साहित्यिक दुनिया में कहानी विधा ने विचार और विमर्श के नये आयाम प्रस्तुत
किये हैं| कविता की जो लोकप्रियता
थी कभी वह इस विधा के समक्ष कुछ हद तक घटी है, हो सकता है कारण और भी हों लेकिन कहानी का सहज स्वाभविक रूप
से अपनी स्मृतियों का हिस्सा हो जाना, एक विशेष कारण तो है ही| पाठक से लेकर
आलोचक तक का रुझान इधर मुखर हुआ है| इसके पीछे का जो एक बड़ा कारण है, वह है यथार्थ जीवन की विसंगतियों का सूक्ष्म अवलोकन| समकालीन कथाकारों में अपनी एक ही कहानी संग्रह से स्थान बना
चुकी गीता पंडित की कहानी संग्रह ‘विदआउट मैन’
ने इस विश्वास को और भी अधिक मजबूती प्रदान की
है|
संग्रह में कुल आठ, विदाउट मैन,
फेसबुकिया मॉम , मसीहा, आदम और ईव,
एक और दीपा, अजनबी गंध, मुड़ी-तुड़ी काग़ज़
की पर्ची, ऐसे नहीं, कहानियाँ शामिल हैं| इन कहानियों में अतीत से कहीं अधिक वर्तमान का संघर्ष
रूपायित हुआ है| समकालीन परिवेश
के यथार्थ परिदृश्य को दृष्टिगत कर के लिखी गई ये कहानियाँ स्त्री जीवन में घटित
होने वाली तमाम विडम्बनाओं के बावजूद स्त्रियों के जीवन जीने की जिजीविषा, संघर्ष, यातना और छटपटाहट का यथार्थ चित्र उकेरती हैं| इस संग्रह के सभी पात्र हमारे आपके जीवन का हिस्सा
हैं|
इन कहानियों को पढ़ कर स्त्री जीवन का यथार्थ आँखों के सामने नाचने लगता है| ‘विदआउट मैन’ में पुरुष स्त्री जीवन में एक यातना बनकर सालता है| जो स्त्रियाँ पुरुष के साथ हैं और जिनके जीवन में पुरुष का अभाव है, दोनों के यथार्थ एक समान हैं| नायिका इसीलिए ‘सेरोगेटिड मदर’ बनना उचित
समझती है लेकिन विवाह जैसे बंधन को अस्वीकार करती है| उसका ये विश्वास है कि विवाह के बाद जीवन को जी ले जाना स्वाभाविक नहीं, बंधन है क्योंकि “वहां केवल देह का मिलन होता है, मन का नहीं| मन तो डस्टबिन में पड़ा कराहता है|” एक तो भारत की पारिवारिक संरचना इस प्रकार की है जहाँ दांपत्य को बहुत कम स्पेस होता है सम्वाद का दूसरे शादी की हुई औरत हर हाल में विवश होती है सम्बन्धों की गरिमा बनाए रखने के लिए|इधर इस साइबर युग में सम्वेदना के जो आधार हुआ करते हैं उनमें व्यापक बदलाव
लक्षित हुआ है| व्यक्ति-परिवार
आदि से भले टूटा हो लेकिन आभासी दुनिया ने एक नया संसार और रिश्तों की एक नई
दुनिया बसाई है| ‘फेसबुकिया मॉम’
कहानी सुदूर शिक्षा अथवा जीवन-जरूरतों को पूर्ण
करने के लिए संघर्ष कर रही युवतियों की दास्ताँ को बयान करती है| स्त्री, स्त्री के दुःख को सहसा महसूस कर सकती है| उनके दुःख और प्रेम एक समान होते हैं| मोना का आभासी दुनिया से यथार्थ जीवन तक की
यात्रा से विदा हो जाना लेखिका को अखरता है| सम्पूर्ण समाज में घटित होने वाली घटनाएं एक-एक कर उसके
दिमाग में कौंध जाती हैं| प्रेम अपराध,
ऑनर किलिंग, रेप, आत्महत्या जिन
यातनाओं से देश-समाज स्त्री जीवन को लेकर आक्रांत रहता है वह कथा लेखिका को सालती
है| यह कहानी इसलिए भी हमें
प्रभावित करती है क्योंकि ‘अवसाद’ युवा-पीढ़ी का अभिन्न अंग बनता जा रहा है|
हम महानगरों में अपनी बच्चियों को पढाई आदि के
नाम अकेला छोड़कर निश्चिन्त तो हो गए हैं. लेकिन उस ‘अकेलेपन’ में वह क्या कर
सकती है और क्या उस पर घटित हो सकता है; इन चिंताओं से भी हम स्वयं को दूर रखने लगे हैं| इसका परिणाम तमाम अनिष्ट खबरों के माध्यम से हमें आए दिन
मिल रहा है|
‘मसीहा’ कहानी वृद्ध आश्रम की
यथार्थ विडम्बनाओं से उपजी विसंगतियों को दर्शाती है| वृद्धों पर बनावटी बातें करना अलग बात है लेकिन उनके जीवन
यथार्थ का सामना करना आसान नहीं है| पुरुष की अपेक्षा एक स्त्री यदि वृद्धाआश्रम में रह रही है तो इसका प्रभाव उस
पर अधिक पड़ता है| ‘आदम और ईव’
तथा ‘अजनबी गंध’ कहानी में दिखाया
गया है कि ग्रामीण परिवेश में अशिक्षा और जड़ रूढ़ियों की आड़ में स्त्री जीवन कैसे
