Tuesday, 4 January 2022

पंजाब में मठों का कारोबार बढ़ा है इन दिनों यह बात और है कि महत्त्व दिनों दिन घटता जा रहा है

 

जब मैं यह कहता हूँ कि पंजाब में हिंदी भाषा एवं साहित्य की दुर्गति में यहाँ के शिरोमणि साहित्यकारों का बड़ा हाथ है तो उसे हल्के में न लेकर चलें| लगातार सात वर्षों की सक्रिय भूमिका के दम पर यह बात मैं कह रहा हूँ| आपको न विश्वास हो तो कुछ ज़मीनी तहकीकात आप भी कर सकते हैं| जब ऐसा कर रहे हों तो निरपेक्षता का भाव मन में बना रहना चाहिए यह जरूरी है| संस्तुति और भक्ति तो किसी की भी की जा सकती है लेकिन मूल्यांकन में निरपेक्षता का होना जरूरी होता है|

लगभग अहिन्दी भाषी प्रदेशों में हिंदी भाषा एवं साहित्य के उत्थान के लिए कोई न कोई सरकारी संस्था, अकादमी है जरूर| पंजाब में हिंदी के उत्थान, प्रचार-प्रसार के लिए जहाँ तक मेरी जानकारी है, ऐसा कुछ नहीं है| हिंदी का अपना कोई भवन या अकादमी तक नहीं है| युवाओं में उत्साह है, जोश है, रुतबा भी है लिखने-पढ़ने और संवाद करने के लिए लेकिन प्रेरणा जहाँ से मिलती है इस क्षेत्र में बराबर बने रहने के लिए, वहाँ यहाँ न के बराबर है| किसी भी संस्थाओं के पास यहाँ के युवाओं के लिए मेरी जानकारी में कोई प्रकाशन योजना या पाण्डुलिपि योजना नहीं है| ये बात जोर देकर फिर से मैं कह रहा हूँ कि प्रतिभाएं हैं लेकिन उन्हें प्रोत्साहन देने वाली कोई ऐसी संस्था नहीं है जिसके माध्यम से वह अपनी योग्यता का सर्वश्रेष्ठ दे सकें|

कोई कार्य करने के उद्देश्य से यहाँ आप यदि हिंदी भाषा एवं साहित्य के लिए एकत्रित होना चाहें तो बड़ी मुश्किलें आती हैं| हिंदी के किसी रचनाकार के नाम पर कोई सरकारी स्कीम शायद ही चलती हो....? (पंजाब के भाषा विभाग पटियाला से कुछ नामों पर कुछ देते हैं शायद लेकिन वह भी न के बराबर) ऐसा क्यों नहीं हो सका? इसका एक सीधा सा सवाल तो पहले यह हो सकता है लोगों के नज़र में कि यहाँ के साहित्यकार उस काबिल नहीं हुए कि उन्हें इस प्रकार की संस्था या संस्थान की उपलब्धता सुनिश्चित कराई जा सके| दूसरे, योग्य तो थे लेकिन योग्यता उनमें उतनी नहीं थी कि ऐसा कर या करवा सकें| पहला विकल्प तो लगभग गलत है लेकिन दूसरे से इंकार नहीं किया जा सकता। शिरोमणि साहित्यकारों ने इसके लिए कभी कोई लिखित या मौखिक प्रयास किया हो, मुझे नहीं पता है। 

यहाँ की जितनी स्ववित्तपोषित (हिंदी के नाम पर घोषित अघोषित) संस्थाएं हैं उनके जरिये बीते वर्ष में कुछ ऐसा कार्य नहीं हुआ जिससे कि यहाँ के वैचारिक परिवेश की निर्मित में कोई लाभ हुआ हो| कागज के टुकड़े बांटे गए हैं इफराद में यह अलग बात है| पुरस्कार और सम्मान के नाम पर छीछालेदर हुआ है इससे इनकार नहीं किया जा सकता है| निजी पैसे और व्यक्तिगत रूचि-अभिरुचि पर चलने वाली संस्थाओं में अलग तरह की राजनीति है| इन संस्थाओं ने तो जैसे सभी नीतियों को ठिकाने लगाकर रख देने की कसमें खा ली हैं| यहाँ हिंदी के महापुरुषों के नाम पर पुरस्कार और सम्मान तो दे देते हैं लेकिन राशि आदि का कहीं कोई अता-पता नहीं होता| नाम का चयन भी व्यक्तिगत सम्बन्धों को आधार बनाकर किया जाता है तो अयोग्य को सम्मानित करने और योग्य को उपेक्षित तथा अपमानित करने का विधिवत खेल भी खेला जाता है| पूरा वर्ष बीत गया मैं कहीं नहीं सुना कि कहीं पर किसी स्वतंत्र विषय पर चर्चा-परिचर्चा हुई हो या किसी ठीक तरह के साहित्यकार का सम्मान किया गया हो| लोकार्पण कार्यक्रम खूब हुए हैं, इसे कोई कैसे भूल सकता है |



जो कागज के टुकड़े बांटकर साहित्यिक होने और साहित्यकार पैदा करने या पालने का स्वप्न संजोए हुए हैं उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि जब तक वैचारिक कार्यक्रम न होंगे उनके द्वारा उनकी गिनती किसी भी रूप में साहित्यिक मठ में न होगी| मठों का कारोबार बढ़ा है इन दिनों यह बात और है कि महत्त्व दिनों दिन घटता जा रहा है| अधिकांश तो घर से बाहर ही नहीं निकले| घर को ही संगोष्ठी कक्ष बना लिया| अधिकांश ने इतना श्रम किया फिर भी आस-पडोस वाले भी साहित्यकार मानने के लिए तैयार नहीं हैं| अधिकांश साहित्याकर कागज के सम्मान लेने के लिए भी एड़ी-चोटी का जोर लगा लिए बावजूद इसके उन्हें निराशा ही हाथ लगी|  

यहाँ मैंने किसी ज़िम्मेदार पत्रिका को नहीं देखा जो निरपेक्षता के साथ व्यापक उद्देश्यों को साध सके| हुकुमचंद राजपाल जी द्वारा प्रकाशित शब्द-सोरोकर व्यापक परिदृश्य पर आती थी लेकिन उसे भी उन्होंने साहित्य की जगह व्यापार और लाभ हित में प्रयोग किया| बरोह् पत्रिका अमृतसर से तो बिम्ब प्रतिबिम्ब पत्रिका फगवाड़ा से निकलती हैं जिनसे कुछ आशाएं और बहुत सारी अपेक्षाएं हैं| इधर कुछ और लोग निकालते थे पत्रिका तो बंद कर दिए| कुछ लोग अभी भी स्वप्न संजो रहे हैं पत्रिका निकालने के लिए तो उनका स्वप्न यथार्थ में परिवर्तित हो हम दुआ करेंगे ईश्वर से| ऐसा इसलिए क्योंकि उनके स्वप्न और मुगेरीलाल के भाई नवरंगी लाल के स्वप्न में कोई खास अंतर नहीं है| फर्क बस इतना है कि नव्रंगीलाल यह समझ लेते थे कि वह स्वपन देख रहे थे लेकिन यहाँ लोग समझते नहीं समझाना पड़ता है| अफ़सोस कि समझ फिर भी नहीं आती है|

