Friday, 1 February 2019

व्यंग्य-विधा की सम्पूर्णता को व्याख्यायित करती पुस्तक “चयन और चिंतन : व्यंग्य के संग”



          वैसे तो बहुत-से संपादकों द्वारा किताबें बहुत-सी सम्पादित की जा रही हैं, जरूरी भी है, इसी बहाने बहुत से विमर्श निकल कर सामने आ रहे हैं, लेकिन एक सच यह भी है कि बहुत ही कम पुस्तकें ऐसी हैं जिन्हें समय के समकाल में रखकर चिन्तन-विमर्श के दायरे में बात करते हुए देखा-परखा जा सके| "चयन और चिंतन व्यंग्य के संग" राहुल देव द्वारा सम्पादित नव्य प्रकाशित पुस्तक है| आलोच्य पुस्तक कुल दो भागों--"तीन चयनित व्यंग्य" और "समग्र चिंतन" में विभाजित होकर एक पूरे कालखंड को व्याख्यायित करने की क्षमता से परिपूर्ण है| परिपूर्ण इसलिए क्योंकि संपादक स्वयं एक कवि और आलोचक की ज़िम्मेदार भूमिका में वर्तमान है| समय और समाज को परखने का उसका अपना नजरिया है| यह भी सही है कि वर्तमान समय में व्यंग्य जैसी सशक्त विधा पर बात करने के लिए युवा-दृष्टि और प्रतिभा में बहुत कम आगे आए हैं|
पहले तो चयन-दृष्टि की तहकीकात करते हुए पुस्तक में शामिल रचनाकारों की समकालीनता आकर्षित करती है, जिसमें-सूर्यकांत नागर, सूर्यबाला, ज्ञान चतुर्वेदी, सुरेश कान्त, हरीश नवल, अंजनी चौहान, जवाहर चौधरी, आलोक पुराणिक, सुशील सिद्धार्थ और अतुल चतुर्वेदी जैसे अपने समय के कुल 10 प्रमुख हस्ताक्षर की तीन-तीन व्यंग्य रचनाओं को शामिल किया गया है, बाद उसके रचनाओं से जुड़ने की कोशिश में सामयिक मुद्दों को साहित्य-सन्दर्भ से जोड़ने की प्रतिबद्धता प्रभावित करती है, जिसमें उपर्युक्त सभी रचनाकारों के सामाजिक दायित्व को परखते हुए कैलाश मंडलेकर, गिरीश पंकज, विवेक मिश्र, शशिकांत सिंह, डॉ० मधुसूदन पाटिल, मलय जैन, निर्मल गुप्त, डॉ० नितिन सेठी, राहुल देव, और भुवनेश्वर उपाध्याय सरीखे कुल 10 रचनाकारों की आलोचना-दृष्टि व्यंग्यबोध की अनिवार्यता पर विमर्शात्मक वातावरण का परिवेश निर्माण करते हैं| संपादक अपनी लम्बी भूमिका में ‘व्यंग्य के संग’ चलने के लिए जैसे विवश करता है| चयनित तीस व्यंग्य रचनाओं में पाठक अपने समय और समाज को पूर्ण रूप से समाहित पाता है| इसलिए व्यंग्य विधा की समझ और सार्थकता पर एक पूरा साहित्यिक सर्वेक्षण प्राप्त करके उसकी प्रासंगकिता और अनिवार्यता पर बात करने के लिए सहृदयी पाठक का विवश हो जाना आश्चर्य की बात भी नहीं है|
आश्चर्य तो तब होता है जब इस विधा की सशक्त भूमिका से अनभिज्ञता जाहिर करते हुए लोग इसे मात्र हँसी-मजाक की श्रेणी में फिट कर देने की जिद पाल बैठते हैं| जनसामान्य ऐसा सोचे यह तो कुछ समझ आती है लेकिन इधर अकादमिक क्षेत्रों में शोध और साहित्य-समझ की दृष्टि रखने वाले भी व्यंग्य के प्रति यही भाव रखते हैं, चिंतित होना स्वाभाविक है| संपादक राहुल देव का यह कहना "व्यंग्य को सही ढंग से एवं समुचित परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करने का गंभीर प्रयास वस्तुतः अभी तक हुआ ही नहीं है| अभी भी गंभीर सहित्यिक विमर्शों से व्यंग्य को बहिष्कृत ही रखने का जतन किया जाता है| विश्वविद्यालयीय समालोचना एवं पाठ्यक्रम में उसका स्थान नगण्य ही है| वह आलोचना-विमर्श में गौण ही रहे, इसके लिए प्रत्यक्ष एवं छद्म प्रयास अभी भी चलते रहते हैं, हालाँकि उस हिकारत की नजर से अब भी उसे हाशिये पर रखने की कोशिशों में कोई कमी नहीं आई है”, समकालीन व्यंग्य विधा की शक्ति और सामर्थ्य को हाशिए पर रख कर सस्ती लोकप्रियता प्राप्त करने की लालसा सँजोए आलोचकों की पक्षपातपूर्ण रवैये को दिखाना तो है ही, मानवीय जीवन-विसंगतियों में व्यंग्य विधा की अनिवार्यता पर विचार करना भी है|
इसमें कोई शक नहीं है कि वर्तमान को पैनी निगाहों से परखते हुए उस पर अभिव्यक्ति देना आवश्यक हो गया है| यह अभिव्यक्ति व्यंग्य विधा में अधिक धारदार होगी, इसमें कोई दो राय नहीं है, जिसे पुस्तक की भूमिका में ही सम्पादक स्पष्ट करता है--"निश्चित ही आज का समय व्यंग्य लेखन के लिए ज्यादा अनुकूल है| वैश्वीकरण और आवारा पूँजी के प्रभाव से जनविरोधी ताकतें अपनी पैठ बढ़ा रही हैं, मानवीय सभ्यता और साझा संस्कृति पर हमले तेज हो रहे हैं इसलिए भी व्यंग्यकार का दायित्व साहित्य की ओर से बढ़ जाता है कि वह इनसे उपजने वाली महीन-से-महीन विसंगति को पकड़ कर उस पर अपनी कलम चलाकर समाज को सही दिशा में ले जाने का महत कार्य कर सकें|"
सूर्यकांत नागर की ‘पुस्तक मेले में लेखक’, हरीश नवल की ‘पुस्तक (झ) मेला’ और अतुल चतुर्वेदी की ‘साहित्य में तिलक दर्शन’, ज्ञान चतुर्वेदी की “मूर्खता में ही होशियारी है” ने लेखक-प्रकाशक-पुस्तक-विक्रेता के अंतर्संबंधों के माध्यम से साहित्य की यथास्थिति पर गहन सर्वेक्षण प्रस्तुत किया है| भारतीय समाज में प्रतिष्ठित लेखकों की जो नयी सूची बनकर तैयार हुई है उनमें अध्ययन-प्रियता कम लेखन-अभिरुचि अधिक देखने को मिली है| यह अभिरुचि ऐक्षिक न होकर नक़ल और चोरी की अभिरुचि बनकर विकसित हुई है| साहित्य-संसार के लिए यह एक तरह से खतरनाक प्रवृत्ति तो है लेकिन “उनका मानना है कि दूसरों का लिखा पढ़ने से उनकी मौलिकता नष्ट होती है| गुट-गिरोह वाले साहित्य-जगत में वे अपनी मौलिक दृष्टि, मूल्य चेतना और स्वतंत्र विचारधारा के बलबूते पर ही तो जिन्दा हैं| आज तक कभी मुझ पर नक़ल का आरोप नहीं लगा तो महज यह मेरी ईमानदारी की वजह से|(सूर्यकांत नागर-पुस्तक मेले में लेखक, पृष्ठ-15-16)” इस प्रकार की ईमानदारी ने प्रकाशकों के लिए कमाई का माध्यम तो जरूर पैदा किया है लेकिन शुद्ध साहित्य की उपलब्धता पर एक बड़ा सवाल भी खड़ा कर रहा है| प्रकाशक के अनुसार “मेरे पास बड़े लेखक पांडुलिपियाँ छोड़ते हैं जो बड़े प्रकाशकों द्वारा अस्वीकृत हो चुकी होती हैं उनमें प्रायः कबाड़ा ही होता है, मैं छांट-छांटकर सम्पादित कर उनकी पुस्तकें छाप देता हूँ| ये बड़े लेखक बड़ी खरीद के उपक्रमों में मेंबर होते हैं, देशी-विदेशी गोष्ठियों में जाते रहते हैं तथा प्रायः हिंदी विभागों में प्रोफ़ेसर, रीडर आदि होते हैं, अतः पुस्तकों को खरीद कर देते हैं|(हरीश नवल, पुस्तक (झ) मेला), पृष्ठ-83)” पुस्तकों की खरीद-फरोख्त और छपाई को लेकर यह एक ऐसी सच्चाई है जिसे कोई भी पाठक-वर्ग या साहित्य प्रेमी झुठला नहीं सकता| एक सच्चाई यह भी है कि प्राध्यापक-वर्ग ने साहित्य की इस खरीद-फरोख्त में बड़ी जिम्मेदारी का निर्वहन किया है| लेखक-प्रकाशक-पुस्तक-विक्रेता के बीच से पाठक-वर्ग पूर्ण रूप से गायब है| पुस्तक मेले का बड़ा आयोजन पुस्तक-संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए नहीं अपितु इस गठजोड़ को साधने के लिए होता, यह हरीश नवल जैसे रचनाकार को अच्छी तरह से पता है| एक पाठक की यथास्थिति को स्पष्ट करते हुए हरीश नवल का यह कहना कि “देखिये, हम पाठक हैं, सब कुछ हमारे लिए ही है| सरकार इतना बड़ा तामझाम हमारे लिए ही करती है| हम उद्घाटन समारोह में जाने लगे-हमें रोक दिया गया क्योंकि इन्वीटेशन नहीं था| वहां सब सहाबी ठाट-बाट वाले ही थे| हम देख रहे थे कि वहां हमारे प्रिय लेखक थे, अप्रिय राजनेता थे, सरकारी अफसर थे, पर हम न थे, हम दूर से ही ताक रहे थे...हम तो अब लेखक बनेंगे या प्रकाशक, पाठक के रूप में जाना ठीक नहीं लगा| पुस्तक मेला जरूर लगे, हम जरूर जाएँ पर पाठक के रूप में नहीं—उसकी वहां कतई जरूरत नहीं| (हरीश नवल, पुस्तक (झ) मेला, पृष्ठ-85)”   
ईमानदार पाठक के अभाव और पुस्तक की धंधेबाजी प्रकाशकीय योजना के तहत गंभीर साहित्य का मुद्दा हाशिए पर है| यह अपनी तरह का एक सच है कि आलोचना विधा विमर्श और गंभीर पाठकीय समझ विकसित करने की बजाय महज अपना नंबर बनाने और साहित्य की दुनिया में चाटुकारी प्रवृत्ति को बढ़ावा देने का एक माध्यम भर रह गयी है| एक समय था जब साहित्य में किसी एक विधा के आगमन पर चर्चा-परिचर्चा का दौर गरम होता था, साहित्यकार और आलोचक के मध्य वैचारिक मतभेद के चलते मनभेद तक की स्थिति देखने को मिलती थी लेकिन “इन दिनों साहित्य में जोखिम उठाने का मौसम नहीं है| साहित्य वो जो सर्व सुख प्रदान करे| यश, धन और रचनात्मक सुख| किसी के फटे में टांग देने के दिन नहीं है ये| सबको साधने के लचीले दिन हैं ये| सबकी प्रशंसा में दो-चार स्फुट वाक्य लिख दो या कह दो|(अतुल चतुर्वेदी, साहित्य में तिलक दर्शन, पृष्ठ-153)” इसके पीछे एक सबसे बड़ी कमजोरी आलोचकों में अध्ययनशीलता का अभाव होना है| जो साहित्य समाज का दर्पण कहलाता था आज उसी साहित्य को समाज का अनुगामी कहा जाने लगा है| इसके पीछे सबसे बड़ा कारण यह है कि “इन दिनों लेखक ललकारते नहीं, समाज के आगे मशाल नहीं लेकर चलते| बल्कि वे तो अपना बायोडेटा और प्रकाशित साहित्य की परिचय सूची लेकर चलते हैं| आवश्यकतानुसार उसकी मुंह दिखाई करते रहते हैं| (अतुल चतुर्वेदी, साहित्य में तिलक दर्शन, पृष्ठ-154)
आलोक पुराणिक, सुशील सिद्धार्थ, सूर्यबाला भारतीय धर्म, संस्कृति, भाषा और सियासत के मुहाने से अपने समय का मुहावरा गढ़ते प्रतीत होते हैं| व्यापक अर्थों में भारतीय संस्कृति का यथार्थ उसके लोक जीवन से होकर सामने आता है| व्यंग्यकार  अपनी सम्पूर्ण बोधगम्यता के साथ लोक-जीवन की आवश्यकताओं और जरूरतों को महसूसता है| भाषा एक बड़ी जरूरत है जनसामान्य के लिए, रोजगार और उच्च स्तर प्राप्त के ठिकाने से| हिंदी को पालनहार तो बना दिया गया है लेकिन उससे जरूरतें पूरी नहीं हो पा रही हैं| देश का अधिकांश अभी तक भाषाई कटुता में ही उपेक्षितों का-सा जीवन जी रहा है| जो लोग हिंदी को संस्कृति का संवाहक मान कर बैठे हैं “शोध बताती है कि दरअसल वह ख़ास-ख़ास अवसरों पर पहनी जाने वाली पोशाक थी, लगाया जाने वाला मुखौटा थी| वह एक ढपली थी, जिस पर लोग अपने-अपने राग गाया करते थे| वह चस्मा थी, जिसे लगाकर अनुदानों, पुरस्कारों की छाया में सांस्कृतिक यात्राओं का सुख लूटा जा सकता था| (सूर्यबाला, अगली सदी का शोध पत्र, पृष्ठ-29)”
