Thursday, 6 May 2021

रचना का विज्ञापन और विज्ञापन की रचना

 

1.     

जिस साहित्य को लोग सृजन और संवाद के रूप में लेते हैं, इधर के दिन वह साहित्य नाम-इनाम की राजनीति में उलझे खेमेबाजी का जरिया बन गया है| साहित्यिक परिवेश पर ध्यान लगाकर देखें तो सब स्पष्ट होता जाता है| सबसे अधिक असहज मुझे तब होना पड़ता है जब कोई मेरे नाम के आगे युवा कवि या युवा आलोचक लगाता है| मैं अपने नाम के आगे युवा जैसा शब्द लगाने के पक्ष में इसलिए नहीं हूँ क्योंकि जिस ‘शब्द’ पर सबसे अधिक जिम्मेदारी बढ़ी है उस शब्द की दुर्गति इधर के दिनों आलोचना और कविता के साथ, सबसे अधिक हुई है| यह भी कि इधर के हिंदी साहित्य में दो पुस्तक की हलकी समीक्षा भी कोई लिख लेता है तो स्वयं को नामवरी परम्परा का आधार स्तम्भ घोषित कर लेता है| यदि वह नहीं भी करता है तो जिस पर लिखा गया होता है वह उसे उसी रूप में प्रचारित करने लगता है|

यह इधर के सोशल मीडिया के युग में तेजी से हुआ है| पता नहीं कितने युवा आलोचक और कवि को बनते और गायब होते देखा गया है| वरिष्ठ और गरिष्ठों की तो एक पूरी की पूरी फ़ौज ही है जिनका अभ्युदय भी सोशल मीडिया की देन है| यहाँ कितने ही कबीर (स्वयं को कबीर की परम्परा में रखने वालों) को चौराहे पर बैठ कर गाली देते रोज सुनता हूँ तो कितने ही तुलसी (तुलसी के अनुयायियों में स्वयं तुलसी से भी बढ़कर) को नित-प्रतिदिन ज्ञान बघारते पाता हूँ| हो सकता है कि इन्हीं में से एक श्रेणी में मुझे भी आप पा जाएं लेकिन परिदृश्य है भयावह, जिसकी तरफ मैं आपका ध्यान लाना चाहता हूँ| दरअसल साहित्य का सबसे अधिक अहित ऐसे क्रांतिकारियों और समन्वयवादियों की वजह से हुआ है| यह मैं तब गलत मानता था लेकिन इधर अनुभवों से एकत्रित ज्ञान के माध्यम से कहने के लिए विवश हूँ कि ऐसे लोगों की वजह से जरूरी रचनाओं और महत्त्वपूर्ण रचनाकारों तक पहुँचने में बहुत बाधाएं आती हैं| इन सब की वजह किसी एक परम्परा में कैद हो कर रहने वाले तथाकथित संप्रदायवादियों से है|


मैं यह नहीं कहना चाहता कि हम जैसे रचनाकारों को किसी परम्परा में देखने की कोशिश की जाए| जिम्मेदारी का भाव लिए व्यक्ति जिस रास्ते से चलता है परम्पराएं वहां से निर्मित होती हैं| कई बार जब आप किसी को एक खांचे में फिट कर देते हैं तो उसकी सीमाओं को नहीं अपितु अपनी सीमाओं का दायरा बताने लगते हैं| परम्पराएं कई बार आपके मिजाज से नहीं अपितु देशकाल परिस्थिति के अनुसार विकास पाती हैं| यह हिंदी के बहुत कम रचनाकारों के हिस्से आया है कि जब वह परम्परा विशेष से नहीं अपितु परम्पराएं उनकी वजह से निर्मित हुई हैं| जब आप किसी एक विचारधारा या किसी एक स्कूल की यथास्थिति के अनुसार चलने लगते हैं, तब आप परम्परा के अनुगामी होते हैं| रचना-प्रक्रिया में ऐसा होना कोई बड़ी बात नहीं होती| बड़ी बात होती है अपनी परम्परा पर अन्य अनेक को चलने के बाध्य करना| ऐसी बाध्यता कितने ला पाते हैं यही विमर्श का विषय होना चाहिए| 

आलोचना के परिप्रेक्ष्य में बात करें तो मामला अधिक उलझाऊ हो जाता है| अन्य सभी मुद्दों को छोड़ भी दें तो सवाल यहाँ निष्पक्षता का है| जब आप कभी भी निष्पक्ष होकर रचनाओं का मूल्यांकन करेंगे तो कभी इस परम्परा में तो कभी उस परम्परा में दिखाई देंगे या देने लगेंगे| हो क्या रहा है कि आपके बोलते देर नहीं दूसरा एक नयी धारणा बनाकर आपको सुनना बंद कर देता है| यहीं एक जीवंत संवाद की हत्या हो जाती है| इधर एक घटना बड़ी तेजी से घटित हुई है कि आप कुछ भी विशेष करने चलें तो लोग आपके नाम के आगे टैग लगाना शुरू कर देते हैं| फेसबुक पर टैग करते-करते टैगियाने का एक नया फैशन अपना लिया लोगों ने, जो गलत है| साहित्य में इस तरीके के फैशन को ख़त्म करने की जरूरत है| यह तभी सम्भव होगा जब आप बगैर किसी संकोच के आगे बढ़ेंगे| वह सोचेंगे जो आप चाहेंगे और जो करेंगे उसके प्रति पूरी गंभीरता से प्रतिबद्ध रहेंगे|

2.     

इधर की साहित्यिक हलचल में गंभीरता और प्रतिबद्धता जैसे शब्द ऐसे ही नहीं लोप हो गये| जिनको अध्ययन और मनन में होना चाहिए था वह झोला ढो रहे हैं और जिनको झोला ढोना था वह अध्ययन मनन में लगे हुए हैं| यह कम विडंबना की बात नहीं है कि निबन्ध और ललित निबन्ध जैसी विधाएँ लगभग विलुप्ति (इसे अतिश्योक्ति न मानें) के कगार पर हैं| चिंतन का प्रवाह और सोच का तरीका यहीं से विकसित होता था| आलोचना के पैमानें यहीं से निर्मित होते थे और यहीं से वह मापदंड तैयार किया जाता है जिसको आधार बनाकर किसी भी कृति या कृतिकार का मूल्यांकन किया जाता है| 

कविता की सशक्त विधाएँ हाशिए पर धकेल दी गयीं तो इसके पीछे इसी प्रवृत्ति का हाथ था| लय और सुर जैसी स्थितियाँ तुक के नाम पर गायब कर दी गयी हैं| आलोचना से काव्यशास्त्र को लगभग देश निकाला दे दिया गया है| कुछ विशेष शब्दों को आधार बनाकर भावों का व्यापार करने वाले स्वयं को आलोचना का सिरमौर बना बैठे हैं| ऐसे लोग भी आलोचना कार्य में प्रवृत्त हैं जिनका हृदयपक्ष एकदम शून्य है| हृदयपक्ष से शून्य लोग बुद्धि का प्रयोग भी ठीक से नहीं कर सकते, यह स्पष्ट है| तो क्या यह मान लिया जाए कि आलोचना महज बौद्धिक विलास बनकर इधर रह गयी है? ‘बात में बात’ के तहत आचार्य श्रीप्रकाश शुक्ल ने एक दिन कहा था “कविता से दर्शन और आलोचना से विचार को बड़े षड्यंत्र के तहत गायब किया गया|” उनका यह कहना गलत कैसे हो सकता है भला? करने को आप विचार कर सकते हैं|

साहित्य के समकाल में परम्परा, गंभीरता और प्रतिबद्धता ये तीनों ऐसे शब्द हैं जो इधर के दिन अपने अस्तित्व को लड़ रहे हैं| परम्पराएं जितनी टूटेंगीं नवीनता उतनी ही समृद्ध होगी| सच यह भी है कि जितनी अधिक समृद्ध परम्परा होगी नवीनता उतनी ही मजबूत और सक्षम होगी| इन तीनों से सीधा सम्बन्ध रचनात्मकता का है| रचनात्मकता का आधार व्यावहारिकता होती है| जब रचनाकार, चाहे आलोचना हो या कविता अथवा कोई अन्य विधा, व्यावहारिक नहीं होगा तो जीवन का सच और समाज का यथार्थ कहाँ से अभिव्यक्त हो पाएगा? यह एक प्रश्न तो है ही|


ऐसे बहुत-से प्रश्न हैं जिन पर विचार किया जाना आवश्यक है| विचार कौन करे? यह प्रश्न सबसे बड़ा है| फेसबुक के वाल पर सबको एक ही दृष्टि से निहारने वाले विद्वान या फिर सबको एक ही दृष्टि से हांकने वाले महाविद्वान? जिम्मेदारी का निर्वहन करे तो कौन करे? युवा स्वयं को बड़ा मानकर चलता है| बड़े युवाओं को बच्चा समझते हैं| जो बच्चा समझते हैं, यह और बात है कि अपनी पूरी उम्र महज लोगों को कोसने में बिता देता है, स्वयं कोई जोखिम उठाना नहीं चाहते| कुछ हैं जो उठाते हैं तो एकदम से अराजक माहौल का निर्माण करना चाहते हैं|

साहित्य का समकाल विरोधाभास के इन्हीं कुछ विन्दुओं पर चक्कर काट रहा है| अब युवा कहने को आप किसी को भी कह सकते हैं लेकिन कुछ जिम्मेदारियां तो उसकी निर्धारित होनी चाहिए न? युवा कवि या युवा आलोचक होना दुर्लभ नहीं है| ये पदनाम हैं किसी को भी दिया जा सकता है, जैसे आज किसी को भी पी-एच.डी. की डिग्री देकर डॉक्टर बना दिया जा रहा है| यह साहित्य का सोशल मीडिया का युग है| यहाँ सब कुछ अच्छा नहीं हो रहा है| रचना का विज्ञापन और विज्ञापन की रचना ही शेष है इधर| साहित्यकार प्रचारक हैं प्रचारक साहित्यकार| तमाम लेखकों में न तो सिद्धांत है और न ही तो कोई व्यावहारिकता| बे पेंदी का लोटा हैं| कहीं भी अवसर मिले वहीं दौड़ लगाना शुरू कर देते हैं|

इधर भी मैराथन जारी है| हर कोई ऊँचा उठ जाना चाहता है| हर किसी को नीचे उठाते हुए अपना उल्लू सीधा करना चाहता है| ऐसा करते हुए यह लगभग भूल-सा गया है कि अवसर व्यक्ति को ललचाता तो है लेकिन महत्त्व नहीं देता| महत्त्व प्रतिबद्धता से मिलती है| प्रतिबद्धता के लिए वैचारिक सक्रियता जरूरी मानी जाती है| युवाओं में इधर सक्रियता का अभाव सिद्दत से दिखाई दे रहा है| इधर उधर की सक्रियता दिखाने वाले युवाओं में भटकाव गहरे में वर्तमान है|

3.     