खन्ना पटियाला, अमृतसर, लुधियाना, मोगा, पठानकोट जैसे शहरों से व्यापक सरोकार वाले रचनाकार जा रहे हैं तो पदार्पण भी कर रहे हैं| जालंधर अपनी तरह की विकृतियों से आक्रांत है जो धीरे-धीरे ही सही फगवाड़ा को भी अपने गैंग में शामिल कर लिया है| यहाँ जो है वही है, दूसरे को तो कोई कुछ समझता नहीं| यह न समझना उन्हें कुंठा में तो डाल ही रहा है परिवेश पर भी गलत प्रभाव डाल रहा है| हर पुरस्कार रचनाकार के लिए साधन होता है| जालंधर में वह साध्य है| कोई नहीं दे रहा है तो यहाँ ऐसे भी रचनाकार हैं जो व्यक्तिगत आयोजक से फ़ोन करके अपना बनवा लेते हैं| यहाँ के पुरस्कार आयोजकों में और अधिक भागमभाग है| साहित्य और सरोकार से सम्बन्ध भले न हो किसी का, आयोजकों से सम्बन्ध बराबर सुरक्षित रखेंगे| तन-मन-धन से छल-छद्म-दंभ से जिस भी रूप में बनेगा उसे अपने पक्ष में भुनाएंगे| जितना श्रम इस दिशा में कार्य करने और मन लगाने का किया जा रहा है इसका यदि पचास प्रतिशत भी साहित्य-सर्जना और व्यवस्था-संवाद में लगा दें तो दशा और दिशा दोनों बदल जाएँ|



2021 जा रहा है बल्कि गया| अब समय है कि 2022 को ठीक तरीके से जिया जाए| परिवेश की सुन्दरता और समाज का सौंदर्य सुरक्षित रहे इसके लिए हमें प्रयास करना चाहिए| शिरोमणि साहित्यकारों को अपना अस्तित्व सुरक्षित रखने के लिए युवाओं को जोड़ने और सृजन करने के लिए प्रेरित करना चाहिए| अहम् जैसा कुछ तो होना ही नहीं चाहिए और न ही तो स्वयं को ईश्वर मानकर अपने-अपने फालोवर्स को लड़ाई आदि में लगाना चाहिए| संवाद को खुले मन से स्वीकार करने का साहस यदि हो तो साहित्य और संस्कृति के लिए बहुत कुछ किया जा सकता है| इधर के साहित्यकारों में एक नए किस्म की दौड़ मची है जहाँ मूर्खताएं अधिक हैं समझदारी कम|

विरोध वैचारिकता से हो तो कुछ नया निकलता है लेकिन जब वैयक्तिकता पर ही केन्द्रित रहे तो कुण्ठित करता है| यहाँ कुछ ऐसे साहित्यकार भी देखे जा रहे हैं जो किसी भी कार्यक्रम खराब करने का सुपारी लेने और देने लगे हैं| दुर्भाग्य से इसमें भी कुछ शिरोमणि साहित्यकारों के नाम शामिल हैं जो पहले कार्यक्रम खराब करवाते हैं फिर उसकी नाराजगी को दबाने के लिए चार लोगों को लेकर बधाई देने जाते हैं| पूछने का मन तो करता है कि आखिर यह कौन-सी नयी रवायत है जो विकसित की जा रही है लेकिन बर्रे के छत्ते पर ढेले कौन फेंके?

 

Thursday, 30 December 2021

पंजाब प्रदेश के हिंदी साहित्य एवं भाषा का बंटाधार यहाँ के लगभग वर्तमान शिरोमणि साहित्यकारों ने किया

 

2021 भी गया लगभग| आज और कल का दिन शेष है| इन दो दिनों में वैसे कोई चमत्कार होने से रहा| जो पूरे वर्ष सोए रहे तो आज कौन-सा जग जाएंगे| युवाओं को अपनी उम्मीदें यहाँ वरिष्ठ साहित्यकारों से छोड़ देनी चाहिए| विडंबना की बात यह है कि जो ललक एक युवा में होनी चाहिए उससे भी निचले स्तर की ललक यहाँ के वरिष्ठों में देखी जा रही है|

वरिष्ठों की देख रेख में ही यहाँ हिंदी भाषा एवं साहित्य के लिए दिए जाने वाले लगभग पुरस्कार बंद कर दिए गये| हिंदी के शिरोमणि बन चुके लोगों से इस वर्ष कुछ आन्दोलनों की उम्मीद थी भाषा एवं साहित्य के लिए लेकिन ऐसा न हो सका| जिनके सिर पर नेतृत्व का ताज था वह स्वयं पुरस्कार खोजते और कमेटियों के मध्य गिडगिडाते दिखाई दिए|

पंजाब प्रदेश में कभी हिंदी भाषा एवं साहित्य के लिए लगभग दर्जनों पुरस्कार थे|  मेरी जानकारी में वर्तमान में एक ही पुरस्कार बचा है और वह है शिरोमणि साहित्यकार का सम्मान| इस एक पुरस्कार के लिए जो नूर कुश्ती मचती है कि बस देखते बनता है| हर सम्मान घोषित होने के बाद कोर्ट कचेहरी तक की धमकियाँ दी जाती हैं| इस वर्ष तो यह भी हो गया| विडम्बना की बात यह है कि ऐसा सिर्फ पाने के लिए होता है| जो पुरस्कार बंद कर दिए गए उनके प्रति कोई आव़ाज शायद ही कोई उठाया हो|

यह जानकर आपको आश्चर्य होगा कि सर्जना और आलोचना के क्षेत्र में मिलने वाले तमाम पुरस्कार शिरोमणि साहित्यकारों की चौकीदारी में समाप्त कर दिए गए लेकिन इनके मुख से आह तक न निकली| अकेले जालंधर के शिरोमणि भी यदि किसी चौक पर चौकड़ी लगाकर बैठ गए होते तो काफी भला हो गया होता भाषा एवं साहित्य का लेकिन ऐसा कुछ न हुआ|

जन सरोकारों के लिए कार्य करने वाले साहित्यकारों को दिए जाने वाले पुरस्कार बंद हुए तो फायदा किसे हुआ? सरकार से सवाल करने की बजाय ये लोग आपस में टांग खिंचाई करते रहे| एक ने दूसरे के कार्यक्रम को फ्लाप करने के लिए सुपारी ली तो दूसरे ने उसके कार्यक्रम को बदनाम करने के लिए शूटरों की व्यवस्था की| यही सब पूरे वर्ष केंद्र में रहा|



पंजाब का वर्तमान हिंदी साहित्य तमाम प्रकार के विडम्बनाओं का शिकार है| जन जागरण एवं जागरूकता जैसे विषयों पर न लिखने और न बोलने का जैसे ठीक ले लिया है यहाँ के लोगों ने| कुछ को छोड़कर लगभग साहित्यकार जैसे कोमा में चले गये हैं| जालंधर हर दृष्टि से संपन्न शहर है यहाँ का| पत्रकारिता एवं साहित्य का क्षेत्र इनसे नेतृत्व की उम्मीद लगाए रखता है लेकिन यहाँ के साहित्यकारों ने पंजाब अन्य अन्य अंचल के साहित्यकारों से अधिक निराश किया|

अन्य अंचल के साहित्यकार तो कुछ न कुछ बोल भी देते हैं यदा कदा, यहाँ के लोग एकदम से मौन में व्यस्त हैं| कभी जब जागते हैं तो पुस्तक लोकार्पण या फिर बहुत खुश हुए तो चार लोगों को इकठ्ठा करके चाय-पानी कर लिए| बाद इसके इसी चाय पानी के रश्म को राष्ट्रीय संगोष्ठी में परिवर्तित करके अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर देते हैं| अखबार वाले तो खैर बैठे ही हैं टाइप किये हुए मैटर को छापकर हीरो बनाने के लिए|

पंजाब का हिंदी साहित्य किस दिशा में जा रहा है इस पर गम्भीरता से विचार करने की जरूरत है| अभी यदि न किया गया तो बाद में हाथ मलने के अलावा कुछ न शेष बचेगा| युवाओं को विशेषकर आना होगा इस दिशा में आगे| अस्सी वर्ष के बुजुर्गों से कोई उम्मीद नहीं की जा सकती| वह अभी जोड़ तोड़ के साथ अमर होने के लिए स्वप्न में व्यस्त हैं| वह इतिहास के हीरो बनने के लिए अपने फालोवर्स की गिनती कर रहे हैं| तो आप इनके शौक में न शामिल होकर इस चिंता में शामिल होइए कि आखिर हिंदी भाषा एवं साहित्य की बेहतरी के लिए इस प्रदेश में क्या किया जा सकता है?