उसे पता है कि अपने मूल स्वरूप में यह वही लोक है जिसने धर्म-संस्कृति जैसे जीवन-प्राण-पद्धति को वैयक्तिक स्वार्थपूर्ति का साधन बनाते हुए अतार्किकता के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया| लोक तक की यात्रा में धर्म और संस्कृति की जो मूल प्रस्तावना थी, मानवीय प्रवृत्ति का विस्तार और आचरणगत जीवन धर्मिता का सृजन, वह दूर होकर स्वार्थसिद्धि का उपक्रम भर रह गया है| यह भी एक बड़ी सच्चाई है कि धर्म-संस्कृति का झंडा लेकर चलने वालों में बहुत से लोगों को यह आज तक नहीं पता चल सका है कि धर्म और संस्कृति का यथार्थ रूप क्या है और वह हमारे जीवन में प्रासंगिक क्यों हो? ऐसा प्रश्न आते ही या तो वे पथभ्रष्ट होने का आरोप मढ़ने लगते हैं या फिर दार्शनिकता के अंदाज में कुछ कहकर आशमान ताकने लगते हैं| “धरती के लोगों की यह आदत है कि जब सामने खड़े आदमी की सामना न करना हो तब वहां देखने लगो जहाँ सामना करने के लिए कोई है ही नहीं| हमारी संस्कृति में इस बात का खूब विकास हुआ है....| (सुशील सिद्धार्थ, निंदा बहता नीर है, निन्दयोग महान, पृष्ठ-141)” विकास की अवस्था में वह देखता है कि जरूरतों और आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर ही उपलब्ध प्रवृत्तियों को एक विशेष ढांचे में ढालने का उपक्रम किया गया| वर्षों पूर्व मानवीय जीवनधर्मिता के लिए जो पैमाने परंपरा बन चुके थे, अब आज उनके परिवर्तन का समय आ गया है| यह परिवर्तन धर्म और संस्कृति के क्षेत्र का परिवर्तन होना चाहिए| लाख कोशिश करते हुए भी अभी तक की प्रगति में “सलाम को कोहराम और नमस्कार को चीत्कार में बदल देना हमारी उपलब्धि है|” इस उपलब्धि में हम सबके द्वारा बनाए गए कायदे इस तरह दैनिक जीवन के लिए घातक दिखाई देने लगे हैं कि खुलेआम “यहाँ अनेक धर्मों को मानने वाले घूम टहल रहे हैं| अचानक सब चीखने लगे हैं| धर्म जीवन पर चढ़ बैठा है| “सबका मालिक एक’ नी एक-एक कर सब मनुष्यों को डंडा चाकू लेकर दौड़ा लिया है| (सुशील सिद्धार्थ, अहा पार्क जीवन भी क्या है, पृष्ठ-135)”
तर्क पर न कसे जा सकने वाले धर्म-संस्कृति-सियासत तक़रीर और तकरार के संसाधन तो हो सकते हैं मानवीय कल्याण के पोषक नहीं| सुशील सिद्धार्थ की दृष्टि में “मतलब निकालने वाला महान होता है| जो बता सके कि इसका यह मतलब नहीं, इसका यह मतलब है| इसी हुनर के दम पर धर्म संस्कृति और सियासत का धंधा खड़ा हुआ है| एक आया, ईश्वर का मतलब यह| दूसरा आया, नहीं यह| तीसरा चौथा...| आते गये| बताते गये| मुसीबत बढ़ाते गये| मूर्ख बनाते गये| अपना धंधा फैलाते गये| इनमें से किसी से पूछो कि तुमको कैसे पता कि यही है धर्म! वह कहेगा, मैं तो यही समझता हूँ और मेरी तक़रीर यही है| इसीलिए दुनिया के दो बड़े सत्य हैं तक़रीर और तकरार|” (सुशील सिद्धार्थ, व्याख्या ही सबसे बड़ा सच है, पृष्ठ-139)
वर्तमान धर्म-संस्कृति और राजनीति तक़रीर और तकरार पर खड़ी होकर मानवीय-विनाश का माध्यम बन रही हैं| सियासत की धर्मिता जन-कल्याण के पैरोकारी में रही है, इसी बात को ध्यान में रखकर ही सिद्धांतों का निर्माण किया गया था| अब आज के समय में सभी राजनीतिक सिद्धांतों को मतलब के अनुसार ढाल लिया गया है और सिद्धान्तनिर्माताओं को कठघरे में खड़ा कर दिया गया है “गांधी ने आंबेडकर ने मार्क्स  ने क्या कहा और व्याख्याकारों ने क्या को क्या से क्या बना डाला| गांधी सियासत में परिवारशाही के काम आये| अम्बेडकर सोने का कुंडल कंगन जडवाने में खर्च हुए| मार्क्स नकली बौद्धिकता की भट्ठी में झुक गये| (सुशील सिद्धार्थ, व्याख्या ही सबसे बड़ा सच है, पृष्ठ-139)” तन कर खड़ा है तो मात्र उपयोगितावादी मानसिक बुनावट जो मन माफिक चीजों को परिवर्तित कर देना चाहता है|
इसके पीछे जो सबसे बड़ी वजह है वह है अपने समय की संस्कृति-संपन्न पीढ़ियों का धन-सम्पदा की तरफ मुखर होना| हमारे समकालीन समय में धन-सम्पदा की जरूरत और  आकर्षण इतना अधिक बढ़ा है कि परिवार और व्यवहार का परिवर्तन भी इसी रास्ते से होकर सामने आता है| यह तो सच है कि जरूरतों का व्यापक साम्राज्य हमने ही खड़ा किया है लेकिन कृति और प्रकृति के बीच स्पेस को भौतिकता के रंग से भरा जाएगा, भारतीय लोक-जीवन में यह कभी नहीं सोचा गया था| आलोक पौराणिक जब यह कहते हैं कि “गलत कहा है, जिसने कहा है कि प्रकृति सबके साथ एक-सा सलूक करती है| सच यह है कि प्रकृति किसी पर सावन का नृत्य बनकर उतरती है और किसी पर अँधेरा बनकर| सावन को मनोहारी बताने वाला सारा प्राचीन साहित्य मुझे झूठा नजर आता है| जिन्होंने सावन को मनोहारी लिखा होगा, वे सबके सब लोग उनके पूर्वज होंगे, जो सावन पॅकेज के तहत पंचतारा होटल में नाच करने जाते हैं” तो वह प्रकृति के साथ भौतिक संबंधों की यथार्थ व्याख्या कर रहे होते हैं|
यह भी एक सच्चाई है कि प्राचीन साहित्य में जहाँ सावन के महीने में नगर-बधुएँ गीत और मल्हार गाती हैं वहीं वर्तमान आर्थिक विसंगतियों में पिस रहा जनमानस आर्थिक संतुलन बिठाने में निमग्न रहता है| एक अर्थ-चिंतित नायिका का “मन यह सोचकर काँप उठता है कि इस महीने से बच्चे स्कूल जाना शुरू कर देंगे| स्कूल जाने के लिए ज्यादा रकम माँगना शुरू कर देंगे| किताब-कॉपी-ड्रेस-फीस-बस-का किराया-पिकनिक-बिल्डिंग फण्ड इत्यादि की मांगों से लैस बच्चे जब जुलाई से स्कूल जाना शुरू करते हैं, तो सावन बहुत डरावना लगता है| इस खर्चे के बगैर मई-जून में काम चल रहा है|....मई जून की लू-लपट सावन से ज्यादा मनभावन लगने लगती है| लू-लपट झेलना आसान है, जुलाई के खर्च झेलना आसान नहीं|” यही नहीं कहाँ तो ऐसे महीनों में अपने पतियों से मिलनी की आश संजोए नायिकाएँ वियोग संतप्त रहा करती थीं कहाँ अब यह पूछा करती हैं कि “तुम कब परदेशी होगे बालम? सब तरफ यही सन्देश सुनायी दे रहा है| सिर्फ बालम होने से अब काम नहीं चल रहा है| परदेशी होना जरूरी हो गया है| क्या दिन रहे होंगे, जब सिर्फ बालम होने से काम चल जाता था| कैसे सुन्दर, प्रेमपूर्ण दिन रहे होंगे, जब कोई बालम बताता होगा कि कंपनी विदेश भेज रही है, क्या करूं| पत्नी वही कहती होगी-ना, परदेश न जा बालम| (आलोक पौराणिक, पृष्ठ-123)
सामयिक विसंगतियों पर व्यंग्यकारों का शालीनतापूर्ण प्रहार बहुत कुछ सोचने और विचारने के लिए विवश करता है| समकालीन सरकारी लाइलाज तरतीबों के मध्य दफ्तरों में दम तोड़ती आर्थिक स्थितियों पर ‘एक जिम्मेदार आदमी का अंतिम पत्र’ लिए जवाहर चौधरी ‘दाम सरकारी, गोदाम सरिकारी’ की यथार्थता को बयान करते हैं| सरकारी खरीद-फरोख्त में लोक का किसान और किसान का लोक जिस तरह से पिस रहा है, लुट रहा है, वहां आत्महत्या जैसी स्थिति की वर्तमानता सुनिश्चित नहीं होगी तो क्या होगा? यह एक बड़ा प्रश्न है| सुरेश्कांत ‘एक देश है मेरा’ में वैचारिक उठापटक के बीच राष्ट्रद्रोही और राष्ट्रभक्त का समकालीन पैमाना लेकर प्रस्तुत हैं तो यह आभास होता है जैसे हमारा समय हमसे ही व्याख्या की उम्मीद किये बैठा हो| सूर्यबाला ने ‘या इलाही ये माजरा क्या है’ के जरिये विमर्शवादी राजनीती पर तंज कशा है जिससे गुजरते हुए ऐसो-आराम की राजनीति में लोक-मानस के प्रश्नों का अनछुआ रह जाना सालता है| ज्ञान चतुर्वेदी “रामबाबू जी का बसंत” के माध्यम से शिक्षा जगत की खबर लेते दिखाई देते हैं तो भविष्य अपनी सभी विद्रूपताओं के साथ सामने खड़ा दिखाई देता है| अतुल चतुर्वेदी के “चौपाया विमर्श से उपजे सवाल” ने मनुष्य को वर्तमान की सबसे भयानक जानवर के रूप में चिह्नित किया है, तो यह हमारे समय की उपलब्धि नहीं, मनुष्य होने की स्थिति पर बड़ा प्रश्न है कि इतने समृद्ध होने के बावजूद भी आखिर हम ऐसा क्यों हैं?
इस पुस्तक की सम्पूर्णता में कुछ विषयों से सम्बंधित व्यंग्यकारों के चयन या उनकी रचनाओं की प्रस्तुति पर निगाहें कुछ ढूंढती से दिखाई दी हैं| बाल जीवन की वर्तमान स्थिति, पर्यावरण-पारिस्थितिकी, वृद्धाश्रम की बहुलता, जैसे विषय आज गहरे में मानवीय अस्मिता के लिए एक बड़े प्रश्न हैं| इन प्रश्नों का हल और उनसे जुडी समस्याएँ हमारे समय के व्यंग्यकारों के पास बड़े पैमाने पर मौजूद हैं...फिर भी व्यंग्य-विधा को प्रमुखता देते हुए यह अपनी तरह की पहली पुस्तक कही जा सकती है| दरहकीकत तो ये है कि आज व्यंग्य-विधा पर काम करने वालों को उँगलियों पर गिना जा सकता है, उनमें से राहुल देव की उपस्थिति ने रचनाधर्मिता के व्यापक कैनवास को आशान्वित किया है|   
  आलोच्य पुस्तक में चयनित व्यंग्य-रचनाओं के साथ रचनाकारों की चिंतन प्रक्रिया से दो-चार होने की नीयति में आलोचक खरे उतरे हैं, यह संपादक की चयन-दृष्टि की सफलता ही कही जायेगी| लेकिन जब हम रचनाओं के बरक्स आलोचकीय-दृष्टि पर ठहरते हैं तो एक विरोधाभास दिखाई देता है| विरोधाभास के गलियारे से यहाँ चयनित आलोचकों की अभिव्यक्ति-दृष्टि पर बात करना इसलिए भी आवश्यक हो जाता है क्योंकि उन्होंने सम्पूर्ण व्यक्तित्व और रचनाधर्मिता पर अपनी बात रखी है| अच्छा होता यदि चयनित व्यंग्य-रचनाओं के सापेक्ष होकर अपने समय की आलोचकीय पड़ताल करते हुए रचना-दृष्टि का आंकलन करते| जहाँ तक मुझे लगता है संपादक अपनी जिम्मेदारी से बचते हुए आलोचकों को यह अवसर दिया है कि वे अपने माध्यम से रचनाकारों की परख करके व्यंग्य-शक्ति का परिचय दें| यदि ऐसा है तो हमें यह कहने में भी कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि यह भी एक बड़ा प्रयास है  जहाँ रचनाकार-संपादक-आलोचक के त्रिकोण में पाठकीय अभिरुचि को विकसित करने का कार्य किया जा रहा है|