साहित्य का सब कुछ सर्वश्रेष्ठ नहीं होता| इधर यह भ्रम और अधिक विस्तार पाया है कि अमुक रचनाकार श्रेष्ठ है अमुक कमजोर| अच्छा और कमजोर का निर्धारण पाठक द्वारा किया जाता तो बात कुछ समझ में आती| बगैर पाठकों के पुस्तकें बेस्ट सेलर में आ जा रही हैं| जिन पुस्तकों के विषय में सुना तक नहीं गया होता है उनका सहज रूप में आकर्षण का केंद्र बन जाना क्या हतप्रभ नहीं करता? जरूर करता होगा लेकिन स्वीकार के अतिरिक्त हमारे पास कोई दूसरा रास्ता नहीं होता| इसलिए भी कि एक दिन इसी प्रक्रिया में आने के लिए हर कोई परेशान दिखाई देता है| बाज़ार उन्हें बेदखल न कर दे इसलिए आवाज तक नहीं उठाई जाती है|


बेस्ट सेलर की सूची अख़बारों, पत्रिकाओं द्वारा आती है तो क्या उन्हें वाकई बेस्ट मान लिया जाए? सूची तो लेखकों की भी आने लगी है तो क्या उन्हें भी बड़ा मानकर चला जाए? जो उन सूचियों में नहीं आते या नहीं लाए जाते उन्हें क्या कहा जाएगा? ये ऐसे प्रश्न हैं जिनका उत्तर बाज़ार के पास नहीं है और न ही व्यापारियों के पास है| चिंता बाज़ार को भी गुणवत्ता की है और व्यापारी को भी लेकिन अवगुणों को भुलाकर अवसर साधने की प्रवृत्ति इधर के दिन ही सबसे अधिक दिखाई दिए हैं|  

कई बार तो पुरस्कार प्राप्त लोग भी राजनेताओं की तरह हास्यास्पद हरकत करते नज़र आते हैं| वे करते तो फिलहाल कुछ भी ऐसा नहीं हैं जिससे कि रचनात्मक साहित्य पर कोई असर पहुंचे लेकिन किसी भी इधर-उधर के रचनाकार को ‘चने की झाड़’ पर चढ़ा जरूर देते हैं| ‘इधर-उधर’ से तात्पर्य ऐसे रचनाकारों से है जो महज नाम के लिए साहित्य में बने रहते हैं| साहित्यिक दुनिया से लेकर सामाजिक सहभागिता तक इनका कोई जुड़ाव हो, ऐसा फिलहाल नज़र नहीं आता है|

अभी हाल ही में चित्रा मुद्गल जी ने ऐसा ही किया| हिंदी के एक प्रोफ़ेसर को सबसे बड़ा आलोचक बगैर किसी सोच-विचार के घोषित कर दिया और उस बड़े आलोचक ने अपना विज्ञापन भी खूब करवाया| यह तब लोगों को पता चला कि वे भी कोई रचनाकार हैं जब स्थानीय अख़बारों ने उसे प्रमुखता से स्थान दिया| विडंबना यहीं आकर रुक नहीं जाती है| लोगों ने यह सोचकर आलोचक महोदय के विषय में जानकारी ढूंढना शुरू कि चित्रा मुद्गल ने कहा है जबकि हिंदी साहित्य के अधिकांश रचनाकार तक उन्हें नहीं जानते, पाठक की तो बात ही जाने दो| चित्र मुद्गल यहीं नहीं रुक जाती हैं आगे भी सर्टिफिकेट देने का कार्य जारी रखती हैं| बाज़ार ने कार्य तो अपना यहाँ भी किया लेकिन उसका हथियार अलग था|

चित्रा मुद्गल तो एक उदहारण मात्र हैं, ऐसे अनेक उदाहरण आपको इधर के साहित्यिक गलियारे में मिल जाएंगे| यह प्रश्न आपके दिमाग में भी कौंध रहा होगा कि आखिर ऐसा होता कैसे है? तो चौंकिए मत क्योंकि इसके लिए विधिवत पैसे खर्च किये जाते हैं| लोलुप मीडिया को माध्यम बनाया जाता है, भाड़े के समीक्षक तैयार किये जाते हैं और विधवत पैसा दिया जाता है| कार्यक्रम आयोजन करने वाली एजेंसियों पर पानी की तरह पैसे खर्च करके अपने पक्ष में माहौल तैयार किया जाता है| अब यहाँ आकर रचनाकार भी नहीं जानता होता है कि वह क्या बनने वाला है| पता दूसरे दिन के अख़बार या कुछ दिन बाद की साहित्यिक घटनाओं से चलता है जब वह अचानक कोई पुरस्कार प्राप्त कर अख़बारों के पृष्ठ पर दिखाई देता है|

लखनऊ के एक कथाकार हैं राम नगीना मौर्य, वे ऐसे ही कथाकार हैं| कब इन्होने कदम रखा साहित्य की दुनिया में और कब बड़े कथाकार हो गए, पाठक को कुछ नहीं पता है| अधिकारी हैं तो पुरस्कार प्रदाता संस्थानों को पता है और उनको भी जो ज्यूरी मेम्बर में शामिल होते हैं| यह उदाहरण व्यक्तिगत रंजिश के चलते नहीं अपितु इसलिए दिया जा रहा है कि लोग साहित्यिक समीकरण और बाज़ार के मांग और पूर्ति के सिद्धांत को समझ सकें| पद और प्रतिष्ठा के ध्यान में मग्न रचना और रचनाकार नहीं देखते हैं| देखते हैं तो वर्तमान स्थिति, जिसमें उनका अपना भविष्य सुरक्षित नज़र आए|

पाठक एक अजनबी बन बाज़ार में प्रवेश करता है तो ठगा जाता है| समझदार होता है तो अपनी अभिरुचि के अनुसार चलता है| बाज़ार में बैठे दलाल प्रवृत्ति के लोग फिर उसे घमण्डी और न जाने क्या-क्या संज्ञा देना शुरू कर देते हैं| तो इससे घबडाने या परेशान होने की जरूरत नहीं है| माहौल का हिसाब-किताब बाज़ार के हाथों में होता है| पाठक तब अपने आप को ठगा महसूस करता है जब पुस्तक उसके सामने आती है| कहा कुछ गया होता है निकलता कुछ और ही है| शीर्षक के अनुरूप विषयवस्तु तक को न पाकर जो खीझ मन में उठती है वह एक पाठक ही बता सकता है, बाज़ार नहीं| 

          यह सब ऐसे नहीं हुआ है| आलोचना के लगातार कमजोर और आलोचकों के दरबारी होते जाने से ऐसे परिदृश्य का जन्म हुआ है| कहाँ तो आलोचना विमर्श-केन्द्रित होती थी, विचारधारा और विचार केंद्र में होते थे| कहाँ तो अब व्यक्ति-केन्द्रित होता है सब कुछ| दरअसल गुणवत्ता परखने की फुर्सत इधर आलोचकों के पास नहीं है| कारण स्पष्ट है कि वह इन दिनों समीक्षाएं लिखने में व्यस्त है| अपना समीकरण फिट रखने के लिए प्रकाशकों के यहाँ स्वयं को गिरवी रख दिया है| वही बोलता और कहता है जो प्रकाशक कहता और मानता है| इतने वर्ष हो गए कविता में कोई नया आन्दोलन उभर कर क्यों नहीं सामने आया? क्यों नहीं बहस-मुबाहिशे में बाज़ार की विसंगतियों, राजनीति की कलुषताओं को शामिल करके नया मुद्दा नहीं पैदा किया गया? ऐसा होता तो आलोचकों के ही माध्यम से था| इधर इसलिए नहीं हो रहा है क्योंकि जोखिम कोई उठाना नहीं चाहता| यदि पका पकाया हुआ मिल रहा है तो खाना पकाने का जोखिम कौन उठाए भला?

बिम्ब-प्रतिबिम्ब पत्रिका के लिए लिए जा रहे साक्षात्कार में श्रीप्रकाश शुक्ल ने आलोचना की इस कमी को स्वीकार किया है| वह मानते हैं कि तीस-चालीस वर्षों से आलोचना को लगातार कमजोर किया गया| वह यह भी मानते हैं कि ऐसा होने में सोशल मीडिया ने अहम् भूमिका निभाई है| तमाम प्रकार के लोग, जिनका साहित्य आदि से कुछ भी लेना देना नहीं था, वह इस क्षेत्र में आ गए और जहाँ साहित्य का अधिकांश है वे नेपथ्य में धकेल दिए गए| इधर का समकाल अपनी खूबियों की वजह से नहीं मूर्खताओं की वजह से चर्चा में है, एक बड़ा सच यह भी है| इसका एक बड़ा उदहारण हिंदी साहित्य का कूड़ा-प्रसंग है| हालांकि यह अभी अपने प्रथम चरण में है| चरित्र-प्रसंग ने अपने दूसरे चरण में पदार्पण कर लिया है| देखना यह है कि मूर्खता का नया चरण साहित्य में क्या होता है?

