Thursday, 17 December 2015

समसामयिक कथा साहित्य के बहाने समाज का सर्वेक्षण

  
            

      हिंदी कथा साहित्य के विकासात्मक पथ पर सामाजिकता की पहचान कराती समय सन्दर्भ की कहानियों द्वारा साहित्य को बहुत हद तक समृद्ध किया जा चुका है | दादा दादी के किस्सा-पहेली से चलकर वर्तमान समय के यथार्थ तक निःसंदेह कहानियों को कई रूप प्रदान किया गया और अनवरत आज भी इसे नित नवीन रूप में ढालकर विभिन्न स्वरूपों में फिट किया जा रहा है | ध्यान देने की बात तो ये है कि यदि कहानी के प्रारंभिक स्वरुप पर चर्चा किया जाय तो ये इसलिए सुनाई जाती थी कि व्यक्ति बहुत कुछ सीख सके | समझ सके, जान सके स्वयं को, स्वयं के साथ साथ अपने समाज और परिवेश को, पर आज ये स्थितियां पूर्णतः ताक पर रख दी गयी हैं | जो स्वाभाविकता, व्यावहारिकता और कथात्मक गतिशीलता हिन्दी-साहित्य के उन्नीसवीं और बीसवीं सदी की कहानियों में पायी जाती थी, वह इन दिनों की कहानियों में जैसे मृत-प्राय सी हो उठी है | जो वाक्य-विन्यास, कथानक, देशकाल वातावरण तब के कहानियों में प्रमुखता से अपनी उपस्थिति रखने में सफल हो पाते थे आज वे प्रायः रचनात्मक प्रक्रिया से ही बाहर हो उठे हैं | परिणामतः नवीन और पुरातन के मध्य का अंतराल अपना साकार रूप ले उठा है | वर्तमान समय-समाज को केंद्र में रखकर लिखी जाने वाली कहानियों में नवीनता के नाम पर कई ऐसे विषयों का चयन किया जा रहा है, पाठक प्रायः इस स्थिति को समझने में ही सम्पूर्ण कहानियों का पाठ कर ले जाता है कि अब उसे कुछ मिलेगा कि तब उसे कुछ मिलेगा | यह बात बड़ी स्पष्टता के साथ स्वीकार किया जा सकता है कि आज के रचनाकार कहानी के माध्यम से पूरे तिलिस्म को मोड़ने के लिए उतावले हो उठे हैं | उनका यह उतावलापन निःसंकोच उनके साथ साथ एक पूरी पीढ़ी को पाशुविकता की तरफ ले जा रही है |
     वर्तमान समय सन्दर्भ में लिखी जाने और छापी जाने वाली कुछ पत्रिकाओं को मैं विल्कुल भी शुद्ध और साहित्यिक पत्रिका मानने के पक्ष में नहीं हूँ | यदि इनका स्तर यही है तो जिन्हें हम घासलेटी साहित्य कहते हैं या फिर जिन्हें पोर्न साईट का दर्जा दिया जाता है, उन्हें हम क्या कहेंगें? विद्वत मण्डली में उन्हें अब तक चर्चा परिचर्चा और अलोचना के केंद्र से दूर क्यों रखा जा रहा है? जबकि सच्चे अर्थों में जाना जाय तो असली प्रगतिशीलता उन्हीं कहानियों में दिखाई देती है | ढोंग-ढकोसले को बेपर्दा करने में इन कहानियों का कोई जवाब नहीं | पितृ सत्ता को चुनौती और परम्पराओं का उन्मूलन जिन अर्थों में हम उन साइटों पर अथवा पत्रिकाओं में छपने वाली कहानियों में पाते हैं अन्य किसी दूसरे स्थानों पर ऐसी कहानियों का मिलना असंभव है | स्वतंत्रता, स्वच्छंदता, समानता और समरसता के भाव, वसुधैव कुटुम्बकम और सत्यम, शिवम, सुन्दरम की भावना इन कहानियों में सुन्दर तरीके से प्राप्त किये जा सकते है (जिस तरीके की स्थिति की मांग आज के इस उत्तराधुनिक समय में तमाम विमर्शों के माध्यम से की जा रही है) | अंतर बस यही होगा कि उनमे वे मूल्य नहीं होंगे, वे विमर्श नहीं होंगे, वे संवेदनाएं नहीं होंगे, जिन्हें भारतीय परिवेश के आवरण में अब तक किसी न किसी रूप में जीवित रखा जाता रहा या जीवंत और साकार रूप देने के लिए संघर्ष किया जाता रहा | उनका रूप बहुत कुछ हद तक वैसा ही होगा जैसा आज के समाज में घटित हो रहा है |