Sunday, 27 January 2019

सामाजिकता के तटबंध पर जन-जीवन का पाठ : सारस्वत वागीश की कविताएँ



कविता कवि-हृदय में संचित अनुभवों के प्रसार का नाम है| मनुष्य एक समाज विशेष में जन्म लेता है| परिवेश की संगति-विसंगति से उसका परिचय बाल्यावस्था में होना प्रारंभ हो जाता है| जब तक वह युवा होता है और कविता जैसी विधा में अभिव्यक्ति देने का रास्ता चुनता है, उसके अनुभव-संसार में ऐसा बहुत कुछ संचित हो जाता है जिसमें परिवेशगत जीवन-यापन करने वाले अन्य अनेक की संगति-विसंगति का अंश वर्तमान होता है| सच यह भी है कि कविता के मार्ग पर कवि वैयक्तिकता के रास्ते पदार्पण करता है| अनुभव की सघनता और अभिव्यक्ति की कुशलता में कवि के वही वैयक्तिक भाव कब समष्टि-भाव में परिवर्तित हो जाता है, कहना मुश्किल है| जिस समय कोई पाठक कविता को पढ़ रहा होता है उस समय कविता में वर्णित विषय को लेकर निःसंग भाव से अपनी जिज्ञासा को बढ़ा रहा होता है| यह जिज्ञासा उसे देशकाल-परिस्थिति से जोड़ती है और एक कविता को अधिक अर्थवान और सामर्थ्य-सम्पन्न बनाती है|  


सारस्वत वागीश की कविताएँ हमें जिज्ञासा के विभिन्न कोण तक ले जाने में सक्षम हैं| कितने ही वसंत देख चुके वागीश के पास जन-जीवन-जगत को समझने की अंतर्दृष्टि है जो कविता के माध्यम से लोक-जीवन में प्रवाहित होती है| जीवन, जगत की क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं के सम्मिश्रण से उत्पन्न सृष्टि का विशेष्य है| जन, जीवन और जगत के बीच सामंजस्य बिठाने का माध्यम| जीवन यदि जन को अनुभव देता है तो जगत उस अनुभव को प्राप्त करने का जरिया बनता है| संत भले ही इस प्रकार की स्थिति को जन-जगती का मेला कह दें लेकिन कवि हृदय अपनत्व की अनवरत प्रवाहित होने वाली सलिला ही कहेगा| जिस समय कवि यह कहता है कि “तुमने सच कहा था नानक!/ कोई किसी का नहीं होता/ सिर्फ अपन सुख ही सारे रिश्ते बनाता है/ सुख सूखते ही रिश्ता सूख जाता है” उस समय कवि स्व-सुख प्राप्ति के मार्ग का तलाश करते हुए जग-सुख की परिकल्पना खो जाना चाहता है|  