4.     

साहित्य के समकाल में यह भी एक सच है कि जो भिज्ञ हैं, सर्वज्ञ वर्तमान हैं, पूजा उन्हीं की हो रही है| धन-वैभव का बोलबाला है| पद-वैभव मद में परिवर्तित होकर दास प्रथा के उन्मीलन में रत है| आप इनके खिलाफ आवाज़ नहीं उठा सकते| आलोचना नहीं लिख सकते| इन पर कविता और कहानी या उपन्यास भी लिख कर कहाँ रहेंगे आखिर? अमर और अजेय हैं ये| इन्हें सभी प्रकार के निंदा के स्वामी और निंदाओं की परिधि से बाहर का मानकर चला जाए तो अतिश्योक्ति न होगी|


समस्या वहां होती है जब ऐसे लोग भी निराला और मुक्तिबोध का प्रसंग रखते हुए विद्या और लक्ष्मी दो में से एक के होने का यथार्थ गढ़ बैठते हैं| निराला रोज इनके द्वारा अपमानित होते हैं और मुक्तिबोध लांछित| इन्हें न तो अपमान का फ़िक्र है और न ही तो लांछन का| कोई बैठा थोड़े ही है उन्हें देखने और समझने के लिए| इस प्रकार के लोग कब किसी की आलोचना करते रहते हैं और कब किसी की प्रशंसा पर उतर आते हैं, कुछ भी कहा नहीं जा सकता है| नौटंकी के जोकरों की तरह जिधर पलड़ा भारी देखते हैं उधर से ही बोलने और तरफदारी पर उतर आते हैं| कोई किसी प्रकार का लुभावना दे दे फिर तो कहना ही क्या? सारे काम-धाम छोड़कर चौकीदारी वृत्ति पर उतर आएँगे|

उत्तर प्रदेश और पंजाब इन दो प्रदेशों से मेरा गहरा सम्बन्ध रहा है| आज भी है| पंजाब कर्मभूमि तो उत्तर प्रदेश जन्म-भूमि| इन दोनों स्थानों पर आना-जाना और रहना जारी है| दोनों प्रदेशों के रचनात्मक लीला-प्रसंग को बखूबी देखा और समझा जा रहा है| बहुत अच्छे रचनाकार दोनों जगह हैं| दोनों प्रान्तों में नौसिखिये वरिष्ठों की कमी नहीं है| कुछ ऐसे भी रचनाकार हैं यहाँ जिनके पास है तो बहुत कुछ लेकिन वे न तो छप पा रहे हैं और न ही तो चर्चा में आ पा रहे हैं| प्रकाशित होने के लिए पैसे की जरूरत होती है| पैसा उनके पास नहीं है| अकादमियां जरूरतमंद को अनुदान नहीं दे सकती हैं, यह उनकी वेबसी भी है और सीमा भी| वह उन्हीं को देती हैं जिनसे वहां पर बैठे पदाधिकारियों का हित-लाभ हो| चर्चा कोई इन पर करेगा नहीं क्योंकि न तो ऐसे लोग नोकरी दिलवा सकते हैं और न ही इनके लिए मंच-माला की व्यवस्था कर सकते हैं| वे टाइप आदि की तकनीकी से भी सक्षम नहीं हैं|

ऐसा था तो हर समय लेकिन इधर कुछ ज्यादा हो गया है| पहले कुछ अच्छे प्रकाशक थे जो रचना को महत्त्वपूर्ण देखते हुए जोखिम उठा लेते थे| इधर ऐसे प्रकाशक न के बराबर हैं| पहले अपना फायदा लेते हैं फिर अन्य बात करते हैं| जालंधर के एक-दो प्रकाशकों को मैं जानता हूँ जो पैसा लेकर ही पुस्तक-चर्चा करवाते हैं| रचनाकार दे न तो क्या करे? गुमनामी से अच्छा है बदनामी को झेलना| लोग फिर भी कम से कम जान तो जाते हैं| ये उदाहरण उत्तर प्रदेश और पंजाब का भले है लेकिन इसे अन्य सभी प्रदेशों के लिए मानकर चलेंगे तो दिक्कत नहीं होगी| क्योंकि यही यथार्थ है| 

साहित्य के समकाल को देखें तो इन सबका प्रभाव यह पड़ रहा है कि, लेखन-परम्परा से लेकर रीति-स्थापत्य तक की स्थिति हाशिए पर जा रही है| विदित यह भी है कि पम्परा को संवारने और सँभालने का कार्य वही ठीक तरीके से कर सकता है जिसे कुछ पता हो| कबीर बहुत पहले कह गए थे कि “जाका गुरु है आंधरा, चेला खरा निरंध|” साहित्य-गुरुओं ने कभी भी साहित्य-परम्परा को बताया नहीं अपने शिष्यों को और शिष्य मंडली ने कभी लेखकीय परिवेश पर विश्वास दिखाया नहीं| बड़ा और महत्त्वपूर्ण दोनों बनना चाहते हैं| दोनों यह चाहते हैं कि उनका नाम स्वर्णाक्षरों में लिखा जाए और नामवर सिंह तथा केदारनाथ सिंह के बाद समकालीन हिंदी कविता का महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर उन्हें ही स्वीकार किया जाए|

इधर बैठकबाजी का दौर लगभग गया प्रतीत हो रहा है| गैंगबाजी जरूर हो रही है| काफी हाउस जैसे स्थल अब शायद जालंधर जैसे शहर में नहीं हैं| पंजाब बुक सेंटर जैसा स्थान तो है अभी भी लेकिन यहाँ के अधिकांश लेखकों को नहीं पता है कि वह कहाँ है? भूले-भटके कोई पहुँच जाए तो सेंटर के मालिक स्वयं को सौभाग्यशाली समझते हैं| साहित्यिक पत्रिकाएँ पूरे जालंधर में इस एक दूकान को छोड़कर शायद ही कहीं मिलती हों| हमारे फगवाडा जैसे शहरों में तो साहित्यिक पत्रिकाओं की परिकल्पना ही नहीं कर सकते|

जालंधर के वरिष्ठ साहित्यकार सुरेश सेठ बताते हैं कि यहाँ कुछ स्थान ऐसे थे जहाँ अक्सर हम लोग जुटते थे, बातें होती थीं और कहकहे गूंजते थे| इधर के दिन न तो वह जुटान है, न बातें न कहकहे| सब आपस में मिल कर भलाई-बुराई की चर्चा करते तो हैं लेकिन घरों में| व्यापार लाभ के लिए स्थापित ऑफिसों में| ठीक तरीके से कहा जाए तो ऐसी स्थिति में विमर्श की संभावनाएं शून्य होती जाती हैं| जो प्रवृत्ति निकलकर समृद्धि पाती है वह है व्यक्तिगत हानि-लाभ को दृष्टिगत रखते हुए ईर्ष्या-द्वेष के भाव| उत्तर प्रदेश को छोड़कर यदि पंजाब के जालंधर जैसे शहर की बात करें तो लगभग यही शेष दिखाई देता है|

अरसा हो गया जब हिंदी साहित्य से सम्बन्धी कोई विमर्शात्मक कार्यक्रम यहाँ पर हुआ हो| सम्मान-पत्र बाँटने से लेकर पुस्तक लोकार्पण के कार्यक्रम लगातार होते रहते हैं| लोग एक-दूसरे को प्रेमचंद-मुक्तिबोध-निराला-महादेवी आदि-आदि कहते रहते हैं| समझते और समझाते रहते हैं| नज़र उठाकर देखता हूँ कभी तो इस धराधाम से विदा हो चुके लेखकों की आत्मा स्वयं को कोसते हुए दिखाई देती है| लोग बड़े ही बेशर्मी से हँसते हैं और आगे बढ़ जाते हैं| ऐसा ही है साहित्य का समकाल| यहाँ जन अब उतना महत्त्वपूर्ण नहीं है जितना कि तन्त्र| तन्त्र खुश और मेहरबान रहेगा तो जन को तो बस में कर ही लेंगे लोग

5.     

साहित्य का समकाल अपने तमाम विसंगतियों के बावजूद एक सही मार्ग पर है, यह कहने में भी कोई संकोच नहीं है| सार्थक मुद्दों पर चलने वालों की कमी तो है लेकिन कुछ समर्पित हैं जो सकारात्मक पहल करते हुए आगे बढ़ रहे हैं| लगातार चल रहे हैं| ऐसे लोग कुछ से बहुत कुछ विशेष कर रहे हैं| साहित्यान्दोलन भी अपनी जगह पर गतिशील हैं तो इसके पीछे की वजह वही सकारात्मक लोग हैं| विचार-विश्लेषण से लेकर भाव-व्यवहार तक इधर के दिन समृद्ध हैं| कुछ विशेष रचनाकारों ने नए मुद्दे तलाशे हैं| ढर्रेवादी धारणा धीरे-धीरे धूमिल पड़ रही है| कविता के विषय से नारों को मुक्ति मिल रही है और लोक अपनी तरह से उसमें पुनः पदार्पण कर रहा है| बहुत दिन बाद नए काव्यान्दोलन के सूत्र पहचाने गए हैं| जल्द ही वह विमर्श के दायरे में शामिल हों, यह अपेक्षा बनी रहेगी|

तथाकथित प्रतिक्रियावादी विमर्श के गर्त से साहित्य धीरे-धीरे मुक्त हो रहा है, यह भी एक ख़ुशी की बात है| विमर्श में किसान, पर्यावरण प्रदूषण, बाज़ारवाद, भूमंडलीकरण शामिल हुए हैं तो यह एक मजबूत कदम है साहित्य का लोक के प्रति| कुंठा की जगह चेतना को विस्तार दिया जा रहा है| सोशल मीडिया हालांकि अपनी नादानियों की वजह से चर्चा-परिचर्चा में बना हुआ है, अधिकांश मूर्खताओं के बवंडर उधर से ही खड़े होते हैं, लेकिन कुछ गंभीर बातें कभी-कभी वहां भी देखने को मिल जाती हैं| जो विशुद्ध साहित्यिक दृष्टि तलाशने यहाँ आते हैं उनकी दुर्गति बड़ी भयानक होती है, यह तय है| सीखने की उम्र में ही लड़ने-झगड़ने के बीज यहाँ अंखुवाने लगते हैं| जब तक एक सम्पूर्ण वृक्ष का आकर लें तब तक लोक उन्हें आवारा और सनकी की श्रेणी में डाल चुका होता है|


