्राप्त कर पाना आम जन के बस की बात उस समय नहीं थी| इसके लिए संघर्ष की एक व्यापक प्रक्रिया से होकर गुजरना होता था| यह व्यापक प्रक्रिया तब और भी दुरूह तथा कठिन होती होगी जब साधक अथवा शिष्य उस समय-परिवेश के ‘निम्न वर्ग’ में जन्मा होगा| रविदास के समय के समाज में भी उच्च वर्ण
के गुरु की संगति इतनी सहजता से हो पाना लगभग असंभव ही था| यह इनकी चारुता एवं
कर्मठता ही कही जाएगी कि इन्होने गुरु के आदर्श रूप को सामने रखकर गुरु महिमा का
यशगान और शिष्य परंपरा का निर्वहन किया| कहीं न कहीं शिष्य परंपरा का यह निर्वहन
ही उन्हें आज एक युग-प्रेरणा के रूप में प्रतिष्ठापित कर पाया है| ‘आदि गुरुग्रन्थ
साहिब’ में इनके पदों को स्थान मिल पाना शायद इसी गुरु-परंपरा के निर्वहन का
प्रसाद है अन्यथा जिसे छूना भी लोग मुनासिब न समझते हों उसके पदों का गुणगान भला
क्योंकर करते? संत रविदास के लिए मीरा के गुरु के रूप में प्रतिष्ठित होना भी कहीं
न कहीं उसी गुरु-भक्ति का ही परिणाम था|
फिर भी संत रविदास को न तो गुरू की गुरुता
से कोई शिकायत थी और न ही तो अपनी नीच-जाति में जन्म लेने का पछतावा| गुरु-शरण और
नीच-महिमा का ही परिणाम था कि संत रविदास को ईश्वर की साक्षात् संगति प्राप्त हो
सकी जिन्हें उन्होंने अपने पदों में कई जगह गर्व से स्वीकार भी किया है| वे जहाँ
गुरु को दीपक-प्रकाश की मानिंद पथ-प्रदर्शक स्वीकार करते हुए कहते हैं—“गुरु
ज्ञान दीपक दिया, बाती दई जलाय| रविदास हरि भगत कारनै, जनम मरन विलमाय|” वहीं
तथाकथित नीच मानी जाने वाली चमार कुल में जन्म लेने और ईश्वर से सीधे साक्षात्कार
और मिलन से प्रभावित होकर पुनः उसी चमार कुल में जन्म लेने की परिकल्पना भी करते
दिखाई देते हैं—कहि रैदास सुनि केसवे, अन्तह करन विचार| तुम्हरी भगति कै कारनै,
फिरि ह्वै हौं चमार|”
सच भी है यदि नीच कुल में होने से ईश्वर का साथ और विश्वास प्राप्त हो तो फिर ऐसा
कौन नहीं होगा जो फिर-फिर वही न होना चाहे|
संत रविदास का जन्म-जीवन
संघर्ष का पर्याय रहा है| इन सबमें यह समझने की बात है कि जितना अँधेरा जन्म-जीवन
से सम्बन्धित साक्ष्यों में है उससे कहीं अधिक रोशनी रविदास के व्यक्तित्व में है|
सम्पूर्ण भारतीय साहित्य में ऐसा व्यक्तित्व अभी तक नहीं हुआ जिसने शालीनता पक्ष
को न छोड़ते हुए भी वर्चस्ववादी शक्तियों को चुनौती दी हो| संत रविदास का सम्बन्ध
ज्ञान की उस उर्वर-भूमि से है जहाँ संवेदनशीलता है, विनयता है और है श्रमसाध्यता का
होना| संवेदनशील हो और साथ ही श्रमशील हो, यह दुर्लभ होता है| संत रविदास में ऐसा वर्तमान था, इसमें कोई दो
राय नहीं है|
[1]सिंहल, डॉ० धर्मपाल, गुरु रविदास : जीवन एवं
दर्शन, चण्डीगढ़ : पब्लिकेशन व्यूरो, पंजाब यूनिवर्सिटी, 1993, पृष्ठ-1
[2]आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपने ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ में सिद्धों और योगियों के सन्दर्भ में लिखते हुए यह कहा था कि “उनकी रचनाओं का जीवन की स्वाभाविक सरणियों, अनुभूतियों और दशाओं से कोई सम्बन्ध नहीं | वे सांप्रदायिक शिक्षा मात्र हैं, अतः शुद्ध साहित्य की कोटि में नहीं आ सकतीं | (शुक्ल, रामचन्द्र, हिन्दी साहित्य का इतिहास, काशी : नागरीप्रचारिणी सभा, सम्वत-2014, पृष्ठ-20)
[3]द्रष्टव्य-शर्मा, डॉ० बी०
पी०, संत गुरु रविदास-वाणी, नई दिल्ली, सूर्य प्रकाशन, संवत-2035, पृष्ठ-10
[4](सं०) सिंह, डॉ० एन०, रैदास ग्रंथावली,
पृष्ठ-41
[5]मैनी, धर्मपाल, रैदास, साहित्य अकादमी, नई
दिल्ली, पृष्ठ-15
[6]आजाद, आचार्य पृथ्वीसिंह, रविदास दर्शन, चण्डीगढ़
: अनुसन्धान विभाग, श्री गुरु रविदास संस्थान, 1973, पृष्ठ-72
[7]द्रष्टव्य-शर्मा, डॉ० बी.पी., संत गुरु रविदास
वाणी, दिल्ली : सूर्य-प्रकाशन, संवत्-2035, पृष्ठ-22
[8]द्रष्टव्य-शर्मा, डॉ० बी.पी., संत गुरु रविदास
वाणी, दिल्ली : सूर्य-प्रकाशन, संवत्-2035, पृष्ठ-22
[9]कह रविदास खलास चमारा|
मेरी जाति विख्यात चमारं |
[10]हम अपराधी नीच घर जनमै, कुटुम्ब लोग करे हाँसी रे
|
[11]रैदास तूं कांवचि फली, तुझे न छीवे कोय
[12]जाति भी ओच्छी जनम भी ओच्छा, ओच्छा कसब हमारा |
[13]आइआ दीपकु पेषि करि, नर पतंग अंधियाय |
रविदास गुरु रा
ज्ञान बिनु, बिरला कोउ बचि जाय ||