समाज विभिन्न प्रकार के संघर्षों का प्रतिफल है| यह कवि भी जानता है और उसका पाठक भी| संघर्ष व्यक्ति को तपाते जरूर हैं लेकिन सक्षम भी बनाते हैं उसकी अपनी जिम्मेदारियों के प्रति| कवि कहता है कि जिम्मेदारियों को वहन करने की प्रतिबद्धता में “मैं अकेला नहीं हूँ/ मुझ जैसे और भी बहुत-से साथी हैं मेरे साथ” जो संघर्ष की जमीन को उर्वर रखेंगे| जीवन समस्याओं का जखीरा होता है लेकिन समस्याओं से लड़ना मनुष्य की फितरत है| आततायी शक्तियों के साथ अकेले नहीं लड़ा जा सकता है, ये कवि को पता है अच्छी तरह से| आदमी स्वयं से कभी नहीं हारता क्योंकि संघर्ष का पाठ उसे बचपन से ही पढ़ाया गया होता है| हारता है दूसरों की दबंगई और उजड्डपना से| असामाजिक और लगभग स्वार्थता के वशीभूत हो चुके परिवेश में को उत्साह की अंतिम स्थिति तक पहुँच कर सामाजिकता का वातावरण तो निर्मित करता है “लेकिन बिखर जाता है आदमी/ जब उजाड़ दिया जाता है उसका आशियाना/ जो बनाया गया था पूरी उम्र खपाकर/ दंगाई कौवों के आचरण से भयभीत चिड़िया/ चहकना नहीं छोड़ती/ पर आदमी टूट जाता है टूटते ही हौसला|” टूटे हौसले में प्राण फूंकने का साहस कवि के पास है क्योंकि ‘पाश’ और ‘भगतसिंह’ जैसे क्रन्तिकारी कवि, प्रेरक व्यक्तित्व की प्रेरणा उसके पास है|


अति किसी भी चीज की बुरी होती है| सत्ता पक्ष कुर्सी की मदान्धता में व्यक्ति-व्यक्ति के बीच विभेदता की दीवार खड़ा करता है| उसकी दृष्टि में “भारतीय जनता ही तो है जो एक समय के बाद सब कुछ भूल जाती है|” उन्हें यह नहीं पता होता कि जनता सब जानती है| एक समय के बाद विद्रोह होता है| मोहभंग होता है| फिर न तो उनकी जातिवादी-रणनीति काम देती है और न ही तो साम्प्रदायिकता के नाम पर जन-समुदाय को बांटने वाली हिन्दू-मुसलमान की कुनीतियाँ| यहाँ परिवर्तन की एक लहर उठती है और लोगों को चेतना का पाठ पढ़ाते हुए नवीन समय का संचार करती है| यह समय सबके हिस्से से होकर पदार्पण करता है और अनीति के खिलाफ दूर तक का रास्ता तय करता है| कवि स्पष्टतः कहता है कि “अत्याचार के खिलाफ उठती है लहर/ जहर के खिलाफ मचलती है लहर/ कभी सागर तो कभी आदमी के पेट से/ निकलती है लहर.......लहर नहीं देखती हिन्दू मुसलमान/ लहर का मजहब नहीं होता/ लहर जब मचलती है तो तोड़ देती है सारे तटबंध|”


सामाजिक व्यक्ति, जिसमें मनुष्यता को जीवित रखने की अभिलाषा है, वह असमानता की चक्की में पिसने वाली भूखी पीढ़ी के दुःख-दर्द को मौन होकर नहीं सह सकता| कवि-दृष्टि में समाज में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति का पहला कर्तव्य है कि उसके साथ उसके अपने परिवेश में रहने वाला कोई भी व्यक्ति किसी प्रकार के अभाव से न ग्रसित हो| तमाम प्रकार की दुनियादारी और संग्रह करने की प्रवृत्ति का कोई महत्त्व नहीं है यदि एक भी व्यक्ति अभावों में दम तोड़ता है या भूखा मरता है| वह यह भी जानता है कि ऐसे कार्य होने कठिन हैं| इसलिए इस जीवन के बचे समय में तो सामाजिक समानता के लिए कार्य कर ही रहा है, इस जीवन के बाद भी स्वयं के शरीर को किसी के काम आने की कामना करता है-
“हाँ, अब मैं

किसी का पेट भरना चाहता हूँ
जीते जी तो किसी के
काम नहीं आया ये शरीर
पर मर कर
किसी के काम आना चाहता हूँ
किसी की भूख मिटाना चाहता हूँ|
         
ये कल्पना करना भी कवि का जायज लगता है कि जीते-जी उसके द्वारा किए गए सामाजिक प्रयासों को लोग संकीर्णता की अलग-अलग दायरों में सीमित करने की कोशिश करते हैं लेकिन मृत हो जाने के बाद सामाजिक जड़ताओं से मुक्त होकर स्वतंत्रता पूर्वक वह जन-जीवन की समृद्धि के लिए कार्य कर सकेगा| “कफ़न में दम है/ क्योंकि बेदम आदमी के काम आता है कफ़न/ क्योंकि कफ़न पहना आदमी/ आलोचना का शिकार होने से बच जाता है|” हालांकि इस प्रकार की परिकल्पनाएं कर्म के सिद्धांत से दूर रखते हुए व्यक्ति को निराशावादी माहौल में ले जाती हैं लेकिन सामाजिक जीवन के प्रति कवि की निष्पक्षता आकर्षित जरूर करती है|

किसी भी समाज को समृद्ध बनाने में वहां की शिक्षा-व्यवस्था का विशेष योगदान होता है| भारतीय शिक्षा प्रणाली में गुरु-शिष्य परंपरा का प्राधान्य रहा है| एक आदर्श स्थिति के तहत तो यह बहुत अच्छी परंपरा है लेकिन यथार्थ में इसका नाजायज फायदा उठाया गया है| ‘एकलव्य’ के रूप में कितने ही शिष्य समर्पण में अपने ‘शक्ति-साधन’ दान दे देते हैं लेकिन ‘द्रोणाचार्य’ जैसे गुरु उस दान-विशेष का फायदा अपने प्रिय शिष्य को ऊँचा उठाने में लगा देते हैं| यह बात और है कि ऊँचा उठने वाला शिष्य अयोग्यता का एक उदहारण बनकर रह जाता है| ये स्थिति भारतीय विश्वविद्यालयों में अधिक है| शोध और साहित्य की क्या स्थिति है ये अकादमिक जगत में आसानी से देखा जा सकता है| शिक्षा-जगत की यथास्थिति सारस्वत वागीश के अनुसार कहें तो ये सच प्रतीत होता है कि-“आज भी द्रोणाचार्य के साथी हैं छल और प्रपंच/ तो श्रद्धा और निष्ठां एकलव्यों की ढाल हैं/ अँगूठे कटे एकलव्य द्रोनाचार्यो के लिए चुनौती हैं/ और द्रोणाचार्य विकसित समाज के लिए पनौती हैं|” अब यह परिदृश्य कितनी सच्चाई लिए है कि एकलव्यों की पूरी फ़ौज शोषित और उपेक्षित हो रही है जबकि अयोग्यों की एक पूरी-की-पूरी महफ़िल सज रही है|

यहाँ एक तत्त्व है जो सभी प्रकार की संभावनाओं को पंख देता है और वह है प्रेम| श्रृष्टि की संरचना में प्रेम की भूमिका अभिन्न है| जीवन को जन्म देने से लेकर पालने-पोषने तक की स्थिति में प्रेम ही वह आधार है जिसके माध्यम से व्यक्ति एक-दूसरे के साथ संबंधों के दायरे में बंधता है| यही सम्बन्ध भविष्य की नींव रखता है जिस पर समाज रूपी विशाल महल का अस्तित्व निर्भर करता है| कवि लोक-प्रेम के माध्यम से प्रेम-लोक का सृजन करता है| यहाँ उसे घृणा, ईर्ष्या, प्रतिशोध जैसी अमानवीय प्रवृत्तियाँ न नजर आकर सर्वत्र प्रेम दिखाई देता है| ऐसा प्रेम जो उसके चेतन-जगत की साक्षी है| यथार्थ है, स्वप्न है| स्वप्न अधिकतर बिसार दिए जाते हैं| यथार्थ सुधार और परिष्कार के रूप में हमारे समक्ष सर्वत्र उपस्थित रहते हैं-
“लम्हा-लम्हा
पहर, दो पहर, सांझ सवेरे तू ही तू
तू साँसों की डोर
डगर, गलियाँ, चौराहे, तू ही तू
मोड़, मुहाने, सड़क, दहाने
मन्दिर हों या हों मयखाने
हर लम्हें तू ही तू|”

अस्तित्व की प्राप्य-श्रम में अहं-टकराव का होना स्वाभाविक है| आखिर समर्पण भी तो कोई चीज होती है| सम्बन्ध समर्पण मांगता है और व्यक्ति मुक्ति| समर्पण और मुक्ति के बीच के अंतर्द्वंद्व को समाप्त करने में प्रेम बड़ी भूमिका निभाता है| सारस्वत के यहाँ ये प्रेम समकालीन विमर्शों के दायरे में सीमित रहने वाला प्रेम नहीं है| भारतीय लोक-परंपरा में वर्तमान सांस्कृतिक प्रेम है| यहाँ वासना और नंगापन नहीं है| समर्पण और स्थायित्व है| ऐसा इसलिए है क्योंकि कवि स्त्री को देह मात्र स्वीकार नहीं करता| शक्ति और सामर्थ्य की प्रतिमूर्ति समझता है| यही वजह है कि स्त्री को विभिन्न पौराणिक स्वरूपों देखने की कोशिश करता है—मैं जानता हूँ शक्ति हो तुम/ तुम ही दुर्गा हो/ कात्यायनी भी तुम/ शक्ति के जितने स्वरूप हैं सब मौजूद हैं तुम्हारे भीतर|” कवि उन्मुक्त भाव से मनुष्य प्रेम-प्राप्ति के उन हर साधनों की तलाश करता है जिससे उसे अधिक मानवीय और सामाजिक होने में प्रेरणा मिल सकती है|