कविता में गाली की जगह चेतना ने लेना शुरू किया है| कुछ बहके लोग प्रवेश तो किये थे कविता के विषय में आमूलचूल परिवर्तन का दिवास्वप्न लेकर लेकिन वे सफल नहीं हुए| पाठकों ने उन्हें बाहर का रास्ता दिखाया| उनमें से ही कुछ कूड़ा प्रसंग की पालकी ढो रहे हैं तो कुछ किनारे पड़े कूड़े को अपने ऊपर गिराने में अभ्यस्त हो रहे हैं| ऐसे लोग स्वयं को सफाई कर्मी दिखाने में लगे हैं, तो यह भी एक गलत हुआ उनके साथ जो साहित्य की दुनिया में आ गये| कुछ प्रूफ रीडर इधर व्याख्याता होने के मूड में थे सफल न होने पर वह संस्थानों को ही गाली देना शुरू कर दिए| कुछ पुरस्कार झटकना चाहते थे बड़ा और जब उन्हें बहुत दिन तक नहीं पूछा गया तो वे अब पुरस्कार विरोधी गैंग के मुखिया का पद सम्भाले पड़े हैं| पुरस्कार लेने-देने-दिलवाने वाले भी अपनी गति से सक्रिय हैं जो हर तरह से साहित्य के समकाल को समृद्ध और मजबूत बना रहे हैं|

निबन्ध और ललित निबन्धों की दास्ताँ पहले ही इस लेख में सुना दिया गया है| उपन्यास की दुनिया में कवियों ने कदम बढ़ाया है तो उपन्यासकार अब कवि बन रहे हैं| दल बदल की तरह प्रशंसा-लाभ के मोह में विधा-बदल का कार्य बड़ी प्रगति पर है| कितने ही व्यंग्यकार इधर निबन्धकार हो गये और निबंधकार कवि बन गये| कहानी अभी पोर्नोग्राफी के दौर से अपने चरम पर है| कुछ नामी पत्रिकाएँ अभी पोर्न कंटेंट राइटर की तलाश में हैं| लोक और लोक जीवन में भी वासना और सेक्स के अवसर तलाशने वाले कथाकारों की कमी नहीं है| शिवमूर्ति, भगवानदास मोरवाल, उदय प्रकाश के साथ-साथ गीता श्री, वन्दना गुप्ता, मनीषा कुलश्रेष्ठ और अन्य अनेक अभी कतारों में है, लगातार इस प्रक्रिया को मजबूत बनने में सक्रिय हैं| कुछ विशेष कथाकारों ने अपनी जमीन को बचा कर रखा हुआ है और लोक-जीवन की यथास्थिति को अभिव्यक्त करते हुए जन-जीवन को समृद्ध करने में अपना योगदान दे रहे हैं|  

परिवर्तन कहीं साहित्य में यदि ठीक से दिखाई देता है तो गीत/नवगीत की दुनिया में| नवगीतकार होने की लालसा में गीतकारों ने इधर सही ट्रैक पकड़ लिया है| अतिशय भावुकता के मोहपाश से मुक्त होकर जन संभावनाओं को तलाशने की प्रविधि पर श्रम करना उन्हें अच्छा लगने लगा है| बुजुर्ग पीढ़ी से कहीं अधिक सही दुनिया की तलाश युवाओं द्वारा की जा रही है| विधा पर विशेषांक लगातार निकल रहे हैं तो कुछ नए आलोचक भी मिले हैं| हालांकि इन सबसे कुछ तथाकथित कुछ मठों को बड़ा घाटा सहना पड़ा है लेकिन नाम-इनाम के लालच से दूर होकर सृजन कार्य करने का आनंद नवगीतकार उठा रहे हैं|

पत्रिकाओं ने अच्छा विकल्प दिया है| अख़बारों के रवैये में फिलहाल कोई परिवर्तन नहीं है| जन्संदेश टाइम्स जैसे अखबार लगातार यदि विचार की दुनिया को समृद्ध कर रहे हैं तो उसके पीछे सुभाष राय जैसे जरूरी कवि और उनकी सम्पादक-दृष्टि है| कुछ ऐसे भी सम्पादक हैं जो ग्राहकों के इंतज़ार में हैं| कोई आए, बोली लगाए और वे बिकें| फिलहाल हम साहित्य के समकाल को देख-परख रहे हैं तो आप भी अपने हिसाब से देखना-परखना शुरू करें|

दिन को कहेंगे दिन रात को रात कहेंगे

जो सबने कहा हम न वही बात कहेंगे

Wednesday, 5 May 2021

यह समय संत बनने का नहीं है बिलकुल

 इस दंगे से परिपूर्ण हो चुके समय में यह जरूरी है कि आपके घर 100-200 बम हों| पिस्टल हों, AK-47 हों| यह शास्त्र रखकर मन्त्र पढने का समय तो कतई नहीं है| आप बर्बाद हो रहे होंगे और नीच किस्म के लोग अतीत का हवाला देकर मजा लूट रहे होंगे|


कश्मीर उदाहरण है| बंगाल उदाहरण बन गया है| 400 के करीब लोग बंगाल से निकलकर असम में शरण लिए| शरणार्थी आप अपने ही प्रदेश में बन रहे हैं तो इसका सीधा सा मतलब है कि जवाब देने की हिम्मत नहीं है आपमें| हिम्मती बनिये| नहीं बन सकते तो तलाशिये उसे| यह समय संत बनने का नहीं है बिलकुल| आतंकवादियों की प्रशंसा होने वाले देश में बुद्ध बनोगे तो कश्मीर, बंगाल वाली स्थिति ही होगी|
मूर्ख बुद्धिजीवियों से कोई आशा रखना व्यर्थ है| इनके पास जो कुछ भी है वह आतंकवादियों के लिए आरक्षित है| देश के नागरिकों के लिए नहीं| ये कविताओं और कहानियों में सामाजिक सौहार्द्र खोजने वाले लोग हैं जो फेसबुक जैसे माध्यम पर ऐसी हिंसाओं को उचित ठहराते हैं|

देश को छोडो पहले खुद बचने की कोशिश करो| तुम बचे रहोगे तो देश भी बचा रहेगा| यह मात्र ममता का तांडव नहीं है अपितु मुर्दा हो चुके वाम का भी खेल है| वाम समर्थित कोई लेखक इस हिंसा को हिंसा नहीं मानेगा| नीच-बुद्धि का प्रयोग करते हुए इसे पवित्र बताएगा क्योंकि वह जान रहा है कि ऐसा करने से उसकी भक्ति बची रहेगी|
ऐसा होगा नहीं पर| तुम्हारी खूनी हिंसा की मंसा तुम्हारे हलक में डाल दी जाएगी| तुम बंगाल में शून्य आए हो देश में अर्थी उठेगी तुम्हारी| तुम्हारे सारे प्रयोग तुम्हारी शव यात्रा के सहभागी बनेंगे| तुम जितने भी उदाहरण दे रहे हो उतने उदाहरण सम्भाल कर रखना| आने वाले दिन में उन्हीं को फिर गिनना और उसमें बंगाल की इस स्थिति का मूल्यांकन करना|


तुम यह सोच सकते हो कि बंगाल कश्मीर बने तो यह तुम्हारी भूल है| तुम ऐसा सोचते-सोचते कश्मीर से भी अपंग बना दिए गये| कुछ कर नहीं पाए| कुछ कर भी नहीं पाओगे| नक्सलियों और आतंकवादियों के शव पर मानवतावाद का नाटक करने वाले नरभक्षियों 'देश' तुमको पहचान गया है| मैं यह कतई नहीं कहता कि भाजपा ही एक मात्र विकल्प है लेकिन यह यह जरूर कहता हूँ कि जितना कमजोर सम्प्रदाय विशेष को समझ रहे हो उतना वह है भी नहीं| उदाहरण लेना हो तो आज़मखान से ले सकते हो| उन्हें उत्तर प्रदेश के दंगे याद हैं|


औरतों के सामूहिक बलात्कार हुए| घरों को जालाए गए| निर्दोषों को मारा गया| सब कुछ ठीक रहने वाले माहौल में बम दगे| गोलियां चलीं और तुम इसे गलत ठहराने की बजाय उसे निर्दोष साबित करने पर तुले हो? तुम्हारे इस दोष का मूल्यांकन तो फिलहाल समय करेगा लेकिन ध्यान यह भी रहे कि हिंसा प्रत्युत्तर कभी अहिंसा नहीं होता|
तुम सभी अहिंसा के इस देश में हिंसा का तांडव करने आए हो| अतीत बनकर रह जाओगे| हो भी रहे हो| हर गलत को सही बनाना तुम्हारी परंपरा है| देश की संस्कृति को गाली देते देते देश के नागरिकों पर भी तुम्हारी कुदृष्टि पहुंची है तो अब एक ही उपाय है कि पहचान बनाकर तुम्हें घसीटा जाए| तब पता चलेगा कि निर्दोषों की हत्या का परिणाम क्या होता है|

@सभी फोटो गूगल से लिया गया है जो 4 अप्रैल की हैं| #बंगाल चुनाव#बंगाल हिंसा#

Tuesday, 4 May 2021

पंजाब की हिंदी कविता : समकालीन परिवेश की यथार्थ भावभूमि

                                                     1.