आइये एक कदम बढाते हैं

कुछ समझते हैं कुछ समझाते हैं

Sunday, 21 November 2021

कुछ अपनी कुछ जग की

  
आज ही कवि एवं आलोचक गणेश गनी जी से बातचीत करने का अवसर मिला| क्या पूछा मैंने और उन्होंने क्या कहा सब कुछ यहाँ कैद है| आप सुनिए और समय-साहित्य के रूप-स्वरूप का मूल्यांकन कीजिये|

Saturday, 16 October 2021

जिस दिन हम स्वप्नों की खेती करना सीख लेंगे, परिवेश उसी दिन से समृद्ध होने लगेगा|

 बिम्ब-प्रतिबिम्ब प्रकाशन को लेकर मेरे मन में कुछ चलता रहता है| स्वप्न देखता हूँ कि इस प्रकाशन के माध्यम से कई विशेष रचनाकारों को ला रहा हूँ| उन्हें, जिनके पास पैसे नहीं हैं लेकिन शब्द-सामर्थ्य है| उन्हें, जो बड़े पद पर नहीं हैं लेकिन समन्वय और सहभागिता से भरे हुए हैं|

बहुत कुछ सोचता रहता हूँ अपनी तमाम व्यस्तताओं के बावजूद भी| किताबों को प्रकाशित करना और फिर उन्हें पाठकों तक पहुंचाना भी ज़िम्मेदारी है हमारी| मैं मानता हूँ और जब स्वयं किताबों का पैकेट बनाता हूँ और पोस्ट करता हूँ तो बहुत आनंद भी मिलता है| यहाँ भी स्वप्न देखता हूँ कि बिम्ब-प्रतिबिम्ब की किताबें वे लोग भी पढ़ रहे हैं जिन तक बड़े प्रकाशनों की किताबें नहीं पहुँच पा रही हैं| जो ज्यादा पैसा खर्च करने की स्थिति में नहीं हैं लेकिन किताबों को पढ़ना चाहते हैं| बहुत संतोष मिलता है ऐसा देखते हुए|
बिम्ब-प्रतिबिम्ब मेरा स्वप्न है| मैं बिम्ब-प्रतिबिम्ब का| कभी-कभी ऐसा भी लगता है| नाम अलग है लेकिन लगाव एक-सा| यह सच है कि पैसे दोनों के पास कम हैं लेकिन इच्छाएं एकदम स्वच्छ पानी-सा| उत्साह अधिक है| व्यस्तता दोनों के पास हैं| दोनों अपनी तरह की दुनिया का निर्माण चाहते हैं और अपनी तरह से ही सक्रिय हैं|
जुड़ते समय इतना देख कर जुड़ें कि अनिल फिर भी बिम्ब-प्रतिबिम्ब से अलग है| कई बार समस्या वहाँ हो जाती है जहाँ लोग अनिल और बिम्ब-प्रतिबिम्ब को एक समझ कर जुड़ते हैं| अनिल का काम विशेष रूप से आलोचना और प्राध्यापकीय सरोकारों से जुड़कर चलता है जबकि बिम्ब-प्रतिबिम्ब प्रकाशन का कार्य प्रकाशन से सम्बंधित है| इतना-सा ध्यान रखेंगे तो बिम्ब-प्रतिबिम्ब और अनिल दोनों की इच्छाएं पूरी होती जाएँगी और आपकी आशाएं भी|
बहुत-से कार्य ऐसे हैं जो सिर्फ और सिर्फ बिम्ब-प्रतिबिम्ब के माध्यम से पूर्ण होने हैं और ऐसे भी कार्य हैं जो मात्र अनिल के माध्यम से| मेरी कोशिश है कि इन दोनों के बीच के दायरे बने रहें और सरोकार भी| मैं चाहकर भी जरूरी और विशेष रचनाकारों की किताबें नहीं छाप सकता लेकिन बिम्ब-प्रतिबिम्ब कर सकता है| यदि आपके पास ऐसे रचनाकार हैं तो आप मुझसे संपर्क करा सकते हैं| समय जरूर लगेगा मेरे पास लेकिन पूरा किया जाएगा, यह तय है|
कई बार कुछ ऐसे लोग जुड़ जाते हैं जो एक-दो दिन या दस-बारह दिन में ही हीरो बनकर छा जाना चाहते हैं| साहित्य जगत में उन्हें लगता है कि वे अब बहुत बड़ा मुकाम प्राप्त कर लेंगे| आप प्राप्त करिए मैं कुछ नहीं कह रहा हूँ लेकिन जब भी मेरी दुनिया में कदम रखिये तो बाकायदा समय निकालकर| आपके पास समय होगा तो मैं अपना समय भी उसमें जोड़ दूँगा| यदि आपके पास समय न होगा तो मैं तो वैसे ही चौबीसों घंटे व्यस्त रहने वाला इंसान हूँ|
बिम्ब-प्रतिबिम्ब मेरे लिए एक माध्यम भर नहीं है| अब जीवन-शैली है| चाहकर भी इसे छोड़ नहीं सकता| अपनी ऊर्जा इसे समाप्त करने में न लगाइए| सब चीजें नष्ट हो जाती हैं लेकिन स्वप्न नहीं नष्ट होते| वह जीवित होते हैं| बिम्ब-प्रतिबिम्ब की संकल्पना ऐसी ही संकल्पना है जो नष्ट होने की बजाय और अधिक विस्तृत होती जा रही है| यदि आपके पास भी कोई स्वप्न है तो इस स्वप्न में लाकर मिलाकर दीजिये| नयी दुनिया बनेगी और फिर कुछ नए स्वप्न जन्म लेंगे| जिस दिन हम स्वप्नों की खेती करना सीख लेंगे, विश्वास मानिए परिवेश उसी दिन से समृद्ध होने लगेगा|
तो आइये एक कदम के साथ दो-चार कदम और बढ़ते हैं| नए स्वप्न और नई दुनिया की तलाश में| हम सफल न होंगे तो असफल भी न होंगे| पहले से कहीं अधिक बेहतर जरूर होंगे|

Wednesday, 13 October 2021

पिज्जा-बर्गर संस्कृति के हिमायती लोग साहित्य में नमक-प्याज ढूंढ रहे हैं

 कल-परसों पंजाब के वरिष्ठ कवि सत्यप्रकाश उप्पल जी ने अपनी एक पोस्ट में कुछ ऐसा कहा कि "पंजाब के हिंदी साहित्य को जब तक कोई ठीक का समालोचक (या आलोचक) नहीं मिलता तब तक तू मेरी पीठ खुजला मैं तेरी खुजलाता हूँ जैसा ही चलता रहेगा|" ऐसा नहीं है कि पंजाब में आलोचक नहीं हैं| यह सच जरूर है कि यहाँ के भेड़चाल में वे नहीं फँसे| आलोचकों में यदि गिनती करवाऊं तो बड़ी संख्या में लोग सक्रिय हैं| राष्ट्रीय स्तर पर उनकी पहचान है लेकिन वे इन पर चुप रहते हैं| हर ऐरा-गैरा पर बोलना वैसे भी आलोचना के लिए सुखद नहीं होता और आलोचकों के लिए भी, ये हमें समझना होगा| सच्चाई तो उप्पल सर को भी पता है, नहीं है तो होना चाहिए कि जिन्हें वे विशेष करके चिह्नित करना चाहते हैं उन पर कोई क्यों नहीं बोल रहा है? जब पंजाब के आलोचक बाहर के रचनाकारों पर बोल रहे हैं तो बाहर के आलोचक पंजाब के रचनाकारों पर क्यों नहीं मुँह खोल रहे हैं?

