पुलिया की तलाश में कवि और चाय की तलाश में मैं| न पुलिया-प्रसंग हुआ न चाय पर चर्चा| पंजाब यूनिवर्सिटी चंडीगढ़ के एडमिन ब्लॉक के ठीक सामने पार्क में एक बेंच
दिखाई दी| शांति और आती हुई धूप की
लालिमा से युक्त| सुबह का समय,
कविवर ने कहा "अनिल! यहाँ बैठा जाए| यह पुलिया का आभास देगा|" निःसंदेह| एक बार तो ऐसा लगा जैसे यह पूरा परिवेश बौद्धिक-विमर्श की
तैयारी करने लगा हो| सामने आती धूप
चाय-सा आनंद|
प्रसंग क्या था? कविता, आलोचक और कथा| कथा साहित्य के
पास आज भी कोई गंभीर आलोचक नहीं है| मैंने कहा था| कवि की स्वीकृति थी| कहानी नई कहानी से आगे क्यों नहीं बढ़ पा रहे हैं लोग? क्यों नहीं निर्मल वर्मा की तरह किसी की कहानी का विश्लेषण
करते हुए उसे वर्तमान का सर्वश्रेष्ठ बताया जा रहा है? बताने वाले वैसे हैं तो बहुत लेकिन उस पर चर्चा क्यों नहीं
हो पा रही है? बहुत देर तक बातें होती रही| इस बीच वर्तमान समय के कई कथाकारों का नाम भी लिया गया,
उसके सन्दर्भ में फिर कभी| खैर...
यह समय कुछ अलग तरह की चर्चा के मूड में था| कवि हों और कविता पर बात न हो| शुक्ल सर का यह कथन अभी तक दिमाग में गूँज रहा है| "अनिल! जो व्यक्ति खिलखिलाकर ठहाका न लगा सका खुल
कर...चेहरे पर मुस्कान न बिखेर सका...वह कुछ भी कर ले लेकिन कविता नहीं लिख सकता|" हालाँकि उनकी सहमति इस अर्थ में कविता के पक्ष
में रही कि इस विधा के पास आज भी बहुत तेजस्वी और ऊर्जावान आलोचक मौजूद हैं| वह बोल रहे हैं,
लिख रहे हैं और जहाँ भी हैं कुशल संवाद में आकर लोगों को भी प्रेरित कर रहे
हैं|
अकादमिक जड़ता से लेकर नॉन अकादमिक की आराजकता तक पर इस सुबह बात हुई| इस तरह बनारस और जालंधर की उपस्थिति में चंडीगढ़ ने
साहित्यिक-सुबह का आगाज़ किया| यहाँ की धूप इस
समय बहुत अच्छी लगती है| हल्की-हल्की
हवा और फिर ओस की बूँदें| कवि श्रीप्रकाश
शुक्ल जी का वक्तव्य और बीच-बीच में प्रश्न और कविता की उपस्थिति| शानदार रहा यह सब| ऐसे ही नहीं है कि पुलिया-प्रसंग में लोग शामिल होने के लिए अपने समय का
इंताजर करते हैं और ऐसे ही नहीं है कि मैं चाहता हूँ कि सारे विषयों की चर्चा हो, लेकिन चाय पर|
बहुत आभार सर इस विशेष सुबह के लिए
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