कविता इस हद तक कमजोर और गैरजिम्मेदार हो सकती है कि समाज को विलासिता के गर्त में धकेल सकती है| इस हद तक दमदार और जिम्मेदारी से परिपूर्ण कि प्रमादी और नासमझ को भी कर्मयोगी बना सकती है| यह सब कवि-कर्म पर आधारित होता है| जिनमें सच कहने और परिवेश की यथास्थिति से प्रतिरोध करने का साहस होगा वही श्रम-साहस से परिपूर्ण रचनाओं का सृजन कर सकता है| जो भीरु, लोभी और लालच से भरा होगा उसकी कविताओं में न जन होगा, न जीवन और न ही तो समय-समाज| वह सारी युक्तियाँ जरूर शामिल होंगी जिनमें उसकी नाकाबिलियत, स्वार्थता और लोभी प्रवृत्ति का यथार्थ ठीक से दिखाई दे सके| पंजाब की समकालीन हिंदी कविता में इन दोनों प्रकारों की भरमार है| इक्कीसवीं सदी के इन दो दशकों की कविताओं का विश्लेषण करें तो यह परिदृश्य और अधिक स्पष्ट हो जाएगा| 

सजग और जिम्मेदार रचनाधर्मिता में शुभदर्शन, फूलचंद मानव, सत्यप्रकाश उप्पल, राकेश प्रेम, राजेन्द्र टोकी, बलवेन्द्र सिंह, कीर्ति केसर, राजवन्ती मान, बलवेन्द्र सिंह अत्री, अमरजीत कौंके, कमलपुरी, रमेश विनोदी जैसे रचनाकार आते हैं (दिवंगत हो चुके रचनाकारों के नाम इनमें शामिल नहीं हैं) तो निष्क्रिय रचनाकारों में मोहन सपरा, गीता डोगरा, धर्मपाल साहिल, कमलेश आहूजा, प्रोमिला अरोड़ा जैसे अन्य कई नामों का जिक्र (भीड़ बहुत है ऐसे रचनाकारों की) यहाँ पर कर सकते हैं जो मंच-माला-पुरस्कार के समीकरण को सुलझाने में अभी लगे हुए हैं| एक-दूसरे को उठाने और गिराने में मस्त और व्यस्त हैं| रचनात्मक सरोकारों से दूर व्यक्तिगत प्रशंसा-गान में संलिप्त ऐसे रचनाकारों की सक्रियता भी निष्क्रियता में तब्दील होकर समय और समाज को विवशता के कगार पर ला देती हैं|


ध्यान यह रहे कि निष्क्रियता का अर्थ यहाँ यह नहीं है कि ये लोग कविता लिख ही नहीं रहे हैं, इनकी कविताओं में वह जीवन्तता नहीं है जिनसे इन्हें गंभीरता की श्रेणी में रखा जाए| इसलिए भी क्योंकि यह जो समय चल रहा है, संयोग-वियोग, प्रेम-आदर्श को बखानने-दिखाने का समय नहीं है| त्रासदी से भयाक्रांत, सहमें जन जीवन की संवेदना को शब्द देने का समय है यह| ऐसे रचनाकारों को यहाँ इस लेख में विश्लेषण का विषय नहीं बनाया जा रहा है क्योंकि इनको कविता के समकाल की परख नहीं है| अतीतजीवी होकर महज स्वप्न-दर्शन में व्यस्त रहने वाले ऐसे रचनाकार जो कुछ इधर रच रहे हैं उनमें व्यक्तिगत आत्ममुग्धता के साथ-साथ वर्तमान परिवेश से अनभिज्ञता भी जग जाहिर है| फूल-पत्ते, वर्षा-बादल आदि में निमग्न रहने वालों से परिवेश के चित्रांकन की परिकल्पना भी नहीं की जा सकती है|

ऐसे रचनाकारों के लिए इधर समय-समाज में क्या घटित हो रहा है, न तो इससे कुछ लेना देना है और न ही तो इससे कोई मतलब है कि, समाज में क्या होना चाहिए? दिखावे की रचनाधर्मिता में उलझे हुए ऐसे रचनाकार ‘कोरोना’ जैसी आपदा में ‘अवसर’ को भुनाने में लगे हुए हैं| जनता की यथास्थिति का मूल्यांकन करने की बात कौन करे, उन पर किसी को बोलते हुए भी नहीं सुनना चाहते| परिणाम यह निकलकर आ रहा है कि जिस परिवेश विशेष में ये रहते हैं वहां की रचनात्मक भावभूमि एक हद तक कमजोर और बंजर होती जा रही है| सच कहें तो लोकार्पण जैसी रवायतों में निमग्न रहने वाले ऐसे रचनाकारों ने पंजाब में जिस प्रकार की साहित्य-संस्कृति को विकासमान किया है, वह आने वाली पीढ़ी को कुछ देगी, इसमें शक है|

जो सजग हैं और जिम्मेदार हैं उनकी रचनाओं में समय और समाज का यथार्थ है| जन है, जीवन है| आपदा-विपदा को गंभीरता से लेते हुए सुख-दुःख को झेलने, समझने और अभिव्यक्त करने की समझ है| अपने समय का लोक है और लोकजीवन से जुडी स्मृतियाँ हैं| संघर्षरत जीवन है और जीवन में निमग्न रहने वाले कामगार लोग हैं| मिलों, फैक्ट्रियों, कारखानों में श्रमशील जनता की सम्भावनाएं हैं तो दूसरे प्रदेश से इस प्रदेश में आए लोगों की आशाएं और आकांक्षाएं हैं| राजनीति का कड़वा अनुभव है तो अर्थनीति में व्याप्त विसंगतियों की गहरी समझ है| किसान हैं, व्यापार है| कर्तव्य है तो अधिकार भी है| विश्व है, वैश्वीकरण है| सांस्कृतिक समृद्धि है तो विकृतियों का यथार्थ भी है| रचनागत स्वार्थ नहीं है, परमार्थ है जीवनगत|

यह सब होते हुए भी कई बार इनके नामों को दबाया जाता रहा है| इन पर चर्चा करने से बचते रहे हैं लोग| प्रचारतंत्र के इस युग में प्रकाशन-संसाधनों पर कब्ज़ा जिसका होता है वही इधर ‘बड़ा और जरूरी’ मान लिया जाता है| सच इसके विल्कुल विपरीत है| ऐसे कई रचनाकार हैं यहाँ पर जो तथाकथित ‘बड़ों’ की चुप्पी की वजह से हाशिए पर धकेल दिए जाते हैं| समकालीन पत्रिकाओं के ‘बड़े स्तर’ से ठुकराए गए ऐसे रचनाकार क्षेत्रीय पत्र-पत्रिकाओं के ‘गुट-सम्पर्क’ से भी निर्वासित रहते हैं|

कुछ ऐसे रचनाकार ऐसे भी हैं जो छपास-संस्कृति के विल्कुल बिपरीत हैं| कविताएँ लिखी और लिख कर रख दिया| उन्हें प्रकाश में लाने का कार्य न तो इधर के संपादकों ने की और न ही तो प्रकाशकों ने| पंजाब की उर्वर कविताई का आंकलन उम्र, सम्पर्क, भावुकता की बनावटी दुनिया को तोड़कर सच, सार्थक और वास्तविक रूप में हो सके, वर्षों से नेपथ्य में धकेले गए विचारों, रचनाकारों की सार्थकता को व्यापक पाठक वर्ग तक लाया जा सके, यही इस लेख का प्रदेय है|  


Monday, 3 May 2021

कोरोजीवी कविता और नवगीत विधा का सामाजिक संघर्ष

 

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कोरोजीवी कविता ने सांस्कृतिक धरातल पर गम्भीरता से अपनी उपस्थिति दिखाई है| इस दौर के नवगीत में प्रेम, साहचर्य, सद्भाव और सहभागिता पर भी कार्य हुआ है| सांस्कृतिक सहभागिता के एकीकरण का प्रयास किया गया है| सामाजिक सद्भाव और सांप्रदायिक एकीकरण पर बल दिया गया है| हर परिस्थिति में मनुष्यता को बचाए रखने का आह्वान किया गया है| इधर सबसे अधिक आक्रमण सहभागी प्रवृत्ति पर हुआ है| ऐसा न हो कि मनुष्य एक-दूसरे के खून का प्यासा हो और साथ-सहयोग की जगह मार-काट की प्रवृत्ति को लोग शौक से अपनाने लगें, नवगीतकारों का चाहना है कि इन सब पर गंभीर होकर मानवीय और करुणा से परिपूर्ण बनें|

गरिमा सक्सेना के नवगीत की पंक्तियों के सहारे कहें तो “कई चेहरे नित्य बस/ तस्वीर होते जा रहे हैं/ कीमती कितने करीबी/ लोग खोते जा रहे हैं” फिर भी वह कौन लोग हैं जो मनुष्य को मनुष्य से दूर करने पर आमादा हैं? क्या इतनी त्रासद स्थितियां उनकी आँखों को खोलने के लिए कम हैं अभी? जो खो रहे हैं उनके साथ का अभाव भी क्या एक-दूसरे को संग-साथ रहने की स्थिति को नहीं समझा पा रहा है? नहीं समझा पा रहा है क्योंकि छुआ-छूत, भेद-भाव का नया संस्करण आ गया है इधर| नवगीतकार ओम धीरज देखते हैं कि अभी हम ठीक से सामाजिक हो भी नहीं पाए थे, सामाजिक विसंगतियों को तोड़ ही रहे थे कि “छुआछूत फिर से आ धमका/ लेकर रोग बहाना,|” लम्बे जीवन अनुभव के आधार पर धीरज कहते हैं कि “भुक्ति -युक्ति के बीच मुक्ति हित/ सदियों लड़ा जमाना/ तब जाकर कुछ दशाब्दियों में/ छूटा दाग पुराना!” लेकिन कोरोना के आगमन से पुराना दाग विवशता का रूप धारण कर लिया|