     आज के सामाजिक वातावरण में स्वतंत्रता की मांग को जिस हद तक व्यापकता देने का प्रयास किया गया है उससे अराजकता का ही फैलाव हुआ है | समकालीन मानवीय स्थितियों को मूल्यांकित करने पर यही निष्कर्ष निकलता है कि यह स्वतंत्रता स्वतंत्रता न होकर स्वच्छंदता में तब्दील हो चुकी है | कभी विद्वानों द्वारा कल्पित यह धारणा “स्वतंत्रता वही है जो सदैव बंधनों से आच्छादित हो” अपने मूल आधार को ही तिलांजलि दे चुकी है | बंधन के मायने बदल चुके हैं | सामाजिक संबंधों में जिन बन्धनों को कभी अनिवार्य समझा जाता था आज वे गुलामी के प्रतीक माने जाते हैं | छोटे-बड़े का भाव, स्त्री-पुरुष का भाव, पिता-पुत्र का भाव, पति-पत्नी का भाव, भाई-भावज का भाव किस तरह से आज कुभाव बनकर असामाजिक वातावरण के संचरण में सहभागी बन रहे हैं यह कहने की आवश्यकता नहीं है, देखने की है | साहित्य समाज का दर्पण कभी हुआ करता था आज समाज साहित्य का दर्पण है | समाज के बदलते प्रतिमानों से साहित्य काफी कुछ परिवर्तित हुआ है | कथा-संसार का वर्तमान परिदृश्य उसी परिवर्तित स्वरुप का तकाजा है |
       कितनी गजब की स्थिति है कि आज के वर्तमान साहित्यिक विमर्शों में सुन्दर और सार्थक रिवाजों को रूढ़िवादिता की संज्ञा देकर ख़ारिज किया जा रहा है और जो नवाचार की श्रेणी में परिभाषित होकर हमारे मन-मस्तिष्क में नकारात्मकता का बीज बो रहे हैं, उनका स्वागत किया जा रहा है | दलित विमर्श, स्त्री विमर्श, आदिवासी विमर्श, सिने विमर्श, युवा विमर्श, बुजुर्ग विमर्श ये जितने विमर्श हैं, साहित्यिक विमर्शकारों की नजर में कुछ भी हों मुझे तो ये सामाजिकता की नींव को कमजोर करने के ही विमर्श प्रतीत होते हैं | यदि समाज का अर्थ विभिन्न प्रकार के समुदायों, समूहों, वर्गों आदि के संगठित्त एवं एकत्रित रूप से है तो  वर्तमान समय में यह स्थिति कितने हद तक उस रूप में समाहित है, विचार करने का समय है | वास्तविक विमर्श का मुद्दा तो यही है कि क्या हम आज उसी समाज में वर्तमान हैं जिसका निर्माण पशुविकता से बहुत दूर होते हुए हम सबने मानवीय समाज के रूप में किया था | यहाँ यह भी विभिन्न पत्रिकाओं एवं विमर्शों के आईने में छपने वाली हिन्दी कथा साहित्य के माध्यम से ही समझने का विषय है कि हम जितने पढ़े-लिखे-समझदार, मन और मस्तिष्क से विकसित होते गए हैं, अपने अधिकारों के प्रति उतने ही जागरूक और समर्पित होते गए हैं | लेकिन जितना समर्पण हमारा अपने अधिकारों के प्रति बढ़ा क्या अपने कर्तव्यों के प्रति भी हम उतने ही जागरूक और समर्पित दिखाई दिए हैं |              
                                                   






Thursday, 17 September 2015

अभी और चलना है मुझे ...