ग़ज़ल मिलन-बिछडन की ऊब से प्रेरित कुंठा भर नहीं है




समय की नब्ज़ और समाज की हकीकत को अभिव्यक्त करने में हिंदी ग़ज़ल ने इधर के दिनों अच्छा प्रयास किया है| यह विधा अपनी बनावट-बुनावट में साहित्यिक और सामाजिक है जहाँ शिल्प और सम्वेदना के स्तर पर अति के लिए कोई जगह नहीं है| इन दिनों इस विधा में अतिशय भाउकता की त्याग और यथार्थ अभिव्यक्ति की प्रतिबद्धता का नया मुहावरा विकसित हुआ है| कहना होगा कि यहाँ कोरी राजनीतिक नारे मात्र नहीं हैं, सहस्तित्व की भावना और सामाजिक संस्कार की उर्वर जमीन है| जन-जीवन की सम्वेदनाएँ यहाँ पुष्पित-पल्लवित हैं साथ-साथ लोक-व्यवहार अपनी सम्पूर्णता के साथ समादृत है| इस दृष्टि से जब हम मूल्यांकन करते हैं तो यह पाते हैं कि अनिरुद्ध सिन्हा की सद्यः प्रकाशित ग़ज़ल संग्रह ‘ताकि हम बचे रहें’ समकालीन रचनाधर्मिता में ग़ज़ल की सम्पूर्णता को प्रस्तुत करने में पूर्ण सहायक है|

आलोच्य संग्रह के हवाले से कहें तो अनिरुद्ध सिन्हा की गज़लें हमें व्यावहारिकता के ऐसे ही धरातल पर ले जाती हैं जहाँ से जीवन शुरू होता है, जिसे जीते हुए हम अपने दैनिक जीवन में परिदृश्य की उन सच्चाइयों से टकराते महसूसते आगे बढ़ते हैं, जो अनुभवों से प्राप्त होती हैं| साहित्य यदि अनुभव के रास्ते अनुभूति की ईमानदार अभिव्यक्ति है तो अनिरुद्ध सिन्हा की काव्य-दृष्टि उस अभिव्यक्ति की कसौटी है जहाँ से मान और ईमान के बीच संघर्ष शुरू होता है| इस संघर्ष में सबसे अधिक हानि पारस्परिक विश्वास को हुई है| प्रेम का स्थान घृणा, हर्ष का विषाद, स्नेह का ईर्ष्या ने ले लिया है| प्रेम-प्रस्ताव को मनुष्यता के दायरे से ही जैसे निकाल दिया गया है| यहाँ आवश्यकता किसी की तनहाई नहीं है बाज़ार के अनुसार स्वयं को ढाल लेने की नीयति है| इस नीयति में व्यक्ति की जरूरतें मानवीय व्यवहार नहीं बाज़ार के समीकरण निर्धारित कर रहे हैं| प्रेम के बदले हुए स्वरूप में संकेतों की गिरती साख पर हालांकि कवि चेताता है “इंकार को समझो कभी इकरार को समझो/ जैसे भी हो ऐ दोस्त मेरे प्यार को समझो” लेकिन जैसे ही उसे यह आभास होता है कि हम अब लोक-ग्राम में न होकर बाज़ार में हैं यह सलाह देना उचित समझता है कि-

मना कि बहुत ख़ास है तन्हाई तुम्हारी
बाज़ार में आए हो तो बाज़ार को समझो||

अपने वर्तमान की शांति के लिए भविष्य की संभावनाओं को जिस तरह से हमने बाज़ार के हाथों सौंपा है सच कहें तो मानवीय स्वप्न-भूमि को उर्वर बनाने की बजाय बंजर बना देने की ख्वाहिश को खाद-बिसार दिया है| यह उसी का परिणाम है कि पारिवारिक दायित्वबोध का क्षरण तो हुआ ही, इधर के दिनों में सम्बन्धों के बीच कलरव करती पारस्परिक बंधुत्व भी अतीत होने के करीब है| यहाँ एकाकी का खतरा मडराने लगा है| कवि का यह कहना कि “सभी रिश्ते हैं मतलब के सभी मतलब के हैं साथी/ मज़ा आता नहीं है अब किसी के साथ जीने में” बढ़ रही एकाकी प्रवृत्ति का बड़ा उदहारण है| यहाँ अनिरुद्ध जब बाज़ार के प्रभाव में परिवेश का अवलोकन करते हैं तो पाते हैं कि “सिलसिले बढ़ने लगे ये इस नए माहौल में/ घर के अंदर रोज़ कितने घर नए बनने लगे|”  घर के अन्दर घर तैयार होने की यथास्थिति में यहाँ बाज़ार के प्रभावी होने के साथ-साथ सामाजिक परिवर्तन का माहौल भी एक बड़ा कारक है| इसमें युवा अपने से बड़ी पीढ़ी को सुनने के लिए तैयार नहीं है| स्वच्छंदता की आंच में इस कदर झुलसे हुए लोग हैं कि बड़ों की सीखें उन्हें किसी बड़ी रुकावट से कमतर नहीं दिखाई देती| जबकि लोक-समृद्धि बाज़ार की चकाचौंध में न सम्भव होकर बड़ों-बुजुर्गों द्वारा अर्जित उन अनुभवों में है जिसे वे समय और समाज में संघर्ष करते हुए कमाए हैं-कवि की मानें तो यह स्वीकार करने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए-

“ये जो कदमों के हैं निशां यारों
मंज़िलों का यही पता देंगे
हम तो जुगनू हैं जल बुझेंगे मगर
आने वालों को रास्ता देंगे||”

समय की आपाधापी में ‘जल-बुझ’ कर भी भविष्य की पीढ़ी को रास्ता दिखाने का कार्य हमारा लोक करता आया है| ऐसा लोक जो बाज़ार के सौन्दर्यीकरण से कोशों दूर है| अनिरुद्ध सिन्हा यहाँ बाज़ार की अपेक्षा लोक को और युवा-स्वच्छंदता की अपेक्षा समर्पण को अधिक तरजीह देते हैं| ऐसा इसलिए भी क्योंकि उनकी दृष्टि में बढ़ना महज कद और समय का बढ़ना नहीं होता| आदतों और आदतन अपनाई गयी प्रवृत्तियों का घटना-बढना भी उसी के दायरे में आता है| युवाओं की स्वच्छंद प्रवृत्ति से नवीन रीतियों का निर्माण करता परिवेश अँधेरे की चकमक से आच्छादित तो हुआ है लेकिन ऐसा होना अनुभवशील जन के पीछे हटने का संकेत भी है और यही हमारे समय की बड़ी कमजोरी है-

नई तहजीब अपना कद बढ़ाती जा रही है
पुराना जो है धीरे-धीरे हटता जा रहा है||

पुराने के हटने से युवाओं में भटकाव अधिक दिखाई दे रहा है| लोक व्यवहार में शामिल होने के बाद अनुशासन एक विशेष प्रकार की सामाजिक जरूरत बनकर हमारे सामने प्रस्तुत होती है| कवि इस जरूरत की पूर्ति के लिए लोक के अंतस्तल में प्रवेश करता है| इस लोक में बुजुर्ग हैं, परंपरा है और है अनुशासन का महत्त्व, जहाँ चलते हुए वह कभी इसलिए विपरीत मौसमों में भी सदाबहार बना रहा क्योंकि उसके साथ बुजुर्गों की दुवा थी-

घर से निकले तो बुजुर्गों की दुआ साथ रही
इसलिए राह में मौसम से सताया न गया|”

यह दुआ संग-साथ रहती है तो समय अनुशासित रहता है| जैसे ही इसकी अनुपस्थिति हुई करवट बदलते हुए वही समय परिवेश के लिए विषधर बनकर समाज को डंसने लगता है| अब, जब स्वच्छंदता की दहलीज को भी पार करने लगा है हमारा परिवेश तो गज़लकार का यह कहना जायज हो उठता है कि “इस दौर में जीना कोई आसान नहीं है/ है कौन वो जो आज परेशान नहीं है|”  परेशानी का सबब इधर के ग़ज़लकारों को खूब हुआ है| ये वाक्य युग-विसंगतियों को परखते हुए निकले हैं| संघर्ष की अदम्य जिजीविषा लिए ये भावनाएं दयनीयता का दिग्दर्शन कराने के लिए पर्याप्त हैं|

यहाँ यह कहने में कोई संकोच नहीं होता कि अनिरुद्ध सिन्हा का कवि-हृदय संघर्ष-भूमि से गहरे में जुड़ा है इसलिए उसका संघर्ष हमारे अपने लोक का संघर्ष है| एक बड़ा सच यह भी है कि जीवन में बहुत सी घटनाएँ ऐसी होती हैं जिन्हें विस्मृत नहीं किया जा सकता| बहुत सी घटनाएँ ऐसी होती हैं जिनके वर्तमान होने की परिकल्पना से ही हम सिहर उठते हैं| कुछ घटनाएँ ऐसी होती हैं जिन्हें हर हाल में घटित होना ही है| यही घटनाएँ युग-समय की लकीर खींचती हैं और इन्हीं घटनाओं के इर्द-गिर्द हमारा अस्तित्वबोध हमें जागरूक रहने के लिए प्रेरित करता है| हालांकि कवि यह पूछना चाहता है कि “सुलगा हुआ है दिल में वही एक ही सवाल/ रौशन हो आदमी का मुकद्दर कहाँ गया/ मुश्किल के इस सफ़र में मुझे भी तलाश है/ जो सर उठा यकीन से वो सर कहाँ गया|” इन प्रश्नों से यह तो प्रमाणित होता ही है कि जागरूक होने वाले व्यक्तित्व या तो गायब कर दिए जाते हैं या फिर परेशानियों के मंजर में घुटते हुए युग-विसंगतियों को सहते-सहते ऐसे विलीन हो जाते हैं कि उनका पता नहीं चल पाता| 

