Thursday, 27 August 2026

युवा, व्यवस्था और बदलता हुआ परिदृश्य

इधर के वर्षों में युवाओं में बहुत बेचैनी है। वे करना बहुत कुछ चाहते हैं, लेकिन उनके सामने जैसे एक ऐसा चक्रव्यूह पहले से तैयार कर दिया गया है, जिसमें प्रवेश करना तो आसान है, बाहर निकलना उतना ही कठिन। निर्माण और विध्वंस के इस जाल में फँसकर जिस तरह से युवा तड़फड़ा रहे हैं, वह सचमुच हतप्रभ करता है। उनके भीतर ऊर्जा है, सपने हैं, कुछ नया करने की आकांक्षा है, लेकिन रास्ते लगातार संकरे होते जा रहे हैं। वे आगे बढ़ना चाहते हैं, पर हर कदम पर कोई न कोई दीवार खड़ी मिलती है।

हम एक हद तक उम्मीद करते हैं बड़ों से कि वे विनम्रता से युवाओं को स्वीकार करेंगे, उनकी बेचैनी को समझेंगे और ठीक तरीके से उन्हें रास्ता दिखाएँगे। लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा हमेशा नहीं होता। कई बार ऐसा लगता है जैसे उन्होंने युवाओं को समझने के बजाय उन्हें भला-बुरा कहने और उनकी आलोचना करने का ही मन बना लिया है। समाज में कुछ भी गलत और बुरा हो रहा हो, उसका सारा ठीकरा युवाओं के सिर पर मढ़ दिया जाता है। जबकि व्यवस्था की बागडोर अधिकांशतः आज भी बुजुर्गों के हाथों में है। निर्णय लेने वाली संस्थाएँ, प्रशासनिक ढाँचे, राजनीतिक व्यवस्थाएँ और आर्थिक संसाधन मुख्यतः उन्हीं के नियंत्रण में हैं। फिर हर असफलता के लिए युवा ही क्यों जिम्मेदार हों?

युवाओं को हम एक धक्के में खारिज नहीं कर सकते। खासकर ऐसी स्थिति में, जब हम न तो उन्हें पर्याप्त अवसर दे रहे हैं और न ही ठीक तरीके से उनकी बात सुन रहे हैं। हर समय के युवाओं पर जिम्मेदारियों का बोझ रहा है, लेकिन इधर के युवाओं की समस्या कुछ अधिक जटिल दिखाई देती है। घर, परिवार, सगे-संबंधी, शिक्षा, रोजगार और फिर देश-समाजहर तरफ से उनसे अपेक्षाएँ हैं। उनसे कहा जाता है कि वे सफल हों, अच्छा पढ़ें, अच्छी नौकरी पाएँ, परिवार का नाम रोशन करें और देश के लिए कुछ करें। लेकिन यह कम ही पूछा जाता है कि आखिर उनके हिस्से में आया क्या है?

कभी-कभी मुझे न जाने क्यों लगता है कि वे जैसे हर जगह और हर किसी के साथ हैं, लेकिन उनके साथ और उनके लिए कोई नहीं है। वे परिवार में हैं, लेकिन उनकी बेचैनी को समझने वाला कोई नहीं। वे विद्यालय और विश्वविद्यालय में हैं, लेकिन उनकी जिज्ञासाओं और समस्याओं को सुनने वाला कोई नहीं। वे नौकरी की तलाश में हैं, लेकिन रोजगार की व्यवस्था उनके सामने बंद दरवाजे की तरह खड़ी है। वे समाज में हैं, लेकिन समाज उन्हें केवल अपनी अपेक्षाओं के आईने में देखना चाहता है। हर तरफ का परिदृश्य उनके लिए नकारात्मक और विषाक्त होता जा रहा है।

इसके बावजूद वे रुकते नहीं हैं। एक साथ बहुत कुछ पा लेना चाहते हैं और उसी वेग में बहुत सारे कार्य भी कर रहे होते हैं। कई बार जब आप एक साथ चार-पाँच काम निपटाते हुए उन्हें देखें तो उनके लिए हताश या आश्चर्य जैसा कुछ महसूस करने के बजाय उनके संघर्ष को समझने की कोशिश करनी चाहिए। वे जैसे विसंगतियों को झेलने और प्रताड़नाओं को सहने के लिए अभिशप्त हैं। न उनके लिए किसी के हृदय में वाहहै और न वे स्वयं अपनी आहकिसी के सामने निकाल सकते हैं। उनकी स्थिति कई बार ऐसी हो जाती है जैसे वे अपने ही समाज में अनाथ हों।