अभी और चलना है मुझे 
रुकना नही है 
तब तक 
जब तक कि 
क्षितिज स्वयं आकर पास मेरे 
कह न दे यह कि
तुम आगे न बढ़ो ,कि
तुम रुक जाओ , कि
रास्ता दूसरा भी है
वहीँ से गुजर जाओ
हिस्सा मेरा
रहने दो मेरे पास, कि
स्तित्व मेरा भी है तुम्हारे इस जहां में
रहते हुए साथ तुम्हारे
सीखना है मुझे भी
चलने की यह सम्पूर्ण प्रक्रिया
गुजरने की, रहने की और एक हद तक
सहने की वह सम्पूर्ण स्थिति
सहते सहते जिसे तुम
आज यहाँ तक पहुंचे हो
पास मेरे , रुक जाओ
पर मुझे
रुकना नही है
पूछना है बढ़ते हुए और भी आगे, कि
तुम क्यों नही बढे अभी तक
थे जहां, रहे खड़े वहीँ
इन्तजार करता रहा मै तुम्हारा
कि अब आओगे और
करवाओगे परिचय हमारा
अपनी स्थिति और परिस्थिति से
बताओगे मुझे भी वह सब
अनजान रहा मै जिससे , व्यवस्थित से
समझाओगे मुझे भी अपनी तरह
देखते हुए भी पास में रहकर
सबसे ऊंचा दिखना
मै बढूंगा
तब तक
जब तक कि
समान तुम्हारे मै भी न हो जाऊं
जहां तक खड़े हो तुम
और दिख रहे हो आश्चर्य सा
मेरे हिस्से का अंश लेकर
वहाँ तक पहुँच कर
न कर लूं प्राप्त मै
अपनी स्थिति
अपना अंश और
और यथार्थ अपना ठीक तुम्हारी तरह
अडिग रहने की
बगैर किसी सोच और पश्चाताप के |

सत्ता की आड़ में



यह कहना
कि विकास किया है हमने
निश्चिन्त रहें सब
चिंता करना है कर्त्तव्य हमारा
सुख-दुःख ,
स्थिति परिस्थिति में
देंगें साथ उनका
यह विश्वास दिया है हमने
यह कहना
कि अपना कर दर्द दूसरों का
झेलकर पीड़ा
किया है उद्धार दूसरों का
नियति है हमारी
वेदनाओं से होकर गुजरना
वे रहें सुखी इसलिए
सुख अपना उधर दिया है हमने
यह कहना
कि सोचते हैं लोग
गलत हूँ मै
सोचते रहना काम है उनका
चिंता नही मुझे
सोचने से लोगों को फुर्सत कहाँ
सोच, सोच ही बनी रहे उनकी
बढ़ा कर कदम अपनी गिरेबान तक उनके
जागरण के इस दौर में भी
जीवन-पथ को धार दिया है हमने
यह कहना
कि दयालुता भी चीज है कोई
बची और अभी इस धरती पर
निरंकुशता के हद तक जाकर
पशुविकता के मुहाने पर खड़ा होकर
सबकी नज़रों से लड़ते हुए
गिरते हुए सबकी नजरों में
लाँघ कर सीमा दानवता की
ह्रदय का विस्तार किया है हमने
सोचे लोगबाग
सार्थक हो सोचना उनका
निरर्थक न जाए
यह कहना
कि पाकर सत्ता आज
साथ मानव के मानवता से
अमानवीय व्यभिचार किया है हमने
ह्रदय काँप उठे उसका भी
दिया जिसने साहस सोचने का
आज ऐसा ,
आज ऐसा अत्याचार किया है हमने
अनिल पाण्डेय