पहले तो उनके लिखे को पढ़कर काफी देर तक सोचता रहा| फिर विचार किया कि पंजाब के जो कुछ सही के रचनाकर हैं उन पर लिखना या कहना तो गलत नहीं है लेकिन इधर जो कुकुरमुत्ता की तरह उगे हुए लोग हैं, जिन्हें न कविता की समझ है और न ही तो आलोचना की, उनके रहते यह ईमानदार आलोचना कहाँ सम्भव है? मूल्यांकन की तो बात ही जाने दीजिये| एक दिन में यहाँ यशपाल से बड़ा रुतबा हाशिल करने वाले लोग हैं| भले कथा साहित्य की प्रस्तुति का अंदाजा हो या न हो| मोहन राकेश जैसे रचनाकार की औकात ही नहीं कुछ ऐसा कभी कभी तमाम रचनाकारों के शक्ति-प्रदर्शन को देखकर लगता है|


यहाँ के साहित्यिक परिवेश में रहते हुए चार वर्ष से अधिक हो गया मुझे| अक्सर गोष्ठियों में मैंने देखा है कि प्रेमचंद जैसे रचनाकारों को यहाँ के लोग जेब में लेकर घूमते हैं| जब मर्जी किया, जिसे चाहा, उसे घोषित कर दिया पंजाब का प्रेमचंद| जबकि स्थिति उनकी फेकचंद बनने की भी न रही| महादेवी वर्मा तो जैसे इन सभी के आगे पानी भरती हैं| कार्यक्रमों में जिन्हें महज भीड़ का हिस्सा बनने के लिए आमंत्रित किया जाता है वह भी स्वयं को महादेवी वर्मा से कमतर नहीं समझते/समझती हैं|
ज़मीनी स्तर पर निष्क्रिय लोग साहित्य को महज खिलौना समझ बैठे हैं| पिज्जा-बर्गर संस्कृति के हिमायती लोग साहित्य में नमक-प्याज ढूंढ रहे हैं| विडम्बना यहीं तक होती तो ठीक था जिन्हें न गाँव का पता है और न ही ग्रामीण संस्कृति का वे भी कथाकार रेणु की उपमा से विभूषित हो रहे हैं| सच तो यह है कि निरा व्यापारी भी यहाँ का भारतेंदु बन साहित्य की ज़मीन को बंजर बना रहे हैं| व्यापारी साहित्यकार नहीं होते ऐसा विल्कुल नहीं है लेकिन साहित्य के विशुद्ध व्यापारी जब साहित्य में सुधार और संभावना पर चर्चा करते दिखाई देते हैं तो हँसी आती है|
झोला उठाऊ रचनाकारों के यहाँ दंभ इतना है कि शब्द निकला नहीं कहीं और ये कोर्ट का दरवाजा तलाशने लगे| 80-90 वर्ष तक के बुजुर्गों तक को मैंने ऐसा कहते और योजना बनाते हुए देखा और पाया है| आप यदि थोड़ी भी गंभीरता से विचार करें तो सोचें कि निरा वैयक्तिक स्तर पर पहुंचकर मार-काट देने की धमकियों वाले अंचल में वाद-संवाद कितना संभव हो सकता है, यह समझने की ही नहीं देखने और जानने की भी जरूरत है| पिछले चार वर्ष के लगभग की सक्रियता में मैंने यही देखा| खुद पंजाब का आलोचक इन पर नहीं बोलना चाहता| दिल्ली, बनारस या अन्य अंचलों के रचनाकार इनके लिए प्रिय हैं| क्यों? क्योंकि साहित्य किसी क्षेत्र विशेष के दायरे में सीमित रहने वाला नहीं है| यदि ऐसा होता तो पंजाब का अधिकांश आलोचक अब तक दलाल-माफियाओं के माध्यम से जेल के अन्दर होता| जो बचा रहता उसे सुपारी देकर उठवा दिया गया होता|

Friday, 17 September 2021

किसी सम्मानित व्यक्तित्व के नाम से कागजी पुरस्कार एवं सम्मान देने का अधिकार भी इन्हें आखिर कौन दे देता है?

इस समय सम्मान खूब बंट रहे हैं| न देने वालों की कमी है और न लेने वालों की| कम्प्यूटर पर कागज डिजाइन करके किसी को देने में जाता भी क्या है आखिर? इसी बहाने हिंदी सेवी होने का खिताब भी मिल जाता है| देने वाला फायदा में होता है जबकि लेने वाला अक्सर ठगा जाता है| देने वाले इसी बहाने प्रतिष्ठित मान लिया जाता है जबकि लेने वाला अपना पैसा तो खर्च करके आता ही है एक तरह से ईमान भी गँवा कर जाता है |


जो सही मायने में रचनाकार हैं, जिनके पास अपनी जमीन और अपना विवेक है वह ऐसे सम्मान पत्र को लेने से मना कर दें, जिसके साथ सम्मानजनक नकद राशि न जुड़ी हो| ऐसा करके वह अपनी इज्जत तो बचा ही लेंगे उनकी इज्जत भी बचा लेंगे जिनके नाम से धड़ल्ले से लोग पुरस्कार और सम्मान बाँट रहे हैं| जिनके नाम से पुरस्कार और सम्मान बांटा जा रहा है वह तो हैं नहीं इस दुनिया में इसलिए वह खुद ऐसी स्थिति का मूल्यांकन करें जो इसमें सहभागी हो रहे हैं|

किसी सम्मानित व्यक्तित्व के नाम से कागजी पुरस्कार एवं सम्मान देने का अधिकार भी इन्हें आखिर कौन दे देता है? कम से कम ऐसे रचनाकार यदि जिन्दा होते तो कदापि ऐसा न करने देते| किसी दिवंगत रचनाकार को सम्मान नहीं दे सकते तो अपमान करने का अधिकार किसने दे दिया भाई? यह सब तो शोध के विषय हो चले हैं| सवाल यह है कि शोध करवाए कौन? हर किसी को इधर के दिन ऐसे सम्मानित होने या सम्मान पत्र प्राप्त करने की लालसा बढ़ी हुई है| हर कोई मंच-माला की तलाश में अटक-भटक रहा है|


समस्या यहीं तक हो तो चल भी जाए| पुरस्कारों का नाम तक रखना जिसे नहीं आता है दुर्भाग्य से वह भी स्वयं को भारतेंदु, निराला, मुक्तिबोध, महादेवी, अमृता प्रीतम का उत्तराधिकारी सिद्ध करने लगता है| इतनी हिम्मत कहाँ से ले आते हैं भाई? थोड़ी तो शर्म होनी चाहिए न? चलो व्यक्तिगत स्तर पर कुछ भी कह लो स्वयं को, कुछ भी घोषित कर लो लेकिन जो सही अर्थों में श्रम किये हैं, अपने समय की विसंगतियों को झेले हैं उनके नाम पर तो अपनी रोटी न संको न?

कागज बाँट कर बड़ा आप बन जाइए लेकिन जिन्होंने वाकई सारी उम्र हिंदी भाषा एवं साहित्य की सेवा की है उसको तो मुक्त रहने दीजिये? जीते जी तो आप जैसे सस्ते लोगों के दकियानूसी स्वभाव को झेलता है एक संघर्षशील लेखक और मरने के बाद इनकी स्वार्थलिप्सा उस पर भारी पड़ जाती है| फिर इसी प्रतिष्ठित व्यक्तित्व के नाम को इस तरह बदनाम करने का षड्यंत्र क्यों रचा जाता है या रचा जा रहा है?