 आलोच्य संग्रह में बदलते समय और समाज की यथार्थ परिदृश्य का जो खाका खींचा गया उसकी प्रमाणिकता को इनकार नहीं किया जा सकता| देखिये तो मेहरबानों की है भीड़/ सोचिए तो एक भी अपना नहींइस अस्मितावादी वादी युग में अपनों की तलाश और उसकी पहचान जरूरी हो गयी है| अपना वह जिससे देश-समाज की बातें हो सकती हैं| जीवन-समय के महत्त्वपूर्ण निर्णय लिए जा सकते हैं| खासकर ऐसे समय जब सभी बुद्धिमान होने का दंभ और विद्वान होने की ग़लतफ़हमी में जिए जा रहे हैं| जिनको लगता है समय ऐसा नहीं उन्हें पता होना चाहिए कि हर किसी सवाल का उसमें ही जवाब है/ मैं जुबां से क्या कहूँ सामने किताब है|” एक ऐसी किताब जो अपने समय के सच को परत-दर-परत अभियक्त करने का जोखिम इसलिए उठाती है ताकि हम बचे रहें|”

लोक जीवन की अपनी विसंगतियां हैं| अपनी समस्याएँ हैं| जीवन जीने की लालसा में सदियाँ गुजार दी मनुष्य ने लेकिन रहने के लिए घर और पहनने के लिए कपड़े आज भी नहीं नशीब हो सके हैं| पेड़ों के नीचे और जंगलों के घने परिवेश में रहने के लिए आज भी अभिशप्त है जीवन| आज भी भूख से तर-वितर बचपन सडकों, प्लेटफार्मों, गाड़ियों आदि के सामने रेंगते-रेघते देखे जा सकते हैं| ऐसे भी लोग हैं जिन्हें बेबस जीवन की दंश नहीं दिखाई दे रहे हैं| रोटी की तलाश में भटकते लोग और अविश्वास के अंतर्विरोध में सिसकते सम्बन्ध नहीं नजर आ रहे हैं| उन्हें सच दिखाने के लिए जरूरी है कि दरों-दीवार के परदे उठा दो/ कहीं कुछ नहीं बदला दिखा दो|”

कुछ नहीं बदला यानि जिन परेशानियों और परिस्थितियों से जूझते हुए हम विकास के पैमाने निर्धारित करते रहे उन्हीं परेशानियों और परिस्थितियों में आज भी जूझ रहे हैं| इधर की राजनीतिक गुटबंदियों ने लोक को गर्त में ले जाने का पूरा प्रयास किया है| विचलित जन समुदाय आरोप-प्रत्यारोप के खेल में खो-सा गया है| सियासत हर जगह ठीक नहीं होती| बने बनाए सम्बन्धात्मक समीकरण को यह आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति में मुखौटा बनाकर नष्टप्राय कर डालती है| इसीलिए अनुरुद्ध सिन्हा कहते हैं कि “शब्द की मुट्ठियों में सियासत न कर/ ये अदब के घरौंदे बिखर जाएँगे” लेकिन लोगबाग हैं कि सियासत की जमीन में सम्बन्धों की फसल उगाने की बजाय नफरत और हिंसा के बगीचे लगा रहे हैं| आज के इस भौकाली समय में यह कम मामूली बात नहीं है कि “हमें खुद में सिमटने का सलीका जो सिखा दे/ किताबों से वही क़िस्सा निकाला जा रहा है|” जहाँ अतीत के किस्से और स्मृति में रची-बसी कहानियां नहीं हैं वहां मनुष्यता नहीं दानवता जरूर पुष्पित और पल्लवित होती है|

इस अर्थ में सांप्रदायिक समीकरण देश का वही है| हिन्दू-मुस्लिम-सिक्ख-ईसाई की जटिल गुत्थियों से आजाद नहीं हो सके हैं हम| समस्याओं को जितना सुलझाने की कोशिश की जाती है वह उतनी ही उलझती जाती है| अनिरुद्ध सिन्हा का प्रयास है कि इन बनी-बनाई धारणाओं से हमारा लोक ऊपर उठे| कुछ ऐसा प्रयास लोगों द्वारा जिससे यह उलझाव दूर हो और मनुष्य अपनी जीवन-यात्रा में मनुष्यता की सम्भावनाओं को प्राप्त कर सके| वे कहते हैं

हिन्दू कि मुसलमाँ कि ईसाई हो या कि सिख
मिल-जुल के रामराज के दीपक जलाइये
कोई भी रोग रह न सके लाइलाज अब
हर मर्ज़ के इलाज के दीपक जलाइये|”

दीपक जलाए जाने के ऐसे समय में जब जीवन को उजाड़कर जन को बचाने की जुगत की जा रही है, कवि और कविता की प्रासंगिकता बढ़ गयी है| रचनाकारों की भी ऐसी नियति हो गयी है कि जीवन-जरूरतों में उलझा असहाय मनुष्य नहीं पक्ष और विपक्ष दिखाई दे रहा है| अनिरुद्ध सिन्हा का ये कहना हमें संतोष देता है कि कोई किसी की तरफ़ है कोई किसी की तरफ/ वो एक हम हैं जो रहते हैं ज़िन्दगी की तरफ़|” इसमें कोई संदेह नहीं है कि रचनाकारों का जिंदगी की तरफ रहना भविष्य की संभावनाशील उर्वर-भूमि को बचाना है|

इस संग्रह की अधिकांश गज़लों में समकालीन विसंगतियों की गहरी सिनाख्त न करते हुए कवि ने प्रेम-स्थिति की स्पष्टता को जन सामान्य के सामने प्रस्तुत करना चाहा है| इस प्रस्तुतिकिरण में अनिरुद्ध सिन्हा उतने हद सफल नहीं हो पाते हैं जितना अपनी यथार्थ-अभिव्यक्ति में हुए हैं| प्रेम सदैव से एक ऐसा विषय रहा है जिसे लगभग रचनाकारों ने छूना चाहा है| हालांकि अनिरुद्ध सिन्हा का प्रेम वायावी प्रेम नहीं है, सहज और मानवीय संभवनाओं से परिपूर्ण प्रेम है, फिर भी आक्रोश-अभिव्यक्ति के लिए यह जरूरी था कि लोक को अनुभव देने के समय में प्रेम के पाठ पढ़ाने के प्रयत्न कुछ और समय बाद करते|

हालाँकि यह अपनी तरह की सच्चाई है कि यहाँ मांसलता नहीं है| मिलन-बिछडन की ऊब से प्रेरित कुंठा नहीं है| सहज और स्वाभाविक प्रेमाभियक्ति की तरलता में जिज्ञासु हृदय की वेदना जरूर है जो अंततः हमें मानवीय बने रहने के लिए मार्ग-निर्देशन करते प्रतीत होती है| सच यह भी है कि अनिरुद्ध सिन्हा जैसे रचनाकार ने ही ग़ज़ल विधा को नारे की शोर-गुल वाली परंपरा से उठाकर लोक-अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया है लेकिन इतनी सावधानी जरूर बरकरार रखने के लिए संघर्षशील बने रहना होगा कि ग़ज़ल कहीं अपनी आदिम संस्कृति की तरह न उन्मुख हो उठे|  


Friday, 11 January 2019

जनजीवन से दूर होती नवगीत विधा (पूर्णिमा वर्मन और नचिकेता के नवगीत-दृष्टि की परख)

गीत विधा की जिन भाउक, आत्ममुग्ध, श्रृंगारिक एवं निरा वैयक्तिक प्रवृत्तियों के प्रतिरोध में नवगीत विधा का सृजन संभव होता है, यथार्थ की जिस मांग के साथ उसकी अभिव्यक्ति को धारदार बनाने की पुरजोर कोशिशें इसके अवतरण काल में की गयी होती हैं, आज के बहुत से रचनाकार वाह-वाह के इर्द-गिर्द रहते हुए उसे खारिज कर रहे हैं| जिन प्रवृत्तियों के आसरे वह नयी कविता से होड़ लेती दिखाई दे रही थी, आज के अधिकतर नवगीतकार उन सारी संकल्पनाओं को हाशिए पर लाकर रख दिए हैं| इनको पढ़ते हुए ऐसा लगता है जैसे गीत नवगीत हैं और नवगीत न गीत है न नवगीत है|

इसके पीछे एक सबसे बड़ा कारण जो है वह है महानगरीय कुलीन परिवेश में रहते हुए जर्जर गाँव की कल्पना में खोए रहना| जो कल्पना में होता है साकार होने के लिए प्रयत्नरत होता है| साकार वही होता है जिसमें श्रमधर्मिता की ललक होती है| यह ललक खेत-खलिहानों, मेड़ो, ग्रामीण रीति-रिवाजों आज में रचे-बसे होने के कारण जन्म लेती है| अब जिन्हें गुलमोहर और अमलताश के सौंदर्य लुभा रहे हैं उन्हें गरीब और मजदूर आदमी के श्रमस्वेद से उपजी वेदनाएं क्यों पसंद आएँगे?