न उनका कोई गाँव दिखाई देता है, न प्रदेश और न देश। उनके पास यदि कुछ बचा है तो उनकी मेहनत, दृष्टि और जिद। हर हाल में जीवित रहने और मुस्कराने की जिद। वे लगातार संघर्ष करते हैं, गिरते हैं, उठते हैं और फिर चल पड़ते हैं। उनकी सबसे बड़ी पूँजी शायद यही है कि उन्होंने अभी तक उम्मीद करना पूरी तरह छोड़ा नहीं है।

कई बार मेरी निगाहों ने उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों से दूसरे राज्यों की ओर जाते, भटकते और धक्के खाते लोगों को गहरे में उतरकर देखा है। उनकी विवशता और दुर्दशा से कौन परिचित नहीं है? वे अपने घर-परिवार से दूर जाकर केवल इसलिए नहीं निकलते कि उन्हें दूसरे प्रदेश अधिक अच्छे लगते हैं। वे इसलिए निकलते हैं क्योंकि उनके अपने प्रदेश में उनके लिए पर्याप्त अवसर नहीं हैं। रोजगार की तलाश उन्हें घर की चौखट से बाहर खींच ले जाती है।

दूसरे प्रदेशों में पहुँचकर उन्हें अनेक प्रकार की पहचानें दी जाती हैं। कभी भैया’, कभी बाहरी’, कभी कोई और अपमानजनक संबोधन। व्यक्ति जो अपने घर से रोजी-रोटी की तलाश में निकला था, वहाँ पहुँचकर अचानक किसी दूसरे की राजनीति का पात्र बना दिया जाता है। महाराष्ट्र, गुजरात, पंजाब जैसे राज्यों में भी समय-समय पर प्रवासियों को लेकर राजनीतिक और सामाजिक तनाव सामने आते रहे हैं। जिन राज्यों को उदार और विशाल हृदय वाला कहा जाता है, वहाँ भी कई बार प्रवासी युवाओं के लिए वातावरण असहज हो जाता है।

चुनाव आते ही प्रवासी समुदाय अक्सर राजनीतिक निशाने पर आ जाता है। पंजाब जैसे समृद्ध प्रदेश में भैया भगाओ, पंजाब बचाओजैसे नारे जब राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनते हैं तो उन लोगों के भीतर डर पैदा होना स्वाभाविक है, जो वर्षों से वहाँ मेहनत कर रहे हैं। किसी भी राज्य की अपनी सीमाएँ और अपनी प्राथमिकताएँ होती हैं। वहाँ के संसाधनों पर स्थानीय नागरिकों का अधिकार होना स्वाभाविक है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं हो सकता कि दूसरे प्रदेश से आया हुआ श्रमिक, विद्यार्थी, कर्मचारी या कामगार मनुष्य होना ही भूल जाए।

प्रश्न यह भी है कि जो लोग प्रवासी होकर दूसरे राज्यों में जाने को मजबूर होते हैं, वे अपने प्रदेशों से क्यों नहीं पूछते कि वहाँ उनके लिए रोजगार के पर्याप्त अवसर क्यों नहीं हैं? कितने लोग यह सवाल पूछते हैं और यदि पूछते भी हैं तो क्या व्यवस्था उन्हें समुचित उत्तर दे पाती है? आखिर जिन प्रदेशों की योग्यताएँ दूसरे राज्यों में जाकर वहाँ की अर्थव्यवस्था को समृद्ध कर रही हैं, वही योग्यताएँ अपने प्रदेश में रहकर क्यों नहीं कार्य कर पा रही हैं?

यदि कल-कारखाने, फैक्ट्रियाँ, उद्योग और रोजगार के पर्याप्त अवसर अपने प्रदेशों में बनाए गए होते तो कोई क्यों हजारों किलोमीटर दूर जाने के लिए विवश होता? पाँच हजार से लेकर पच्चीस हजार रुपये तक की नौकरी के लिए लोग दिन भर धक्के खाते हैं, अपमान सहते हैं और तमाम विसंगतियों में जीवन यापन करते हैं। लेकिन उनकी व्यथा सुनने वाला कोई नहीं मिलता। वे अपनी समस्या किससे कहें, यह भी उनके लिए एक समस्या बन जाती है।