Monday, 7 September 2015

चार कविताएँ

1.  भूकंप के बाद
क्या कहूं 
डर सा लग रहा है 
कुछ भी कहने से मन घबड़ा रहा है 
डर इसलिए भी कि भूकंप के कहर का मंजर 
रह रह कर मेरे स्मृति पटल पर छा रहा है और 
कोई आ रहा है जैसे भीतर से मेरे यह कहते हुए कि 
समय अब रहने का धीरे धीरे जा रहा है 
पर कैसे कहूं किसी से 
क्या कहूं किसी से कि मुझे 
मजा ही मजा आ रहा है 
कि रोज रोज घुट घुटकर मरने से अच्छा है 
एक ही पल में मरना, एक ही झटके से 
विलीन हो जाना ममता मयी मिट्टी से चिमटकर 
इश्वर के अखंड स्वरुप में लींन हो जाना 
ऐसे जीते रहकर मिलता ही क्या आखिर 
दो वक्त की रोटी या 
दो टूका कपड़ा तन ढकने का 
कैद खाना कर्ज के न चुकता कर पाने पर या 
अस्पताल के दरवाजे की फर्श पर रहने के लिए
दर्द से चीखते चिल्लाते लावारिस जानो के साथ 
मजबूर होकर स्वयं के चीखने की 
सजा, अनवरत बिना खाए पिए भूखे रह जाने का 
मरता तो आखिर रोज ही 
रह रह कर , थोड़ी थोड़ी देर बाद तक
अपने ही लोगों को जलते देख हैवानियत की आग में 
पिसते देख मासूमों को 
षड्यंत्रकारी लोगों के चक्रव्यूह में, मासूमियत की आड़ में 
झाड़ में झंखाड़ में दम तोड़ते सपनो को 
आँखों के सामने से गुजरते देख 
इस देश और इस जमीन के अपनों को 
कैसे कहूं किसी से कि 
है अच्छा अभी किसी मलबे के नीचे दबकर मर जाना 
कम से कम लोग यह तो नही कहेंगे 
इस तरह जीने से अच्छा तो 
मर जाता तूं चुल्लू भर पानी में कहीं डूबकर






2.  माँ, मुझे याद है
माँ 
मुझे याद है 
तेरा यह कहना
कि समय बपौती नही 
किसी के बाप की 
कि रखे वह सम्हालकर 
और दे उसे 
जो चाहने वाला हो उसका
माँ 
मुझे याद है 
तेरा यह कहना 
कि निराशा परिणति नहीं है 
आशा की 
बैठना छोड़ कर सबकुछ 
कि आगे और नहीं अब रास्ता 
अंत जीवन का यहीं 
अंत आशा की नही
माँ 
मुझे याद है 
कि उन कहे गए बातों से 
आगे बढ़कर 
और आगे बढ़ते रहना 
ढलते रहना चाँद की तरह और 
सूरज सा उगते रहना 
बढ़ते रहना अनवरत 
एक नये राह की चाह में 
अंत राह की नहीं 
अंत चाह की नहीं
माँ 
मुझे याद है 
आज इस अनंत राह पर चलते हुए 
अनंत चाह की टोह में 
अनंत पथ पर बढ़ते हुए
अनंत इक्षाओं
अनंत ख्वाबों और 
अनंत स्वप्नों को 
पूरा करने की प्रतिबद्धता लिए 
अनंत आँखों को खटकते 
अनंत हृदयों में सुलगते हुए
माँ 
मुझे याद है 
कहा था तुमने 
जब तप रहा था मैं 
अपने संघर्ष के दिनों में 
जब पकड़ कर आँचल तेरा रोया था मैं 
और कहा था तुझसे 
मानूंगा न हार कभी मैं 
मुसीबत के दिनों में, पर 
क्या तुझे याद है 
उस समय कही थी जो बात तूं ?