नवगीतकारों का सबसे बड़ा स्वप्न है पक्के फर्शों पर विचरण करते हुए पगडण्डी की मनमोहकता को प्राप्त करना| एसी रूमों में सोते हुए बगीचे की हवा का उपभोग करना| उन्हें शायद यह नहीं पता है कि गाँव अपनी तमाम विसंगतियों के साथ शहर नहीं हो सकता| शहर अपनी तमाम संगतियों के साथ गाँव नहीं हो सकता| गाँव की जमीन और जन के यथार्थ को प्रस्तुत करने के लिए जरूरी है कि वहां के लोक-मन की वेदना और जीवन-विसंगतियों को रचनाकार झेल रहा हो या झेला हो|

नवगीत विधा के क्षेत्र में यह कितनी विडंबना की बात है कि सामंतवादी मानसिकता के पोषक लोग ही इसके अगुवा हैं| आखिर इससे बड़ी विसंगति इधर और क्या होगी कि जिनके पैर कभी जमीन पर नहीं पड़े वे काँटों की चुभन पर नवगीत लिख रहे हैं और जिनके पैर हर समय काँटों में हैं वे मौन होकर बैठे हैं| यथार्थ की ऐसी अभिव्यक्ति शायद ही किसी अन्य विधाओं में देखने को मिले|

जिन्हें यह लगता है कि नवगीत समकालीन हिंदी कविता के परिप्रेक्ष्य में सशक्त और मजबूत स्थिति में है, उन्हें यथार्थ स्थिति का विधवत मूल्यांकन करना चाहिए| यहाँ सृजन से अधिक हो-हल्ला है| भीड़ है भेड़चाल है भेड़िया धसान है| नवगीत के कई बड़े हस्ताक्षरों को पढ़ने के बाद इस निष्कर्ष पर पहुँचने में विवश हुआ हूँ कि समकालीन हिंदी कविता (गद्य कविता) से कम अधिक दयनीय दशा नवगीत विधा की नहीं है| गुटबाजी, जुगाड़बाजी, जालसाजी, मौकापरस्ती और सामंतवादी मानसिकता यहाँ खूब फल-फूल रही है| जन की विधा से जन गायब है| छंदों के गुणा-भाग विद्वता का मूर्ख प्रदर्शन है| नाम है बड़ा छोटा दर्शन है| आश्चर्य नहीं कि लोक के प्रति गीत की यथार्थता इन कुछ नवगीतकारों से कहीं अधिक स्पष्ट और सामयिक है| 

पूर्णिमा बर्मन

ऐसे बहुत से रचनाकार हैं जो नवगीत के जितने बड़े हितैषी हैं उतने ही अधिक गर्त में उसे ले जा रहे हैं| यह मंचों से सुनना सुखद लगता है कि वैश्विक विमर्श के पटल पर नवगीत का मुकाबला कोई नहीं कर सकता लेकिन जब यथार्थ परिदृश्य का अवलोकन करते हैं तो निराशा हाथ लगती है| रचनाकार जन-सम्वेदना और अस्मितावादी विमर्श की अभिव्यक्ति करने की बजाय अपने ही सुख-सुविधा का चित्रण करने में मशगूल है| पूर्णिमा वर्मन ऐसी ही रचनाकार हैं| कहने को तो ये समकालीन हिंदी नवगीत की सशक्त हस्ताक्षर हैं लेकिन नवगीत की जन-जमीन से कोई ताल्लुकात इनका नहीं है| दरबारी संस्कृति की मादक अभिव्यक्ति और अभिजात्यवादी सुख-सुविधा में पगी मानसिकता का पूरा नजारा इनके यहाँ देखा जा सकता है| पूर्णिमा का एक नवगीत है ‘सुहाने दिन’, ये दिन तब के परिवेश में सुहाने हैं जब साधारण जन के समय भय, अशांति और आतंक के साये में गुजर रहे हैं| शहर विसंगतियों की भेंट चढ़कर कब्रगाह बन रहे हैं| अनुराग, प्रेम और सद्भाव की जगह घृणा, मनमुटाव और वैचारिक टकराहट ले रहे हैं| कवयित्री का ये कहना कि-

फिर सुहाने हो गये हैं दिन/ शरद की ओट लेकर/ क्यारियों में रंग डूबी चुन्नियाँ हैं/ झिलमिलाती ओस की/ कुछ पन्नियाँ हैं/ फिर शहर के हो गये हैं दिन/ हवा के कोट लेकर/
धूप में फिर/ गीत कोई गुनगुनाना है/ और नभ के हाथ/ सूरज झुनझुना है/ फिर गली में खो गये हैं दिन/ हरे अखरोट लेकर
अब न मौसम/ खिडकियों पर चीखता है/ हर तरफ अनुराग/ मद्धिम भीगता है/ फिर सुहाने हो गये हैं दिन/ ख़ुशी के ओट लेकर (सुहाने दिन)
         
ध्यान रहे शरद ऋतु के आगमन से प्रकृति जहाँ सौन्दर्य से परिपूर्ण हो रही होती है वहीं आम आदमी अपने जीने का संसाधन इकट्ठे करने के जुगाड़ में लग जाता है| विश्व का अधिकांश आज भी बगैर कपडे के गुजर-बसर कर रहा है| जनसंख्या का अधिक भाग आज भी निर्वस्त्र रहने के लिए बाध्य है| यह प्रश्न विचारणीय है कि जहाँ से लोगों के बुरे दिन शुरू होने लगते हैं वहीं से कवयित्री के अच्छे दिन दिखाई देने लगते हैं| दुःख को देखकर जहाँ वेदना से कवि का हृदय चीत्कार कर देना चाहिए वहीं कवयित्री सुख-लिप्सा के गीत मगन होकर गा रही है| इस स्थिति पर पूर्णिमा का एक गीत और ध्यान खींचता है-
“माघ का/ सुंदर सवेरा/ खिल रहा बटियों के ऊपर/ तरल जलधारा लरजती/ ठिठक चलती/ और तुहिनों से सजी/ पूरब की धरती/ शांत निर्मल सुखद किरणे/ उतरतीं/ निःशब्द पग धर/ मंदिरों की घंटियाँ / बजतीं मधुर-सी/ गूँजती फिरतीं/ दिशाओं में भँवर सी/ साथ ताली दे रहे हैं/ गंडकी के/ शब्द सत्वर/ शालिग्रामों की चरण रज/ गहे यह मन/ सदा मंगल दायिनी हो/ प्रकृति पावन/ पर्वतों से दीप्त उतरें/ स्वस्ति मुद्रा में/ शुभंकर”

‘पूरब की धरती’ के जिस प्राकृतिक सौन्दर्य की छटा का महिमागान करते हुए कवयित्री ‘शांत सुखद निर्मल किरणें’ का चित्रांकन करते नहीं थक रही हैं, यह वही मौसम है जब आम जन मानस के हाथों का लोटा भी कंपकपी से छूट जाता है| कितने ही परिवार तो ऐसे भी हैं जो जल रहे अलाव के सामने बैठे पूरी रात गुजार देते हैं| ठंडी की कशमकश में कोई मेहमान आ जाए तो परीक्षा ही हो जाती है परिवेश की| न तो फटे-चिथे कपड़े में धूल-धूसरित वे मासूम बचपन कवयित्री को दिखाई देते हैं जिन्हें स्यूटर और जूते तक नशीब नहीं होते और न ही तो उन लाचार माता-पिता की बेबसी नजर आती है जिनकी आँखों से पानी नहीं बेबस आँसू की बूँदें टपकती हैं| ऐसे ही एक नवगीत में प्रिय का वियोग न सहन कर पाने पर कवयित्री का “जीना/ बेहाल हुआ/ काटे कंगना, बिछुआ/ काम काज भाए नहीं/ भाए मीठा सतुआ” वाली स्थिति का पता चलता है| यहाँ गरीबी और तंगहाली का जैसे मजाक उड़ाया जाता है| जिस परिवार में पेट भरने के लिए सत्तू का प्रयोग होता है उसी परिवेश की इस कवयित्री को “मीठा सतुआ” तब भाता है जब उसका मन-प्रेमी उससे दूर होता है| एक तरफ बस्तियां बीरान होती रहीं| लोगों के परिवार उजड़ते रहे दूसरी तरफ कवयित्री के मन-मस्तिष्क में इन सबकी चिंता की बजाय “सोनचम्पा महकती रही रात भर/ चांदनी सुख की झरती/ रही रात भर|” कोई अमानवीय प्रवृत्ति ही होगी जो इस तरह जीवनधर्मिता का मखौल उड़ाएगी| निश्चित ही इस लोक की बात न करके कवयित्री महादेवी वर्मा वाले क्षितिज के पार झाँकने के लिए व्याकुल है|
         
यह कहना कोई आश्चर्य नहीं है कि जहाँ से नवगीत की यात्रा शुरू होती है उसके बाद का बाद का भारतीय ही नहीं वैश्विक जीवन भी उथल-पुथल का जीवन रहा है| व्यक्ति की जीवन शैली में यहीं कहीं उत्तर आधुनिकता की रंगत धीरे से प्रवेश करने लगती है| टेलीविजन की लोकप्रियता, मॉल संस्कृति का मेला, महानगरीय परिवेश की उठापटक यहीं से शुरू होती है| यहीं से व्यक्ति अतीत के मोह से छुटकारा पाना चाहता है और भविष्य से बेखबर वर्तमान के संघर्ष को धार देना चाहता है| ऐसे परिदृश्य में जहाँ आततायी शक्तियों के प्रतिरोध में नवगीत के स्वर तीखे होने चाहिए वहीं कवयित्री पूर्ण रूप से स्वप्नजीवी बनकर “ढूंढ तो लोगे” के माध्यम से लुकाछिपी का खेल खेल रही है| दरअसल यह लुकाछिपी कवयित्री के वैयक्तिक विलास की तो लुकाछिपी है ही कहीं न कहीं नवगीत के भविष्य के साथ भी लुकाछिपी है| नवगीत के प्रारंभ परिचय से तो यह आभास हुआ था कि समकालीन कविता के बनिस्बत आलोचक नवगीत विधा को तवज्जो नहीं दे रहे हैं अब पूर्णिमा के इन नवगीतों के देखने के बाद यथार्थ का यह परिदृश्य मानसिकता को संशय में डाल रही है आखिर ऐसे गीतों को क्यों तवज्जो दें? ऐसे गैरजिम्मेदाराना व्यवहार समय और परिवेश के साथ कौन कर सकता है कि एक तरफ कहीं मातम मनाया जा रहा तो दूसरी तरफ उत्सव के नगाड़े बजाए जा रहे हैं| इसी के साथ एक अन्य पूरे गीत को पढने की जोहमत उठाएँ तो परिदृश्य और भी स्पष्ट हो जाता है-
 “ठीक सामने धूप खड़ी हो/ हरियल पत्तों बेल चढ़ी हो/ दरवाजा तो बंद हो लेकिन/ परदे पर एक/ डोर बंधी हो/ तो फिर वह ही है घर मेरा/ ढूंढ तो लोगे घर तुम मेरा
बहुत पुरानी सी दीवार है/ नीले रंग से पुता द्वार है/ पीतल के जो लैंप लगे हैं/ जाने कितनी/ रात जगे हैं/ राह देखते हुआ सवेरा/ ढूंढ तो लोगे घर तुम मेरा
पत्थर पर एक नाम लिखा है/ मेरा है पर मिटा-मिटा है/ ध्यान से पढ़ने में आएगा/ घर मेरा है/ बतलायेगा/ है छोटा सा रैन बसेरा
काँच पे हल्की दस्तक देना/ दो पल इन्तजार कर लेना/ बहुत दिनों के बाद मिलेंगे/ देखो आँखें/ भर मत लेना/ हंसकर सहना समय सुनहरा/ ढूंढ तो लोगे घर तुम मेरा”    