बात केवल उत्तर प्रदेश या बिहार की नहीं है। बात युवाओं की है। वे जिस भी प्रदेश में हैं, उनकी समस्याएँ कमोबेश एक जैसी हैं। आज पंजाब का युवा रोजगार के लिए संघर्ष कर रहा है तो उत्तर प्रदेश और बिहार का युवा भी। महाराष्ट्र का विद्यार्थी शिक्षा और रोजगार की चिंता से जूझ रहा है तो किसी दूसरे प्रदेश का विद्यार्थी भी उसी चिंता में है। जो परेशानी उत्तर प्रदेश और बिहार के युवाओं को पंजाब या महाराष्ट्र में उठानी पड़ती है, उससे कम परेशानी पंजाब के प्रवासी युवाओं को दूसरे प्रदेशों और देशों में नहीं उठानी पड़ती होगी।

हम कहने को कितने भी उन्नतशील और विकसित क्यों न हो जाएँ, राष्ट्रीय स्तर पर युवाओं की समस्या का समाधान अभी भी हमारे पास नहीं है। शिक्षा से लेकर रोजगार तक, प्रतियोगी परीक्षाओं से लेकर नियुक्तियों तक, हर जगह युवाओं को अनिश्चितता का सामना करना पड़ रहा है। देश की व्यवस्था जिस तरह अतीत में युवाओं के प्रति पूरी तरह जिम्मेदार नहीं थी, आज भी स्थिति बहुत अलग दिखाई नहीं देती।

पहले शायद कुछ व्यवस्थागत नैतिकता बची हुई थी। अभाव भी था, लेकिन अभाव को स्वीकार करने की ईमानदारी कहीं न कहीं दिखाई देती थी। आज समस्या यह है कि निर्लज्जता कई स्तरों पर सामान्य होती जा रही है। हर सिस्टम जैसे खास सिस्टम वालों के लिए निर्मित हो गया है। स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय से लेकर मिल, फैक्ट्री और बैंक तकयुवा लगातार इन संस्थाओं की परिक्रमा कर रहे हैं, लेकिन उनकी सुनवाई कितनी होती है?

यदि प्रतिदिन व्यवस्था के दरवाजों पर दस्तक देने वाले युवाओं की ऊर्जा को सही दिशा में लगाया जाए तो परिदृश्य बिल्कुल अलग हो सकता है। जिस युवा को हम बेरोजगार कहते हैं, उसके भीतर ऊर्जा है। जिसे हम दिशाहीन कहते हैं, उसके भीतर संभावनाएँ हैं। जिसे हम अधीर कहते हैं, उसके भीतर परिवर्तन की बेचैनी है। समस्या यह नहीं कि युवा कुछ करना नहीं चाहता; समस्या यह है कि उसके करने की ऊर्जा को अवसर में बदलने वाली व्यवस्था कमजोर है।

दिक्कत यह भी है कि कहीं कोई किसी भी प्रकार का मूल्यांकन करने के लिए तैयार नहीं है। परीक्षाओं में हेर-फेर के किस्से और उनके यथार्थ हम सुनते और देखते रहते हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाला विद्यार्थी वर्षों तक अपनी जवानी पुस्तकों और कोचिंग के बीच खर्च कर देता है। परीक्षा हो जाए तो परिणाम की प्रतीक्षा, परिणाम आए तो नियुक्ति की प्रतीक्षा और नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू हो तो किसी न किसी नए विवाद की आशंका। इस पूरी प्रक्रिया में सबसे अधिक खर्च यदि किसी चीज का होता है तो वह युवा का समय और उसका विश्वास है।

बैंकिंग, प्रशासन, शिक्षा और रोजगार से जुड़े क्षेत्रों में यदि भ्रष्टाचार और अनियमितताओं पर गंभीरता से निगाह डाली जाए तो प्रश्न उठता हैहम आखिर कहाँ आ गए हैं? एक ओर युवाओं को ईमानदारी, मेहनत और धैर्य का पाठ पढ़ाया जाता है, दूसरी ओर उन्हें बार-बार ऐसे उदाहरण दिखाई देते हैं जहाँ योग्यता से अधिक पहुँच, संबंध और संसाधन प्रभावी दिखाई देते हैं। तब युवा के भीतर व्यवस्था के प्रति विश्वास कैसे बना रहे?

परिदृश्य एकदम से बदल गया है। आप कितने भी अभावों में जी रहे हों, धन कुछ बड़े हाथों के पिंजरे में कैद होता जा रहा है। समाज के एक हिस्से के पास संसाधनों की भरमार है और दूसरे हिस्से के पास अवसरों की कमी। कहीं महँगी गाड़ियों में जीवन गुजर रहा है और कहीं सूखी रोटी से पेट भरना कठिन होता जा रहा है। आर्थिक असमानता केवल आँकड़ों की बात नहीं है; यह रोजमर्रा के जीवन में दिखाई देने वाली वास्तविकता है।

ऐसे वातावरण में युवा सपने कैसे देखें? और यदि देखें तो उनकी देखभाल कौन करे? एक वैकेंसी पर हजारों आवेदन पड़ते हों तो यह केवल रोजगार की समस्या नहीं रह जाती, यह पूरे सामाजिक ढाँचे पर प्रश्नचिह्न बन जाती है। हजारों योग्य युवाओं को एक अवसर के लिए प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती है। उनमें से अधिकांश को असफलता मिलती है, जबकि उन्हें असफल कह देना सबसे आसान काम है। लेकिन क्या हमने कभी यह पूछा कि इतनी बड़ी संख्या में युवाओं के सपनों का क्या होगा?