3.   विदाई
वे कहते हैं 
विदाई के समय अपने 
कुछ भी न कहना मुझे, अन्यथा 
उपस्थित समुदाय न जाने क्या समझेगा 
बस बहा देना आंसू थोड़ा सा और हम
समझ लेंगे दर्द तुम्हारा
और यह भी कि
मेरे प्रति तुम्हारा प्रेम कितना है
पर मैं कैसे कहूं और कैसे मांन लूं उनकी यह बात 
और अब कैसे दिखाऊँ उन्हें कि
उनके प्रति कितना प्रेम है मेरे ह्रदय में 
उनके इस चाहत का इन्तेजार करते करते ही तो 
सूख गये आंसू मेरे 
और जो बचा भी था वह समर्पित हो चुका माता और पिता को 
समर्पण मेरा उनके प्रति भी तो था 
पर समझे नही वे मेरे इस भाव को 
अभाव उनका आज खलता रहा मुझे और
रोती रही मैं उनकी ही याद में 
अब जब नही रह गए आंसू भी
तो वे बात रोने की करते हैं 
न कहूँगी मैं किसी के सामने और 
किसी से कुछ भी न बोलूंगी 
अब तो पास मेरे बस वेदना ही यथार्थ है 
कोई क्या समझेगा इसे 
पर उसे तो समझना ही चाहिए 
जिसका इन्तेजार अब तक मैं करती रही 
और जा रही हूँ आज मैं उसके मिलन की एक बड़ी प्यास लिए
जिसके लिए आज तक मरती रही 
क्या समझेगा भी वह हमारे इस नेह को 
क्योंकि सत्य मौन है, यथार्थ मौन है और मौन है दर्द मेरा
स्थित हमारी है नहीं परिस्थिति का पड़ा है घेरा




4.  कह नहीं सकता

कह नहीं सकता 
जो मुझे मिला है 
सबको मिलेगा 
जो फूल खिला है फुलवारी में 
मेरे लिए 
सबके लिए वैसा खिलेगा 
कह नहीं सकता 
कहूं भी यदि 
हठ धर्मिता होगी मेरी यह 
जिसके योग्य नहीं मैं
क्यों मिले मुझे वह 
और यदि मिले भी 
किस पुरुषार्थ पर ? 
अकर्मण्यता पर 
अयोग्यता पर 
भाग्य पर या 
दुर्भाग्य पर 
कह नहीं सकता









कुछ समझ न आया...........


मन-मंदिर में
बसे सुमन
अब कांटे बनकर उभर रहे 
खा खाकर ठोकर
जीवन की
अनसुलझे से हम सुधर रहे
बचपन था
कुछ समझ न थी
समझ बढ़ी
हम जवान हुए
दुनिया का दायरा बढ़ा जरा
जब मुझसे
अपने मेरे अनजान हुए
सब कहते रहे
तुम बिगड़ रहे
हम समझते रहे न है ऐसा
वे संसाधन हैं कहाँ मुझमें
सब लोग समझते हैं जैसा
ये प्रश्न भी आज अकेली है
ये बात भी अब तक पहेली है
नहीं पता चला मुझे
हम बिगड़ रहे या सुधर रहे
तिल तिलकर जीना
जीवन को
जीने का हमने अर्थ लिया
सुख साधन सब
संशय में रहे
यह जीवन मुझको
व्यर्थ मिला
थोडा भी मिला
हम ख़ुशी रहे
कुछ ना भी मिला
हम सुखी रहे
सबका कहना है
हम बने ठने
हम ठनने बनने में
उजड़ रहे
कुछ बात भी थी
अब क्या बोलूं
कुछ राज भी थे
अब क्या खोलूँ
कुछ दुःख भी था
किसको कह दूं
कुछ सुख भी है
किसको दे दूं
यह लेन देन का सफ़र जटिल
खुद से सुन
खुद ही ले लूं
शायद जाऊं सुधर अभी
लोग कहते रहें
हम बिगड़ रहे |