अब इन प्रश्नों के जवाब किससे मांगने जाया जाए? आप सबके समझ में कुछ हो तो जरूर कहें, मैं तो फिलहाल जालंधर शहर की नौटंकी देखने में व्यस्त हूँ| सार्थक तरीके का कोई काम करना यहाँ जोखिम का सौदा है| सम्मान पत्र बाँट कर बड़ा होना और पुस्तक लोकार्पण समारोह रखकर बड़ा बन जाना यहाँ के लिए सबसे सरल और आसान तारिका है|

Friday, 4 June 2021

एक झूठ छिपाने के लिए सौ झूठ बोलना पड़ता है (साहित्यिक हादसों का शहर, जालंधर)


साहित्यकार से किसी भी बात की अपेक्षा नहीं होती है सिवाय नैतिकता के| नैतिकता ही वह स्थिति होती है जिसके केंद्र में रहते हुए वह अपना लेखन कार्य करता है| गलत को गलत और सही को सही अपने नैतिक मापदंडों के आधार पर ही वह दिखाता है| नैतिक मापदंड हर लेखक के अलग-अलग जरूर होते हैं लेकिन ईमानदारी की बात सबके लिए एक-जैसी होती है| यह लेखक की ईमानदारी का ही प्रभाव होता है कि, साक्ष्य के लिए जब कुछ नहीं मिलता तो व्यक्ति समय विशेष से सम्बन्धित रचनाकारों के पास जाता है| उन्हें ढूंढता है| उनकी रचनाओं के पन्ने-दर-पन्ने पलटता है| रचनाओं को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करता है तो सामने वाला यह मानने पर विवश होता है कि वहां कुछ कहा गया है| संग्रहकर्ता या खोजकर्ता उनके पास पहुँच कर कुछ जानने और समझने का प्रयास करता है| इस प्रयास में पाठक या खोजकर्ता ऐसा बहुत कुछ प्राप्त करता है, जो उसे दिशा देते हैं| सीखता है बहुत कुछ जो आगे चलकर समाज में पुनः उस सीखे हुए का व्यावहारिक प्रयोग करता है|

पाठक जिस समय किसी रचनाकार को पढ़ रहा होता है उस समय उसके द्वारा गढ़े चरित्र, परिवेश उसे प्रभावित करते हैं| उसके प्रभाव में कई बार वह वैयक्तिक आचरण भी कर बैठता है| यदि पात्र गलत है, मर्यादित नहीं है तो पाठक सहजतः वही मार्ग अपनाएगा| फिल्मों से लेकर उपन्यासों और महाकाव्यों
के पात्रों का विश्लेषण करें तो यह स्पष्ट तौर पर दिखाई देता है कि दर्शक या पाठक नायक की भूमिका को अधिक वरण कर रहा है| खलनायक को वह मार-पीट रहा होता है| भला-बुरा कह रहा होता है| हर क्षण हर गतिविधि के लिए कोस रहा होता है| इतना कि जैसे नायक या नायिका पर घटित होने वाली हर यातना उसके अपने ऊपर घटित हो रही हो|

नायक का जो चरित्र होता है दरअसल उसमें लेखक-चरित्र का अधिकांश शामिल होता है| यदि यह कहूँ कि लेखक जैसा होगा उसकी रचना का नायक भी कमोबेस वही या वैसा ही होगा, तो शायद गलत न हो| पाठक पर इसका प्रभाव यदि देखना हो तो बच्चों के अभिनय पर ध्यान देना चाहिए| संवेदनात्मक झुकाव हर समय नायक के ही पक्ष में रहता है क्योंकि नायक नैतिक, ईमानदार और आदर्श-चरित्र के रूप में दिखाया जाता है| सब कुछ छोड़ देगा वह लेकिन नैतिकता को न तो कुंठित होने देगा और न ही तो चरित्र-पतन में भागीदार होगा| हर सम्भव प्रयास करके उसे मजबूत बनाता है और प्रेरणा रूप में प्रस्तुत कर लोक-समृद्धि में अपना योगदान देता है| आप उदहारण के लिए राम के चरित्र को देख सकते हैं| कृष्ण के चरित्र को देख सकते हैं| कर्ण और अर्जुन के साथ-साथ एकलव्य और शम्बूक के चरित्र का मूल्यांकन कर सकते हैं| शम्बूक और एकलव्य का अभिनय जब भी हमारे सामने आता है हम राम और द्रोणाचार्य को खलनायक के रूप में घिरा पाते हैं| खैर...अधिक विषयांतर न हो इसके लिए पुनः उन्हीं प्रसंगों पर वापसी करते हैं|

रचना-प्रक्रिया से कहीं अधिक उलझा व्यवहार होता है लेखक-धर्म के निर्वहन का| जिस लेखक को आप कई बार भगवान् का रूप मान रहे होते हैं वह निकृष्टतम व्यवहार करता हुआ दिखाई देता है| जिसे आप गलत समझ रहे होते हैं वह सही कार्य करता हुआ दिखाई देता है| देखने और समझने लायक स्थिति यह भी होती है कि क्या लेखक उन मूल्यों पर अडिग रह पाता है जिनकी पैरवी वह अपनी रचनाओं में कर रहा होता है? इस पर थोड़ी देर ठहर कर सोचिए| निर्णय लेने की बहुत अधिक जल्दबाजी नहीं है| त्वरित निर्णय लेना अधिकांशतः हानिकारक होता है| हानिकारक, कोई स्थिति हो या वस्तु, अपने लिए जितना नुकसानदायक दायक होती है परिवेश के लिए उतना ही खतरनाक| इसलिए ऐसे विषयों पर त्वरित निर्णय लेकर जजमेंटल होने से बचना चाहिए| कोशिश भी करें बचने की तो क्या गलत है?

लेखक-व्यवहार से जुड़े जब आप इन सभी मुद्दों पर संवाद कर रहे हैं तो लेखक के दैनिक अभिरुचियों की तरफ ध्यान लगाइए| यह फेसबुक और व्हाट्सएप का ज़माना है| यहाँ सिर्फ ‘रचना से मतलब रखिये’ जैसे आदर्श भाव अब नेपथ्य में चले गए हैं| सब कुछ अनावरण है| कुछ भी नहीं छिपा है| लेखक अपने लेखकीय कर्तव्य के प्रति कितना सजग और समर्पित है यह सब उसके सोशल मीडिया से देखा-समझा जा सकता है| यहीं से उसका व्यवहार बोलेगा और यहीं से पता चलेगा कि वह संवेदनशील कितना है? एक मजे की बात तो यह है कि संवेदनशीलता की परिकल्पना फेसबुक जैसे प्लेटफार्म पर आप रचनाकारों से नहीं कर सकते हैं| वह बहुत ही आत्ममुग्ध और अवसरयुक्त दिखाई देगा|