युवा केवल नौकरी माँगने वाला व्यक्ति नहीं है। वह समाज की सबसे बड़ी रचनात्मक शक्ति है। उसके पास कल्पना है, तकनीक है, श्रम है, नई दृष्टि है और परिवर्तन की इच्छा है। यदि इस शक्ति को सही दिशा मिल जाए तो वही युवा उद्योग खड़ा कर सकता है, शोध कर सकता है, खेती को नई तकनीक से जोड़ सकता है, शिक्षा को बदल सकता है और समाज के भीतर नई चेतना पैदा कर सकता है।

इसलिए आवश्यकता युवाओं को दोष देने की नहीं, उन्हें समझने की है। उन्हें भाषण नहीं, अवसर चाहिए। उन्हें केवल उपदेश नहीं, संवाद चाहिए। उन्हें दया नहीं, सम्मान चाहिए। उन्हें यह बताने की आवश्यकता नहीं कि वे असफल हैं; उन्हें यह अवसर देने की आवश्यकता है कि वे अपनी क्षमता को साबित कर सकें।

बड़ों की भूमिका यहाँ समाप्त नहीं होती, बल्कि यहीं से शुरू होती है। अनुभव और ऊर्जा का संवाद हो तो समाज आगे बढ़ता है। यदि अनुभव युवाओं को दबाएगा और युवा अनुभव को पूरी तरह नकार देगा तो दोनों के बीच दूरी बढ़ती जाएगी। आवश्यकता ऐसी व्यवस्था की है जहाँ बुजुर्ग अपने अनुभव से रास्ता दिखाएँ और युवा अपनी ऊर्जा से उस रास्ते को नया आकार दें।

हमें यह स्वीकार करना होगा कि आज का युवा केवल अपने भविष्य के लिए नहीं लड़ रहा। वह अपने अस्तित्व, सम्मान और पहचान के लिए भी संघर्ष कर रहा है। वह अपने घर में बेहतर जीवन चाहता है, अपने प्रदेश में रोजगार चाहता है, दूसरे प्रदेश में सम्मान चाहता है और देश में अवसरों की समानता चाहता है। यह माँग असाधारण नहीं है। यह किसी भी लोकतांत्रिक और मानवीय समाज की सामान्य अपेक्षा है।

यदि हम सचमुच विकसित समाज बनना चाहते हैं तो हमें अपने युवाओं की बेचैनी को अपराध की तरह देखना बंद करना होगा। उनकी अधीरता के पीछे छिपे कारणों को समझना होगा। उनके सवालों को सुनना होगा। उनके सपनों को केवल चुनावी भाषणों का हिस्सा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाना होगा।

युवाओं के पास अभी भी बहुत कुछ हैमेहनत, दृष्टि और जिद। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उनमें उम्मीद की थोड़ी-सी रोशनी अभी बाकी है। यही रोशनी किसी समाज को बचा सकती है। जरूरत केवल इतनी है कि हम उस रोशनी को बुझाने के बजाय उसके लिए रास्ता तैयार करें।

क्योंकि किसी देश का भविष्य उसकी इमारतों, सड़कों या बड़े-बड़े नारों से नहीं बनता। उसका भविष्य उन युवाओं से बनता है जो आज किसी छोटे कमरे में बैठकर अपने सपनों की तैयारी कर रहे हैं, किसी रेलवे स्टेशन से दूसरे शहर की ओर जा रहे हैं, किसी परीक्षा के परिणाम की प्रतीक्षा कर रहे हैं, किसी फैक्ट्री में काम कर रहे हैं या किसी नए विचार को आकार दे रहे हैं।

उनकी मेहनत को पहचानना होगा। उनकी बेचैनी को समझना होगा। उनकी आवाज को सुनना होगा। वरना एक दिन हम फिर पूछेंगेये कहाँ आ गए हम, तेरे साथ चलते-चलते? और तब शायद हमारे पास इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए कोई युवा बचा ही न हो, बल्कि केवल उसकी अधूरी उम्मीदें बची हों।


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