छला जाता है| कभी टोन-टोटके के
रूप में तो कभी भटकती आत्माओं का संज्ञान देकर स्त्रियों का शोषण होता है, जिसे एक नहीं पूरा परिवार और पूरा समाज मौन
होकर देखता है|
‘एक और दीपा’
कहानी कैसे धन और सम्पदा की लालच में कम उम्र
की लडकियों की इच्छाओं का दमन कर दिया जाता है, यह तो दिखाती ही है, यदि मजबूत इच्छा शक्ति है तो एक स्त्री दूसरी स्त्री की
अधिकारों के लिए लड़ भी सकती है, यह भी दिखाती है|
‘मुड़ी-तुड़ी काग़ज़ की पर्ची’ रिश्तों के बीच लड़कियों की असुरक्षा को दर्शाती
है| समाज में जिस तरह स्त्री
शोषण की खबरें हम पढ़ते हैं दरअसल, वह खबरें बाहर से
नहीं आती हैं, हमारे आपके
परिवेश से सृजित होती हैं और आकार पाती हैं| कई बार हम यह सोचते हैं कि ‘रिश्ते’ की गरिमा में
आदमी गलत कदम नहीं उठाएगा, लेकिन सत्यता यही
है कि ‘स्त्री’ एक उपभोग की वस्तु रूप में ही हमारे समाज में
वर्तमान है| स्त्री कुछ होने
से पहले एक ‘देह’ है जिसे प्राप्त करने के लिए व्यक्ति अपनी आयु
और सम्बन्ध को तिलांजलि दे देता है| ‘ऐसे नहीं’ कहानी के माध्यम
से प्रेम के मानवीय रूप को प्रदर्शित किया गया है, जहाँ बिखराव के बाद काम अपने ही आते हैं, स्पष्टता के साथ चिह्नित किया गया है| यह कहानी पढ़ते हुए आप ‘दूर और पास’ एकांकी की याद आ
जाए तो गलत नहीं है|
गीता के पास समृद्ध भाषा है जिसमें रवानगी है और ताजगी है| जीवन का यथार्थ देने के लिए यदि भाषा का अस्त्र
आपके पास नहीं है तो वह अभिव्यक्ति नहीं बन पाती, जिससे कहानी पाठक को अपनी तरफ आकर्षित कर सके| गीता पंडित के पास यह तो कहानी के भविष्य के
लिए सुखद संदेश है| जब आप कहानी
संग्रह को पढेंगे तो पायेंगे कि प्रभावपूर्ण कवित्व शैली में संवाद की नवीनता
संग्रह के आकर्षण हैं| ध्यान देने की
बात ये भी है कि इस आकर्षण में वह रूककर पीछे नहीं देखतीं अपितु आगे बढ़ती जाती हैं
जिससे ‘कहन’ का जो प्रभाव है वह संग्रह के अंत तक बना रहता
है|
उपर्युक्त सभी विशेषताओं के अतिरिक्त संग्रह की लगभग कहानियों की ये सच्चाई है कि स्त्री जीवन के यथार्थ को दिखाने के लिए पुरुष संवेदना की अवहेलना कथाकार द्वारा जिद के साथ की गयी है, जिससे बचा जा सकता था| हर पुरुष इतना क्रूर कहाँ होता है कि उसके यातना के डर से स्त्रियाँ विवाह करना ही छोड़ दें? बच्चे पैदा करने के मोह में सेरोगेसी प्रथा को अपनाएं? यह जरूरी नहीं है| दरअसल यह स्त्रीवादी मानसिकता की स्वच्छंदता भी हो सकती है जो समाज को धीरे-धीरे अलगाव की तरफ ले जा रही है| लेकिन जब आप स्त्री जीवन की यातनाओं से दो-चार होते हैं तो कहीं न कहीं ऐसा मन में आना स्वाभाविक भी है, जिसका यथार्थ कथाकार आपके सामने रखने की कोशिश की है| इस कोशिश में हालांकि कठिन कथानुशासन के माध्यम से गीता ने कई अन्य कहानियों में इस तरह की स्थिति को ‘विराम’ देने के लिए हाथ बढाया है जो हमें आश्वस्त करती है| अभी तक महत्त्वपूर्ण उपन्यासों का सृजन कर चुकीं गीता पंडित से दूसरे कहानी संग्रह की अपेक्षा बढ़ गयी है जो शायद जल्द हम सबको पढने को मिले|
2 comments:
कहानी जितनी जीवन यथार्थ और अनुभवों से मिली -जुली होगी उतनी ही अधिक लोकप्रिय होगी। कहानी से यह उम्मीद सबसे ज्यादा रहती है। आज का पाठक कल्पनाओं में खोना नहीं चाहता उसे ऐसे अनुभव चाहिए जो उसे अंतः में छू जाए।गीता पंडित जी को बहुत-बहुत शुभकामनाएं। अनिल जी के द्वारा उनके कहानी संग्रह विदाउट मैन का बहुत ही सूक्ष्म विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। गीता जी जिस तरह से नयी भावभूमि लेकर उपस्थित हुईं हैं सचमुच उनके दूसरे कहानी संग्रह का इंतजार रहेगा।
बहुत आभार आपका| आपकी प्रतिक्रिया महत्त्वपूर्ण है| आगे भी यह स्नेह मिलता रहे पोस्टों को इसी अपेक्षा से पुनः आभार|
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