जिस छुआछूत से उबरे थे उससे भी गहरे रूप में जुड़ गए| छुआछूत के इतिहास का अवलोकन करते हुए ओम धीरज कहते हैं-“उपासना के संग चला था/ पहुँचा चूल्ह -कड़ाही तक,/ भोज -भात, पानी-परात से/ जा पहुँचा परछाईं तक|” कहाँ तो हम मंदिरों में प्रवेश और निषेध के लिए लड़ रहे थे, फिर खान-पीन के व्यवहार से दूरी बनाए, भोज-भात में दूरियां बढ़ीं, इधर अब परछाहीं का बचाव किया जाने लगा है| स्थिति तो यह है कि इतने डरे और भयभीत हैं लोग कि एक दूसरे को देखना और छूना तक नहीं पसंद कर रहे हैं| माधव कौशिक का यह कहना कितना सही है कि“पहले ही अलगाव बहुत था/ अब सामाजिक दूरी/ कैसे कोई कर पायेगा/ समरसता को पूरी/ जंगल के दावानल जैसा/ संकट पसर गया|” इस संकट में कोई मर जा रहा है तो उसको कन्धा तक देने के लिए तैयार नहीं हैं|

सामाजिकता जितनी तेज से बढ़ रही थी, जातिवाद, छुआछूत-भेदभाव जितने तीव्र गति से समाप्ति के कगार पर थे, इन सब में अब उतना ही विश्वास दिखाई देने लगा है| मानवीयता के मार्ग पर बढ़ते हुए लोग अचानक अमानवीयता को ही अपना जीवन-शैली बनाने लगे हैं| इन सभी को रोकने के लिए बुद्धिजीवियों को सामने आना चाहिए| उन्हें जगदीश पंकज सरीखे नवगीतकारों के इन पंक्तियों से प्रेरणा लेनी चाहिए कि ‘जब सभी संवाद, पीड़ित/ संक्रमण से ग्रस्त, तब फिर/ बैठ मिलकर/ हल तलाशें सब परस्पर” ताकि विभेदकारी शक्तियां न सक्रिय हो पाएं और सब मिलजुलकर संकटग्रस्त समस्याओं से लड़ सकें और धरा-धाम को सुंदर से सुन्दरतम बना सकें|  

कोरोना की त्रासदमय स्थिति में रचनाकारों को पर्यावरण प्रदूषण का भी ख्याल आया है| चिड़ियों का प्यासे रह जाना, बैठने के लिए पेड़ की शाखाओं का उपलब्ध न होना, हवा का विषाक्त होना, भरे-पूरे, हरे-भरे परिवेश का जंगल में परिवर्तित होते जाना नवगीतकारों की चिंता है| पकज परिमल अपने नवगीत में स्वीकार करते हैं-"जो निसर्ग से मुफ़्त मिले, वे/ दूषित हुए हवा औ' पानी/ आज शुद्धता अनुपलब्ध हो/ करती है अपनी मनमानी|” इस मनमानी में हम सब शामिल हैं अपनी अज्ञानता और जिद के साथ| परिदृश्य तो यह है कि ईंटों से निर्मित महलों ने भारत की स्व-निर्मित आवास-प्रणाली को लगभग समाप्ति के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है| पहले छान-छप्परों के रहने से कुछ भले न हो लेकिन जीव-जंतुओं को भी रहने का आसरा मिल जाता था| रविशंकर पाण्डेय की चिंता वर्तमान परिवेश के लिए जायज है-“छानी छप्पर/ सब लील गए/ जंगल के जंगल ईंटों के/ आदमजाये/ बिलबिला रहे/ अंडों बच्चों से चींटों के ,/ छोटे छोटे कोठे/ क्या हैं ज्यों/ छत्ता एक तइया का!” ये नए जमाने के आशियाने हैं जहाँ जीव-जंतुओं की चिंता न होकर बस अमीर से अमीर दिखने के शौक-साधन शेष हैं|

अतीत-स्मृति के सुख को खोजते विवेक आस्तिक के इन प्रश्न भरे चिंता में हम सब की चिंता शामिल है कि “कहाँ छुप गए गुलर-फूल से/ प्यारे-प्यारे दिन/ अब तो आँखें कसक रही हैं/ गौरैयों के बिन|” जीव-जंतुओं, गौरैयों आदि के विलुप्ति के कगार पर होने से धरती का सौन्दर्य विनष्ट हुआ है| रवि नंदन सिंह की दृष्टि में इन सब स्थितियों का परिणाम यह हुआ है कि “आसमां की गोद में अब/ शाम भी ढलने लगी,/ लौटती लहरें तटों को/ अलविदा कहने लगीं,/ डूबते सूरज से उसकी/ रश्मियाँ भी बिछुड़ गयीं|” शेष क्या हैं फिर? मनुष्य की अह्मंयताएं, मूर्खताएं और अज्ञानताएँ जो इधर प्रकृति से दूर रहते हुए किताबों के पन्नों से साक्षर हुए लोगों में बढ़ी हैं|

सामाजिक स्थिति बद से बदतर की तरफ बढ़ती जा रही है| पर्यावरण का प्रभाव इधर सम्पूर्ण परिवेश पर देखा जा रहा है| इधर के दौर में बढ़ी सांस्कृतिक विकृति से भी हम इनकार नहीं कर सकते हैं| कोरोजीवी कविता का प्रयास है सांस्कृतिक समृद्धि बनाए रखना| रहन-सहन, बात-व्यवहार, चाल-चलन से लेकर आचार-विचार तक की प्रक्रिया पर नवगीतकारों ने गीत दिए हैं| इन गीतों में संस्कृति के उन विन्दुओं पर चर्चा की गयी है जिनसे आचार-विचार-व्यवहार आदि का निर्धारण होता है| धर्म-कर्म, पूजा-पद्धति आदि को हम आचार-विचार को संयमित रखने का साधन मानते थे लेकिन पंकज परिमल “पूजा , हवन , अजान , प्रार्थना/ रुँधे  कंठ  की   मौन  व्यथायें” मानते हैं| इन सब से दुःख कम नहीं हो रहा है और न ही तो कोई आसरा मिल रहा है| हम जितना इनकी तरफ बढने की कोशिश कर रहे हैं दुःख उतना ही अधिक सघन होता जा रहा है| शांति तो बहुत दूर की बात हो गयी है|

वैसे भी ईश्वर, ईश्वर के रूप और उनके मोह से आदमी का मोहभंग इधर हुआ है| बृजनाथ श्रीवास्तव का यह प्रश्न “वक्त कठिन है/ ऐसे में हम/ किसको आराधें” हर उस व्यक्ति का प्रश्न है जो इस त्रासदी चपेट में आया है| यह पहले भी किसी लेख में कहा जा चुका है कि शब्द-सत्ता के सक्रिय होने का समय है ये| सभी सत्ताएँ, चाहे वह ईश्वरीय हों या मानवीय, असहाय और लाचार हुई हैं इधर| जगदीश पंकज कहते हैं “अब समायोजन-प्रबंधन का/ जटिल है समय/ आओ, मान्यताओं पर/ विचारें पुनः मिलकर” ताकि आपदाओं में हमारा साथ देने वाला न भी हो तो हम आत्मबल से ही सही, लड़ तो सकें कम से कम|

यह संकट का समय चल रहा है| जीवन संकटों से होकर हर समय गुजरता रहता है| हम अन्य समस्याओं से इतने भयभीत कहाँ होते हैं जितना इधर के दिन कोरोना से हो रहे हैं? जीवन को निर्भय और सकारात्मक पथ पर लाने के लिए हमें पंकज परिमल के गीत की इन पंक्तियों को समझना होगा-“थोड़ी-बहुत दिक्कतें आती रहती हैं/ पर मन को छोटा करने से क्या होगा/ अपनी नज़रों की ही ताकत कम होगी/ आँसू को मोटा करने से क्या होगा,” चिंताएं बढ़ेंगी, समस्याएँ अनायास पैदा होंगी, शारीरिक रूप से हम कमजोर होंगे तो किसी न किसी रूप से कोरोना जैसे अदृश्य वायरस के भाजन ही बनेंगे| इसलिए समस्त चिंताओं को छोड़कर वर्तमान को जीने में तत्परता दिखानी चाहिए क्योंकि “हरदम नहीं/ महामारी का/ मंजर होगा/ खुद से या फिर/ नहीं हवाओं का/ डर होगा/ कुम्हलाए/ पौधों में जीवन/ संभव होगा (योगेन्द्र मौर्य)|” ये महज स्वप्न एवं आशा के वाक्य भर नहीं है मनुष्य और मनुष्यता को बचाए रखने के लिए ऐसी पंक्तियों को आशा भरे आधार मन्त्र मानकर चलना चाहिए|

इधर के नवगीतकार लगातार आम जन की सम्वेदना को शब्द देने में सक्रिय हैं| शुष्कता और भावुकता को त्यागकर यथार्थ परिदृश्य का अवलोकन ही नहीं कर रहे हैं, साहस के साथ अभिव्यक्त कर रहे हैं| हमें नवगीत के स्वर को समझना होगा| उसके साहस को मानना पड़ेगा| किसी भी विधा को बगैर पढ़े ख़ारिज कर देने की तत्परता से बचना होगा| कविता की अन्य सभी विधाओं से कम सक्रियता नहीं है इधर| कोरोना समय में नवगीत ने अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन खूब किया है और वर्षों से आलोचकों की इस मांग को कि नवगीत में यथार्थ बोध के क्षमता नहीं है, पूरा किया है| कोरोजीवी कविता में नवगीत के सामाजिक संघर्ष पर यह अपनी तरह का लेख है जिसके सारे सन्दर्भ फेसबुक से लिए गए हैं| 

 

Sunday, 2 May 2021

कोरोजीवी कविता और नवगीत विधा का सामाजिक संघर्ष

 