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थोड़ा इन सबसे आगे बढ़कर बात किया जाए तो, इधर कुछ दिन से ऐसा आभास हो रहा है मुझे कि हर वर्ग का अपना एक जातीय वर्ग होता है| इन जातीय वर्गों के मध्य रहते हुए आप पाते हैं कि जैसे-जैसे समझदारी बढ़ती है रचना-तन्त्र का उलझा हुआ रूप आपको और अधिक उलझाने लगता है| ‘तन्त्र’ सिर्फ राजनीतिक दलों के ही नहीं होते हैं, साहित्यिकों के भी होते हैं| समय-समय पर उनके चुनाव कराए जाते हैं| योग्य और अयोग्य की भर्तियाँ और छंटनी होती है| जो अयोग्य होते हैं उन्हें रखा जाता है| योग्य जो होते हैं उन्हें समझदार कहकर बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है| जिस तरह से राजनीतिक दलों में ईमानदार और समझदारों के लिए जगह नहीं होती ठीक उसी तरह साहित्यिक दलों में ईमानदारी की कोई गुंजायश नहीं होती है| जो ईमानदारी का पक्ष लेता है वह या तो ठिकाने लगा दिया जाता है या फिर विधिवत बाहर कर दिया जाता है| यह इसलिए सम्भव हो पाता है क्योंकि राजनीतिक तन्त्र की भाँति साहित्यिक तन्त्र में भी उनके अपने गुर्गे, लठैत, चौकीदार होते हैं| एक सज्जन आदमी के लिए जितनी विशेष उसकी अपनी इज्जत है, संसार की कोई भी वस्तु या स्थिति उसके बराबर नहीं है| साहित्य में जमकर लूट होती है और सज्जन चरित्र अपने को बेदाग़ रखने के लिए मौन हो वह सब कुछ देखता रहता है|   

ईमानदारी और नैतिकता की बात करें तो साहित्यकार दुनिया को गाली देता है| प्रधानमंत्री को गाली देता है| राष्ट्रपति को देता है गाली| राजनीति, समाज, अर्थ सबको संस्कार का पाठ पढाता है| पाठक अभिभूत होता है| अपनी किसी भी रचना में रचनाकार भ्रष्टाचार को जड़ से फेंकने की बात करता है तो हम सबकी आँखें सजल हो उठती हैं| किसी के दुःख पर रोना रोता है तो हम सब द्रवित हो जाते हैं| सामंजस्य, समन्वय, भाईचारा और विश्वबन्धुत्व की बात जब भी करता है, हम समर्पित होकर उसके चरणों में बिछ जाते हैं या बिछने का मन करने लगता है| हम यह प्रायः सोचते हैं कि इतनी सदाशयता वह लाता कहाँ से है? इतनी विनम्रता और विनयशीलता वह पाता कहाँ है? हम यह सब तो सोचते ही हैं, यह भी सोचते हैं कि वह कितना असाधारण है हम साधारण लोगों की अपेक्षा|

सोचना चाहिए और एक हद तक होता भी है लेकिन इस सोच में अक्सर यह भूल जाते हैं कि साहित्यकारों की अपनी परेशानी और अपनी कुंठाएं होती हैं, जिनसे वे ज़िन्दगी भर बाहर नहीं निकल पाते हैं| कई बार ऐसे रचनाकार चेतनाशील समाज के स्थान पर कुंठाग्रस्त समाज का निर्माण कर बैठते हैं| वे स्वयं तो कुंठा और संत्रासग्रस्त जीवन जी ही रहे होते हैं परिवेश को भी उसी के दायरे में लाकर खड़ा कर देते हैं| ऐसा कैसे और क्यों होता है, सबसे पहले तो यही विमर्श का विषय होना चाहिए| हुआ भी है कई बार ऐसे विषयों पर विमर्श| सही अर्थों में मुझे लगता है कि हर एक नगर, गाँव और महानगर में ऐसा होना चाहिए ताकि लोगों को पता चल सके कि साहित्य और साहित्यिक मूल्य क्या होते हैं? फेसबुक ने साहित्य से तो बहुतों को परिचित करा दिया लेकिन साहित्यिक मूल्य क्या होते हैं, इससे अभी अनजान ही रखा हुआ है|

जब तक कोई विमर्श सुचारू रूप से शुरू हो ऐसे विषयों पर, तब तक फिलहाल हमें बहुत दूर जाने की जरूरत नहीं है| विषय हमारे आपके आस-पास हैं तो उदाहरण भी छिटके पड़े हुए हैं| जरूरत है तो खुली आँखों संज्ञान लेने की| यदि आप ऐसा करना ही चाहते हैं तो आप ध्यान दीजिये रचनाकारों के दैनिक साहित्यिक घटनाओं पर| जब आप ऐसा करना शुरू करेंगे तो अक्सर पायेंगे कि वह जितने भी कार्य करता है उनमें से अधिकांश गलत और गैर-जिम्मेदार कार्य करता है| जिन संस्कार, नैतिकता, ईमानदारी, मर्यादा और समझदारी की बात वह करता है और जिसकी अपेक्षा दूसरों से करता है, वह उसमें खुद गायब मिलेगा| एक हद तक पात्र उसके नैतिक होंगे लेकिन वह अनैतिकता का कोई अवसर नहीं छोड़ेगा| प्रमोशन और प्रचार के लिए वह सब कुछ करता हुआ मिलेगा जिसकी अपेक्षा यह लोक कभी नहीं करेगा उससे|

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तन्त्र के अपने पक्ष और विपक्ष हैं| विपक्ष का समर्थन करने वाले कभी भी पक्ष के सही कार्य को मान्यता नहीं देंगे और न ही तो विपक्ष के सवालों को पक्ष कभी जायज मानेगा| दो में से एक सच बोल रहा होता है लेकिन सच पर पर्दा डालने का कार्य उन्हीं में से एक द्वारा पूरे दल बल से किया जाता है| यह सभी जानते हैं| हम भी और आप भी| साहित्य का संवाद पक्ष राजनीति का कब पक्ष और विपक्ष बन गया, हम आप आज भी उसके सूत्र को खोज रहे हैं| विचार और विचारधाराओं की लड़ाई एक अलग मुद्दा है यहाँ| ऐसा होना चाहिए| विचारधाराएँ सामाजिक चेतना में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं| उन पर लड़ना समय और समाज के लिए जागरूक होना है| समस्या तब आती है जब पूरे परिवेश में ऐसे मुद्दों पर मौन दिखाई देता है| आप चाहें भी तो कोई संवाद करने वाला नहीं है| ऐसा शायद इसलिए है कि साहित्यकार का लबादा ओढ़े लोग साहित्य के लिए नहीं नाम-इनाम और व्यापार के लिए आगे आए हुए लोग हैं|

ऐसे लोग कहीं भी हो सकते हैं| इनका प्रसार अधिक दूर तक नहीं होता| जैसे राजनीति में मुंह लगे हुए सड़कछाप कुछ गुंडे होते हैं, साहित्य में भी पुरस्कार छाप लेखक| एक समय के लिए ऐसा कहना आप अनुचित समझ सकते हैं, लेकिन माफ़ करना इससे अधिक उपयुक्त शब्द मेरे पास नहीं है| व्यवहार का आचरण वहीँ शोभा देता है जहाँ कुछ आचरणवान लोग रहते हों| जब भौकाली लोगों की भीड़ होगी तो भाषा भी अपना स्वरूप बदल रही होगी| यहाँ सच बोलने वाला घेरा जाता है| लांछित किया जाता है| परिवेश के लिए खतरा बताया जाता है| मजे की बात तो यह है कि बगुले हंस का चोला ओढ़ कर नृत्य करते हैं, मुर्गे शेर की खाल ओढ़कर बांग देते हैं| परिवेश फिलहाल सब जान रहा होता है लेकिन नक्कारों की भीड़ जुट कर कुछ अच्छा करने वालों का मजाक उड़ाती है|