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अपने किसी लेख में यह बात मैं पहले से ही कहता आया हूँ कि दलित-विमर्श और स्त्री-विमर्श की तर्ज पर लम्बे समय से हिंदी साहित्य में किसान-विमर्श की मांग उठ रही थी| उनके जीवन के यथार्थ को अभिव्यक्त करने की अपेक्षा बराबर बनी रही लोगों की| ऐसा नहीं है कि साहित्य में किसान की यथास्थिति पर विमर्श नहीं है| अन्य विधाओं की बात करें तो मुंशी प्रेमचंद से उदाहरण हम ले सकते हैं| कविता हो या नवगीत इन विधाओं में किसान के जीवन-यथार्थ पर गंभीर कार्य होते रहे हैं| यदि सक्रियता और सतर्कता के साथ इस विमर्श को परिचर्चा का माध्यम बनाया गया होता तो परिदृश्य वही न होता जो आज है| कहने को किसान सुखी और समृद्ध हैं| हर सुविधाओं का फायदा उठा रहे हैं| यही स्थिति जब आप किसानों से पूछेंगे तो उनके ही नहीं आपकी आँखों से भी आंसू चू पड़ेंगे| मैं बड़े रहीसों और ठेकेदारों की बात नहीं कर रहा हूँ| ऐसे किसानों की बात कर रहा हूँ जो वाकई किसान हैं तमाम विडम्बनाओं को जीते हुए भी वर्तमान हैं|


कोरोजीवी समय के नवगीत विधा में किसानों की यथास्थिति को गंभीरता से लिया गया है| यदि यह कहें कि यथार्थ-स्थिति की अभिव्यक्ति का पूरी संवेदना के साथ जीवंत चित्रण हुआ है, तो अत्युक्ति न होगी| कोरोना समय में ही राष्ट्रीय स्तर पर किसान आन्दोलन हुए| आन्दोलन की आड़ में छल छद्म की राजनीति भी खूब हुई, यह एक अलग मुद्दा है| फ़िल्मी दुनिया से हटकर किसानों के लिए यथार्थ में पहली बार ऐसा आन्दोलन देखने को मिला| किसान अधिकारों के लिए साहित्य, कला, संगीत, राजनीति, समाज हर क्षेत्र के लोग आगे आए, हालांकि यथास्थिति का जायजा लेते हुए कुछ अलग भी होते गए| जिस समय लोग कोरोना के भय से घरों में दुबके पड़े थे उसी समय किसान अपने अधिकारों की मांग पर अड़े थे| यह एक सहस का कार्य तो है ही|

कोरोजीविता के दौर में हर समय शांत रहने वाले कुछ नवगीतकारों को छोड़ कर अधिकांश ने किसान की यथास्थिति पर पूरी निर्भीकता से अपनी अभिव्यक्ति दी| अनामिका सिंह ‘अना’ किसानों की सभी त्रासद स्थितियों का जिम्मेदार पूंजीवाद को मानती हैं-कृषक हितों की बात छलावा/ पूँजीवाद महान|” उनका प्रश्न है कि “उचित मूल्य फसलों का हलधर/ कब-कब हैं लाये” जब भी वह आगे आए हैं, षड्यंत्रों की बलि बेदी पर चढ़ा दिए गए हैं| उचित मूल्य की क्या कहें, सरकार और पूँजीवाद की मिलीभगत में ‘कम’ के लिए भी लाइन में लगे रहते हैं| यदि अनामिका की दृष्टि में “कृषि प्रधान है देश हमारा/ भूखा मगर किसान” तो किसी भी देश और समाज के लिए इससे बड़ी त्रासद स्थिति और क्या होगी कि, जो दूसरों का पेट भर रहा है स्वयं भूखा है|

भूख और बेगारी की स्थिति से जुड़े किसानों के लिए न्यायलय है, संसद है, पूँजीवाद है सब हैं, बावजूद इसके वह असहाय, अनाथ और लाचार-वेबस के रूप में जीवन यापन कर रहा है| ऐसा इसलिए क्योंकि उसका सच कोई रखने वाला नहीं है| नवगीतकारों ने इस सच को कहने और प्रस्तुत करने का साहस दिखाया है| आन्दोलन में आए ‘किसानों की स्थिति’ और उनकी तत्कालीन परिस्थिति को राहुल शिवाय अपने नवगीत में स्पष्ट दिखाते हैं-“वह बँटेदार रामू जो था/ उसका उपजा फिर नहीं हुआ/ अफसर, मुखिया, कर्जे में ही/ राहत का पैसा सभी बँटा/ वह आंदोलन कर लौट गया/ पर मिला नहीं कुछ दिल्ली से/ राधा चूल्हा-चौका करती/ दुखिया दो बेटी छोड़ गया/ नीलाम हुआ जब घर उसका / वह दुनिया से मुख मोड़ गया/ राधा-सी कितनी रोती हैं/ वह भूख मिटाएगीं कैसे|” अधियारो (बंटेदार) की स्थिति सभी जानते हैं| खेत-बारी उनका नहीं होता लेकिन करते सभी कार्य वही हैं| ऐसे किसानों की संख्या देश में बहुत है| आपदा में आई राशि ऐसे किसानों के पास कभी नहीं पहुँचती| इनके गुजरने के बाद ‘राधा-सी’ बहुत होती हैं जिनके आपद-विपद में कोई सहायक नहीं होता| इनके लिए राजनीति किसी छल से कम नहीं है| शिवाय यह दिखाने का प्रयत्न कर रहे हैं कि-“राजमार्ग पर सिसक रहे हैं/ गेहूँ, मक्का, धान/ धीरे-धीरे उघर रहा है/ सत्ता का परिधान” क्योंकि कभी किसी दल ने कोई सहायता प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से शायद ही की हो| दिल्ली में ऐसे बहुत किसान थे जिनको अब उनका पड़ोस भी शक की दृष्टि से देख रहा है|  

भारतीय कृषि मौसम पर निर्भर है| चुनावी मौसम, षड्यंत्र के दिन से उबरता है जब किसान तो प्रकृति भी उसके साथ क्रूर मजाक करती है| फसलों का असमय नष्ट हो जाना, सूख जाना या अंकुरित ही न होना, ये सभी स्थितियां किसानों को अनाथ करती हैं| व्याकुलता भरी स्थिति में किसान यही सोचता है कि “खुल कर कभी न/ रो पाए हम/ मन करता रोएं दहाड़ के!!” इसी नवगीत में रविशंकर पाण्डेय किसानों की यथास्थिति पर कहते हैं-

सावन सूखे/ भरे न भादों/ बहक गए हैं/ दिन आषाढ़ के

किस्मत अपनी/ रहे बांचते/ मौसम-/ सूखे और बाढ़ के !

पारसाल बूड़े उतराए/ आसौं/ सूखे की चपेट में

पहले कमर/ एक ने तोड़ी/ दूजा मारे लात पेट में ,

फिर भी/ बोते रहे खेत हम/ सस्ता मद्दा मूस काढ़ के !

समय चक्र के/ उलट फेर से/ यह कैसा अंधेर हो रहा

कल तक जो/ चेरापूंजी था/ अब वह जैसलमेर हो रहा,

औंधी कोठली और बखारी/ क्या रखते/ हम काट माड़ के !

गाते आए/ रो धो करके/ हम जीवन भर बारहमासी

हरी धनखरी की/ छाती में/ उग आई क्यों सत्यानाशी,

         

‘चेरापूंजी’ का ‘जैसलमेर’ होना, ‘सूखे’ और ‘बाढ़’ के बीच अपनी किस्मत को बांचना ही भारतीय किसानों का यथार्थ है| इधर कोरोना समय में आपदा ने किसानों के लिए एक नयी समस्या पैदा कर दी है| अवनीश त्रिपाठी मानते हैं कि इनके दिन कटते हैं तामझाम में/ अंदेशे में रात/ नहीं सुधरते लेकिन अब भी/ मौसम के हालात/ टूटी खपरैलों के/ कारण/ सिसक रही दीवार|” तामझाम में दिन बिताने वाला किसान स्वयं तामझाम बनाकर रह गया इस कोरोना समय में| अभी लॉकडाउन लग जाए तो दो वक्त की रोटी भी मुश्किल हो जाए छोटे किसानों के लिए, जो एक गंभीर समस्या है|

          कोरोजीवी नवगीत अपनी सम्पूर्ण चेतना के साथ मनुष्य की वेदना को अभिव्यक्त करती है| इधर के नवगीतों में हर चीजें गौण हो चुकी हैं| किसान की सम्पन्नता, खेतों का सौंदर्य, फसलों की हरियाली से लेकर प्रेम, मनुहार जैसी स्थितियां एकदम गौण हो गयी हैं| ऐसे परिवेश की यथार्थता पर यश मालवीय उनका पक्ष रखते हैं-“भूखे से लोग जियें बदहाली,/ ऐसे में पेट हम भरें-गाएँ/ इससे तो अच्छा है मर जाएँ|” मरने का कारण सीधे तौर पर यह है कि हाहाकार, डर, भय, चिंता, व्यग्रता जैसे भाव परिवेश में हावी हो रहे हैं| किसानों का जीवन इनसे अछूता नहीं है| वे सब भय और त्रासद की स्थिति में हैं| उनकी वर्तमान स्थिति को अक्षय पाण्डेय विश्लेषित करते हुए कहते हैं कि-“रोज हरा सपना किसान/ आँखों में बोता है/ शीतलहर, पाला-पाथर संग/ जगता-सोता है/ जर्जर तार-तार छप्पर है/ तन पर फटी हुई चादर है” ऊपर से परिवार को पालने-पोषने की चिंता है, घर-बार चलाने की वेबसी है और सामने लॉकडाउन है, बंदी है, घर से न निकलने और हर हाल में वही करने की बाध्यता है जिनसे न तो उन्हें उबरना है और न ही परिवेश को|

यह नवगीत का सामर्थ्य है जिसकी वजह से परिवेश में आपदा में अवसर की जगह अभिव्यक्ति का साहस दिख रहा है| किसानों, मजदूरों, वेबसों की यथास्थिति को प्रस्तुत करते हुए निश्चित तौर पर एक ईमानदार रचनाकार होने का धर्म निभाया है नवगीतकारों ने| समकालीन मुद्दों पर सक्रिय सहभागिता के लिए इस विधा की वापसी हमें आश्वस्त करती है और कविता की ज़मीन से गायब हो रही उर्वरता को बनाए रखने के लिए प्रेरित भी|

Saturday, 1 May 2021

कोरोजीवी कविता और नवगीत विधा का सामाजिक संघर्ष

नवगीत विधा में जिस राजनीतिक चेतना की कमी का आरोप था इधर कोरोना समय के दौरान वह चेतना सम्पूर्ण उर्वरता लिए दिखाई दी| योगेन्द्र मौर्य की दृष्टि में “नये गीत से/ नये समय का/ अनुभव होगा/ धरती के चेहरे पर/ फिर से/ उत्सव होगा|” उत्सव तब होगा जब सभी सुरक्षित, संयमित रहते हुए अपने अधिकारों के प्रति सचेष्ट होगा| इस हेतु भी वरिष्ठ और युवा रचनाकारों ने गम्भीरता के साथ अपने समय का मूल्यांकन किया| ‘तन्त्र’ के प्रतिरोध में होकर ‘जन’ की आशाओं और आकांक्षाओं को लेकर अपना पक्ष स्पष्ट किया| इस स्पष्टता में यह ठीक तरीके से दिखाई दिया कि नवगीत समकालीन परिस्थियों को अभिव्यक्त करने में पूर्ण सक्षम विधा है| नवगीत की परिधि में रहते हुए आप देखेंगे तो स्पष्ट यह भी हो जाएगा कि ‘तन्त्र’ द्वारा इस कोरना समय में जन को सबसे अधिक ठगा गया| ‘लोक’ अवाक रह गया|


नवगीतकारों ने लोकतंत्र के सहभागी प्रवृत्ति को ‘लोक’ बनाम ‘तन्त्र’ की भूमिका में चिह्नित किया| जिस राजा को प्रजा के हित कार्य करना चाहिए, वह राजा उसके अहित में मग्न होकर मदमत्त है| जिस ‘तन्त्र’ को ‘लोक’ का आवरण दिया गया वह पूर्ण रूप से लोक को विलुप्त के कगार पर खड़ा कर उसे ‘तन्त्र-निर्मित’ कुछ हाथों की कठपुतली बना दिया| यहाँ यह कहना सर्वथा उचित है कि— “मुखिया को मुख-सा होना था/ भूल गये शुचि मूल  मन्त्र  यह,/ कुछ हाथों की कठपुतली हम/ कैसा  अपना   लोकतंत्र   यह,/ दीवारें    भी    बोल   रही   हैं/ बहुत  अशुभ होता है नृप-मद ।(नवगीत-सुनो प्रियंवद, अक्षय पाण्डेय)” विडंबना यह है कि जिस परिवेश की दीवारें ऐसा बोल रही हैं उसी परिवेश में रहने वाली जनता मूकदर्शक बन गुमनाम करने के खेल में सहभागी है| नृप-मद इतना कि उसे सामूहिक नरसंहार भी ‘उत्सव’ दिखाई दे रहा है| ऐसा पहली बार फिलहाल नहीं हो रहा है कि ‘तन्त्र’ के निर्माण में ‘लोक’ को मृत्यु के मुंह में धकेल दिया जा रहा हो, लेकिन इतना तय है कि जिस अंदाज में हो रहा है, वह पहले कभी शायद ही हुआ हो|

यह सभी को पता है कि कोरोना एक आपदा है, प्रकृति-आपदा है या मनुष्य-जनित, यह बाद की बात है| ऐसी आपदाओं में आदमी रस्म-रिवाज तक को निभाने से कतराने लगता है| जगदीश पंकज एक जगह कहते हैं कि “दौड़ती सी ,भागती सी/ फिर रही है मौत/ सड़कों, अस्पतालों,/ और गलियों में मचलकर” जिसका समाधान करने की बजाय राजा चुनाव में मग्न है और इस मग्नता में मरते लोग न दिखाई देकर ‘आपदा में अवसर’ की तलाश लिए लोगों का जीना दुश्वार कर रहा है| ‘भूप है चुनाव में मगन’ में अक्षय पाण्डेय का यह कहना हमें सत्ता के अवसरवादी प्रवृत्ति को दिखाना है-“कोरोना  काल  बन  खड़ा/ जीना   दुश्वार    कर   रहा,/ दुःख में अवसर तलाश कर/ कोई   व्यापार   कर   रहा,/ मानवता      शर्मसार     है/ उसकी यह देख कर ठगन|” मानवता शर्मसार है लेकिन सत्तासीन लोग और उनके समर्थित एकदम निर्लज्ज होकर आँख मूंदे पड़े हैं| 

यश मालवीय की मानें तो “सत्ता के सब दलाल,/ नोंच रहे बोटी/ जल रही चिताओं पर,/ सेंक रहे रोटी|” जनता की बात करने की जरूरत जहाँ है, जहाँ उनके दुःख-दर्द को अंधी शासन तक पहुँचाने का कार्य करने की जरूरत है वहां सब सत्ता की दलाली में मशगूल हैं| कोई केंद्र की दलाली कर रहा है तो कोई राज्य सरकार की| कोई पक्ष को कोस रहा है तो कोई विपक्ष को| जबकि पक्ष-विपक्ष महज सत्ता के लिए केन्द्रित हैं, मनुष्य की गति-दुर्गति से कोई लेना-देना नहीं है उनका| सत्ता-व्यवहार अभी किसी को नहीं दिखाई दे रहा है तो यह एक गंभीर समस्या है| सत्ता और केंद्र भी एक दूसरे पर तोहमत फेंक कर स्वयं मुक्त हो जा रहे हैं जिसे यश मालवीय ने बड़ी गंभीरता से दर्ज किया है-केंद्र राज्य पर छोड़े/ राज्य केंद्र देखे/ देश मर रहा, मुखिया/ बस जुमले फेंके|” यश की दृष्टि में यह उसी जुमले का प्रभाव है कि-क़दम-क़दम पर मिलता,/ मौत का कुआँ|” स्थिति तो ऐसी है कि क्या गाँव क्या शहर, हर गली हर नगर, कोई न कोई कोरोना संक्रमित पाया जा रहा है और किसी न किसी का करीबी गुज़र रहा है|

नवगीत में सत्ता से समझौता का फिलहाल कोई सवाल नहीं है| जन महत्त्वपूर्ण है और जन संवेदना की सम्भावनाओं को पंख देना उद्देश्य| अनामिका सिंह ‘अना’ अपनी नवगीत में सत्ता को ही जिम्मेदार ठहराया है| इस जिम्मेदारी में उन्होंने मुखिया को निशाना बनाते हुए कहा कि गली-नगर-सडकों पर “साँसें पड़ीं शांत जितनी भी/ उन सबके हो हत्यारे/ दृष्य भयावह टर सकते थे/ लेकिन तुमने कब टारे|” समस्या है सबको पता है लेकिन समस्या को भाग्य और आपदा में तब्दील करके देखने से विकरालता बढ़ जाती है उसकी| इस विकरालता में सुभाष वशिष्ठ का यह प्रश्न हम सबका प्रश्न बन मन-मस्तिष्क को बेधने लगता है- रोग,रोगी,चिकित्सालय/ आपदा भयभीत सब/ "सामने अदृश्य रिपु है/ पा सकेंगे जीत कब?" अदृश्य सिर्फ कोरोना होता तो समस्या का समाधान हो भी सकता था| इधर दोयम दर्जे की राजनीति हो रही है तो ‘सादृश्य रिपु’ भी ‘अदृश्य रिपु’ में परिवर्तित हो गए हैं|

इधर के नवगीतों में सत्ता-प्रतिरोध पर अडिग रहते हुए परिवर्तन पर भी विचार किया जा रहा है| सही भी है, क्योंकि लोकतंत्र में परिवर्तन का विकल्प हर समय मौजूद होता है| यही विकल्प गलत करने से रोकता है और सही के ‘चुनाव’ के लिए प्रेरित करता है| बृजनाथ श्रीवास्तव का मानना है कि “शल्य चिकित्सा लोकतनत्र की/ अब तो बहुत जरूरी है/ और लोक से बनी हुई जो/ आज तंत्र की दूरी है/ हिम्मत बाँधो लौटेंगे फिर/ दिवस गये जो रूठ|” रूठे दिवस को वापस लाने के लिए विचार-मंथन की प्रक्रिया पर मजबूती से कार्य करना चाहिए| अब यहाँ यदि कवि-कथन पर विश्वास करें तो कहीं ऐसा तो नहीं कि वर्तमान ‘शासन-व्यवस्था’ का प्रतिकार कर ‘अतीत-व्यवस्था’ के आगमन के लिए सब्र की बात की जा रही है? 

‘तन्त्र’ से ‘लोक’ की दूरी को समाप्त करने के लिए ‘वर्तमान’ या ‘अतीत’ पर मंडराना ठीक तो नहीं होगा? भविष्य के लिए विचार करने की प्रवृत्ति अपनानी पड़ेगी तो इसके लिए ‘व्यवस्था’ के चेहरों में परिवर्तन की बात करनी चाहिए| जब इस प्रकार के परिवर्तन की बात की जाएगी तो वह कुछ हद तक स्थाई और मजबूत व्यवस्था होगी| इस परिवर्तन में नेताओं की जगह लेखकों, पत्रकारों आदि के शासन व्यवस्था में हस्तक्षेप की मांग हो और यह अपेक्षा हो कि इनके आने से राजनीति का स्वरूप परिवर्तित हो सके| यहाँ कवि ‘कबीर’ की तरह मात्र समस्याएँ न देकर ‘तुलसी’ की तरह साफ़ विकल्प दे तो परिदृश्य और भी स्पष्ट हो सकता है|