आप सोच रहे होंगे कि ऐसा आज क्यों कहा जा रहा है? क्यों आक्रोश व्यक्त किया जा रहा है साहित्य और साहित्यकारों के प्रति? तो सोचने से पहले अपने परिवेश पर नज़र दौड़ाइए और देखिये कि कहीं नौटंकी के कुछ जोकड़ रामलीला के पात्र का अभिनय तो नहीं कर रहे हैं? देखिये कि परिवेश का विदूषक राजा का वस्त्र धारण कर किसी पर आदेश तो नहीं चला रहा है? देखेंगे तो सब दिखेगा| जब दिखेगा तो पायेंगे कि यही साहित्य का समकाल है| यहाँ जो जितना बड़ा भ्रष्ट और निकृष्ट आचरण साहित्य-समझ की कर सकता है, पूजा जाता है, बड़ा माना जाता है| नहीं मानता कोई तो मनवाया जाता है| व्यक्तिगत अनुनय-विनय से मान गए तो ठीक है नहीं तो लाव-लश्कर से कहलवाकर मनवाया जाता है| फिर भी नहीं माने तो लठैतों को लगाया जाता है| फिर भी यदि किसी रूप में आप आनाकानी किये तो आप के खिलाफ प्रोपोगेन्डा फैलाकर बदनाम किया जाता है|

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जालंधर के साहित्यिक गलियारे में इन दिनों कुछ ऐसा ही हो रहा है| साहित्य की जितनी भी रीतियाँ नीतियां थीं सब को ताक पर रख कर कार्य हो रहा है| नैतिकता को उसके हद तक जाकर कुंरेदा जा रहा है| इतने अदिन आ गए हैं यहाँ के कि एक पुस्तक के दसियों बार लोकार्पण करवाया जा रहा है


और हर वर्ष नयी पुस्तक बताकर उसका प्रकाशन करवाया जा रहा है| मजे की बात यह है कि पुस्तक फिर भी प्रकाशित नहीं होती है| पीडीऍफ़ बाँट दी जाती है| भाड़े के समीक्षक उस पर अपनी विद्वता दिखाकर फेसबुक पर भी टांग देते हैं| कोई ईमानदार जब इस पर प्रश्न उठाता है तो दूसरी तरफ शांति दूत भिजवाकर यह कहलवाया जाता है कि “वे जो कर रहे हैं करने दो, आप से क्या लेना है?” अरे भाई ऐसी मूर्खतापूर्ण बातें करने से पहले कम से कम साहित्य-परम्परा का अध्ययन ही कर लिए होते एक बार?

हमारे यहाँ फगवाड़ा के कुछ ऐसे तथाकथित साहित्यकार हैं जिन्हें पुस्तकों, साहित्यिक गतिविधियों आदि पर की जाने वाली धांधलियों पर टिप्पणी करना अच्छा नहीं लगता| इनका मानना है कि साहित्यकार जो भी करे उस पर किसी को कुछ भी बोलने का अधिकार नहीं है| अरे भाई उन पर बोल ही कौन रहा है आखिर? बोला तो जा रहा है उनके द्वारा फैलाई जा रही कुप्रवृत्तियों पर| उन मूर्खताओं पर जिनसे पंजाब के हिंदी साहित्य पर कुप्रभाव पड़ रहा है| यह मानने की बजाय मूर्ख भजन-कीर्तन की मंडलियों को बुलाकर पक्ष में पोस्ट डलवाया जाता है|

बड़े और बुजुर्ग कवियों में शुमार मोहन सपरा पर बड़े और बुजुर्ग आलोचक तरसेम गुजराल एक पुस्तक


लिखते हैं “मोहन सपरा का काव्य-पथ|” इसका लोकार्पण 2 नवम्बर 2017 को सैकड़ों लोगों की रहनुमाई में किया जाता है| पुस्तक क्या पता कुछ लोगों के घर हो भी| इसकी फोटुएं हमारे पास हैं| अखबार की खबर है जो स्वयं मोहन सपरा जी जारी किये हैं| आलोचक महोदय जून 2018 की एक पोस्ट में इस पुस्तक के प्रकाशित होने की खबर अपने वाल पर लगाते हैं| इसका भी स्क्रीन शॉट हमारे पास सुरक्षित है| मोहन सपरा अपनी पुस्तक “रंगों में रंग प्रेम रंग” के कवर पेज पर 2020 में उसे प्रकाशित हुआ दिखाते हैं| यह उनके सद्यः प्रकाशित पुस्तक में देखा जा सकता है| मई 2021 में

आस्था प्रकाशन, जो स्वयं मोहन सपरा जी संचालित कर रहे हैं,  द्वारा घोषणा की जाती है कि यह पुस्तक शीघ्र प्रकाशित होने वाली है| आलोचक तरसेम जी द्वारा भी इसे अच्छे से साझा किया जाता है| कवि मोहन सपरा 55 वर्ष की मित्रता का हवाला देते हुए इसे अपने जीवन की उपलब्धि ही नहीं अपितु आलोचक की सदाशयता भी बताते हैं अपने फेसबुक वाल पर|

मैं इस बात का संज्ञान लेता हूँ और उसे फेसबुक पर लगाता हूँ| यह मांग करते हुए कि ऐसी परम्परा का संचालन करना सर्वथा साहित्य के लिए उचित नहीं है| मोहन सपरा के बहुत ही नजदीकी जवाहर धीर जी का फ़ोन आता है और वह यह कहते हुए मुझे पोस्ट हटाने की अपील करते हैं कि “ऐसा पंजाब का माहौल कभी नहीं था|” यह वही जवाहर धीर हैं जो अभी भी नहीं मानने के लिए तैयार हैं कि 2017 में पुस्तक लोकार्पित हुई थी जबकि साक्ष्य के रूप में फोटो उनको पहले ही भेज दिया जाता है| वे नहीं मानते और फेसबुक पर विदूषकों की तरह आचरण करते हुए दिखाई देते हैं, पोस्ट एडिट करते हैं|  

जालंधर के ही बड़े और बुजुर्ग उपन्यासकार अजय शर्मा जी एक शिरोमणि साहित्यकार द्वारा दूसरे शिरोमणि साहित्यकार पर लिखी पुस्तक को उपहार रूप मानते हुए पंजाब की हिंदी आलोचना में अभिवृद्धि बताते हैं| पुस्तक सम्बन्धित सम्पूर्ण घटनाक्रम इन्हें अच्छी तरह से पता होता है| हंसी तब आती है जब जालंधर के वरिष्ठ साहित्यकार सुरेश सेठ पर लगातार फब्तियां कसने वाले और तरसेम गुजराल की अनुवाद प्रक्रिया से जुड़े मुद्दे पर सम्पादकीय लिखने वाले सम्पादक अजय शर्मा कवि बलवेन्द्र सिंह अत्री को मित्रता का लिहाज देते हुए मोहन सपरा का सपोर्ट करने की अपील करते हैं| इनका एक पोस्ट की टिप्पणी में कुछ ऐसा लिखना कि क्या साहित्य में हर जगह अच्छा ही हो रहा है, और फिर मोहन सपरा जी की इस मूर्ख कृत्य का समर्थन करना साहित्यिक अधोपतन की हकीकत को बया करती है|

कुछ ऐसे लोग, जिनका न साहित्य से कुछ लेना देना होता है और न ही तो साहित्यिक परंपरा से, कवि मोहन सपरा के पक्ष में अपील करते हुए उनके द्वारा किये गए निहायत ही गलत कार्य के लिए प्रशंसा पढ़ते हैं, फेसबुक पर पोस्ट लगाते हैं| नौटंकी के जोकड़ों की तरह समर्थन करते हैं जो निहायत ही


बचकाना प्रदर्शन है| जिसे यह मामूली घटना और भूल चूक लग रही है उन्हें नहीं पता कि ऐसा जानबूझ कर किया गया है| बड़े कार्यक्रम में लोकार्पित पुस्तक के विषय में किस रचनाकर को नहीं याद होगा भला? यह प्रश्न मुझसे नहीं उनसे पूछिए जिन्होंने यह हरकत की है| मेरे द्वारा जब संज्ञान में लाया गया तो कवि और आलोचक को यह गलती स्वीकार करने की बजाय समर्थकों द्वारा लड़वाने का प्रयास किया गया; कम से कम यह तो साहित्यिक नैतिकता नहीं है न? अगर नहीं है तो गलत को गलत कहने में कैसी शर्म? कैसी विवशता? मित्रता को निभाने के लिए जरूरी तो नहीं कि सामने वाले को मूर्ख बनाया जाए| और उसे जो पूरे साक्ष्य के साथ तैयारी में बैठा हो जवाब देने के लिए?

मुंशी प्रेमचंद ने पञ्च परमेश्वर कहानी में कहा है “क्या बिगाड़ की डर से ईमान की बात न करोगे बेटा?” तो बिगाड़ के डर में जब जुम्मन शेख और अलगू चौधरी एक दूसरे का बचाव नहीं करते तो क्या आप सबने यह भी नहीं सीखा? या फिर प्रेमचंद को कभी पढ़ा नहीं है? ध्यान दीजिये आपकी बचकानी हरकतें आपको सवालों की खराद पर जकड रही हैं| आप इतिहास के पन्न्नों पर दर्ज हो रहे हैं| आपकी कायरता, आपकी दलाल मानसिकता लगातार शक के दायरे में है| समय जब प्रश्न पूछेगा तो बगल भी झाँकने लायक नहीं रहोगे| किस मुंह से बोलोगे यह सोचते हुए भी शरीर काँप जाएगा| यदि थोड़ी भी लज्जा बची होगी तो आज के बाद कहीं भी अपराध और भ्रष्टाचार का विरोध तुम सब नहीं करोगे| ऐसा करोगे तो तुम्हारी हरकतें तुमको कोसेंगी| मेरा क्या...मैं यहाँ की दकियानूसी मानसिकता पर नहीं भी कुछ लिखूंगा/बोलूँगा फिर भी सिर उन्नत रहेगा, नत न होगा| न तो मेरे हौशले आप गिरा सकते हो और न ही तो मुझे मेरे कर्तव्य-पथ से डिगा सकते हो लेकिन ध्यान रहे एक झूठ छिपाने के लिए सौ झूठ बोलना पड़ता है| साहित्य सच का यथार्थ है झूठ का मुलम्मा नहीं| यह जितनी जल्दी समझ लोगे हितकर रहेगा सभी के लिए| परिवेश और समाज के लिए भी यह शुभ-शुभ होगा|


(जालन्धर के वरिष्ठ कवि मोहन सपरा जी मेरे दुश्मन नहीं हैं लेकिन साहित्यिक नैतिकता को उन्होंने अहमन्यता में आकर ताक पर रखा इसलिए ये विचार रखना पड़ रहा है| हमें सम्बन्ध भी प्रिय है लेकिन उसके लिए गलत परम्परा स्वीकार नहीं है, न ही होगा कभी|)

Thursday, 3 June 2021

यह साहित्यिक हादसों का शहर है जालंधर

 मैं कुछ भी कहूँ तो आप कहेंगे कि कहता है लेकिन कहना पड़ता है| हर क्षेत्र में जो कुछ होता है सबको पता चल जाता है| साहित्य के क्षेत्र में जो कुछ हो रहा है बहुत कम लोगों को पता चल पाता है| ऐसा लोग कर क्यों रहे हैं यह एक सवाल हो सकता है लेकिन ऐसा ही लोग कर रहे हैं, यह एक प्रवृत्ति बन चुकी है|


जालंधर की साहित्यिक प्रवृत्ति के विषय में बहुत अच्छा महसूस नहीं हुआ मुझे| आज भी नहीं होता है| नहीं हो रहा है| यह शहर महज कुछ लोगों की वजह से अपनी विश्वसनीयता खोता जा रहा है| कुछ लोग ऐसे हैं जो सही सही साहित्य शिरोमणि का पुरस्कार पा चुके हैं| अब यह पुरस्कार क्यों मिले हैं यह तो मुझे नहीं पता लेकिन जो लक्षण इन दिनों दिखाई दिए उससे ये प्रश्न जरूर उठते हैं कि ऐसे लोगों को ही क्यों मिला?
पिछले कुछ महीनों से यहाँ शीतयुद्ध की स्थिति बनी हुई है| कोई किसी तरह से शिकायत कर रहा है तो कोई किसी बात को लेकर रोना रो रहा है| ठीक है कि मैं सबको सुधार नहीं सकता लेकिन कुछ जो गलत हो रहा है उस पर बोल तो सकता ही हूँ| जालंधर के कुल पन्द्रह किलोमीटर के इर्द-गिर्द रहने वाले लोग सौ खण्डों में बंटे हैं तो अपनी दकियानूसी स्वभाव को लेकर| अपने आप को इतना मजबूत बना लिया है इन्होने कि कोई इन पर बोलता भी नहीं| चाहे जो कर लें या जो भी करें|
यहाँ की स्थिति तो यह है कि 2018 में एक पुस्तक प्रकाशित होती है| पुस्तक का लेखक स्वयं इस बात की घोषणा करता है अपने फेसबुक पेज पर| उसका लोकार्पण भी होता है| जश्न भी मनता है| यह शहर के सभी साहित्यकारों को पता होता है| 2018 के बाद 2021 में उस पुस्तक का आवरण पेज लेखक और जिस पर पुस्तक लिखी जाती है वह और उसका प्रकाशक फिर उसी की फोटो शेयर करते हैं और यह दिखाते हैं कि जल्द ही यह आलोचना पुस्तक प्रकाशित होने वाली

है| जिसके ऊपर किताब लिखी जाती है वह भी उसी निर्लज्जता से उसका स्वागत करता है| और तो और एक और शिरोमणि साहित्यकार हैं जो शिरोमणि साहित्यकार द्वारा शिरोमणि साहित्यकार पर पुस्तक लिखने को पंजाब की आलोचना के लिए शुभ बताया है, वह इसे उतनी ही गंभीरता से शेयर करते हैं| इन सभी का स्क्रीन शॉट यहाँ शेयर किया गया है| आप स्वयं देख सकते हैं|

यह देखने में एक सामान्य घटना है लेकिन सही अर्थों में साहित्यिक अपराध की श्रेणी में हैं ये आदतें| ये गलत परंपरा की शुरुआत है जो आने वाले दिनों में उदहारण के रूप में अपनाया जा सकता है| आपको विश्वास नहीं होगा इसलिए वह स्क्रीन शॉट मैं यहाँ संलग्न कर रहा हूँ| कहने को आप कह सकते हैं कि यह उसका दूसरा और तीसरा संस्करण है लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं है| कहीं भी इसका उल्लेख नहीं है| यह क्या हो रहा है? कुछ नहीं, बस पाठकों के साथ मजाक चल रहा है| यह सब पाठकों को महज छल रहे हैं| यह छलने की प्रवृत्ति समाप्त होनी चाहिए|
सवाल क्या यह नहीं है कि ऐसा क्यों किया जा रहा है? फेसबुक पर कमेन्ट और लाइक मात्र पाकर क्या और कौन-सी सम्पत्ति जुटा लेंगे भला? कोई युवा रचनाकार करता तो मान भी लिया जाता कि क्या पता उसे कुछ पता न हो साहित्यिक नैतिकता के बारे में लेकिन यही कार्य 80 वर्ष के बुजुर्ग रचनाकारों द्वारा किया जा रहा है| यह कैसा संस्कार दिया जा रहा है आखिर? कैसी परंपरा विकसित की जा रही है? क्या शिरोमणि पुरस्कार इसीलिए मिलते हैं? सोचिए और सोचते रहिये| यह साहित्यिक हादसों का शहर है जालंधर| यहाँ कभी भी आइये तो षड्यंत्रकारी रचनाकारों से बचकर रहिये|