‘पीतल के लैंप’ और रात जगने की क्रिया का नवगीत की समकालीनता से क्या सम्बन्ध है भला? भूख-प्यास, गरीबी-लाचारी से इन गीतों का है कोई वास्ता? जब कवयित्री यह कहती है कि “कितने कमल खिले जीवन में/ जिनको हमने नहीं चुना/ जीने की/ आपाधापी में भूला हमने/ ऊँचा ही ऊंचा/ तो हरदम झूला हमने/ तालों की गहराई पर/ जीवन की/ सच्चाई पर/ पत्ते जो भी लिखे गये थे/ उनको हमने नहीं गुना”, तो उसके परिवेश से अपरिचितों की तरह रहने के संकेत मिल जाते हैं| यह संकेत तब और विश्वास में बदल जाते हैं जब नून-तेल-लकड़ी की जुगाड़ में भटक रहे जनसमुदाय की आशाओं आकांक्षाओं को मटियामेट करती कवयित्री की जागरूक चेतना में “मधुर छनती/ झर रही यह धूप सर्दी की/ याद आती चाय अदरक और हल्दी की/ पाँव के नीचे/नरम है दूब मनभावन/ चुभ रही फिर भी/ हवाएँ कड़क वर्दी सी|” कहाँ तो कोई कंकड़-पत्थर पर चलने-ढोने के लिए विवश है और कहाँ तो किसी के “पाँव के नीचे नरम है दूब मनभावन|” इससे तो यही स्पष्ट होता है कि ग्रामीण परिवेश से कवयित्री पूरी तरह अपरिचित है अपने परिवेश से भी उसे कोई प्रेम नहीं है| है तो महज अपनी सुख-सुविधा से जो उसके कवि-हृदय से निकले शब्दों को फर्जी प्रमाणित करते हैं| यहाँ न तो अनुभव है और न ही तो अनुभूति| सौंदर्य की चकाचौंध में यथार्थ वैसे दिखाई भी कहाँ देता है?

          पूर्णिमा बर्मन स्वभाव से अच्छी हैं व्यावहारिक हैं सामाजिक भी हैं लेकिन एक रचनाकार के तौर पर उतनी सफल हैं, ऐसा कहने में मुझे संकोच है| जिस सामाजिक अनुभूति की आवश्यकता समकालीन जीवन-समय को है उसका अभाव इनकी रचनाओं में खटकता है| नवगीत की बनावट और बुनावट में कई बार ऐसा लगता है जैसे कवयित्री जबरजस्ती नवगीत लिखना चाहती है| गीत के भाव छायावादी तो हैं ही हालावादी की प्रवृत्ति भी दृष्टिगत होती है|

नचिकेता

हिंदी नवगीत के मठों ने योग्य रचनाकारों को उपेक्षित किया है तो मठाधीशों ने शोषण| ऐसे बहुत से रचनाकार मिल जायेंगे जो स्वयं को क्रन्तिकारी, मानवतावादी और जनवादी होने का प्रमाण आपको दिखाते नजर आएँगे| इनके कहे पर न जाकर यदि इनकी रचनाओं के माध्यम से यथार्थ परिदृश्य का अवलोकन करने का प्रयास करेंगे तो आप पायेंगे कि इनसे बड़ा दुराचारी और अनाचारी इस विधा में कोई और नहीं है| रुतबा और योग्यता के एवज में (सही अर्थों में जो इनके पास नहीं है) दूसरों को शोषित करने का इनका जन्मसिद्ध अधिकार है| ये स्वयं को मानते तो बहुत शालीन हैं लेकिन इनकी छवि समाज में एक ऐसे व्यक्तित्व के रूप में बनी हुई है जो एक घर, एक परिवार, एक समुदाय का नहीं अपितु पूरे परिवेश की फसलें, खेत, विचार को या तो चर कर बैठे हैं या फिर पूरी उर्वर और पुष्पित-पल्लवित सामाजिक भावभूमि को बंजर बनाने के प्रयास में सक्रिय हैं|

आश्चर्य तो तब होता है जब इन स्वनामधन्य रचनाकारों के ये सारे कार्य तमाम संघों की निगरानी में सम्पन्न हो रहे होते हैं| जहाँ इनके शक्ति-और सामर्थ्य के दुरूपयोग में लोक कभी कुछ बोलने का प्रयास करता है वहां इन्हीं संघों द्वारा उसे तमाम अघोषित कारनामों में उसे घेर लिया जाता है| मुझे यह भी नहीं समझ आता है कि क्या ये संघ (जनवाद, मानवतावाद, दानवतावाद आदि आदि) इन्हें ऐसा बनाने में इनके सुरक्षा कवच के रूप में काम करते हैं?

खैर, ये तो उनकी देहवादी परम्परा के पोषक और संवाहक जानें लेकिन जरूरी है कि जिन प्रतिमानों की अपेक्षा आप किसी दूसरे के लेखन में करते हैं उसकी अनुपालना आपकी रचनाओं में भी दिखाई दे| वर्तमान नवगीत विधा के ऐसे कई महारथी हैं कि किसी रचनाकार द्वारा यदि प्रेम पर लिखी कोई रचना देखते हैं तो उसे वासना-प्रेमी से लेकर ऐय्यास तक घोषित करने में कोई कोरी कसर नहीं छोड़ते लेकिन जब स्वयं अपनी मांसल अनुभूति से उपजे अनुभवजन्य परिदृश्य का चित्रांकन और चरित्रांकन करते हैं तो वहां भी जनवादी होने का स्पेस क्रिएट कर लेते हैं|

यहाँ इनके पास सबसे बड़ा हथियार होता है मनुष्य की प्राकृतिक स्वभाव से जडित देह-राग की प्रवृत्ति| यह प्रवृत्ति इन अर्थों में उनके द्वारा प्रयोग की जाती है कि जैसे वे ही स्त्रियों की यौन-इच्छाओं के रक्षक और पोषक हैं और उन्हीं द्वारा वात्स्यायन के कामसूत्र का परिवेश में प्रतिष्ठापन और सिंहावलोकन होना है| वे इन विषयों में इतने दक्ष होते हैं कि फ्रायड के मनोविश्लेषणवाद से लेकर वात्स्यायन के तमाम कामसूत्रों के प्रयोग अपनी रचनाओं में करते दिखाई देते हैं|
         
नचिकेता ऐसे ही गीतकार हैं जो जन-सम्वेदना के नाम पर तन-वेदना की प्यास लिए तन-प्रेम-रोदन कर रहे हैं|  यह जानना और दिलचस्प हो उठता है कि पहले तो ये जनता के सबसे बड़े हितैषी बनते हैं| उसके श्रम और बेबसी का सहारा लेकर संगठित समूहों के भागीदार बनते हैं| जैसे ही इन्हें सिद्धि और प्रसिद्धि प्राप्त होती है वैसे ही तन की प्यास और मन की यथा-व्यथा लिए गलियों-नगरों-चौराहों पर चक्कर काटते दिखाई देते हैं| यह एक बड़ी विडंबना है कि जैसे-जैसे लोक में इनकी ख्याति होती है वैसे-वैसे मन के रास्ते तन के पारखी होने की कला में निपुण होते जाते हैं| निपुणता भी ऐसी कि मस्तराम और अन्तर्वासना डॉट कॉम के लेखक भी इनके सामने पानी भरते दिखाई दें| देह-परख का यह नमूना सहज ही ध्यान आकर्षित करता है-“दूध भरे स्तन जैसा/ तन जोबाया तेरा/ गब्भाए साठी के पौधे सी/ हो हरी भरी/ ओस धुले बेला के फूलों सी/ टटकी, सुथरी/ बदन पके कटहल जैसा/ है कोबाया तेरा/ लिपटी मोटी कमर/ रेशमी साडी में ऐसे/ कुमुद मुकुल हों सोए/ किसलय बाहों में जैसे/ है गुदाज होठों पर पसरा/ शर्माया तेरा/ हरे मटर की पहली/ गदराई सी छीमी हो/ मुझे शीत में ऊष्मा देती/ धीमी धीमी हो/ मदिराई आँखों का कोया/ लजियाया तेरा”  यहाँ ‘बदन पके कटहल’ जैसी स्थिति की यथार्थता नापने में संलग्न होना, ‘दूध भरे स्तन जैसा’ तन की परिकल्पना करना, नायिका के ‘गुदाज होठों’ की पहचान करते हुए उसे “हरे मटर की पहली/ गदराई सी छीमी” करार देना इंटरनेट पर पड़े तमाम सस्ते एवं लिजलिजे (सेक्सुअल) कहानियों की सीमा को भी लांघ जाना है| ‘लिपटी मोटी कमर’ में ‘हरी भरी..../ टटकी सुथरी’ नायिका का रूप आकर्षण कवि को इतना मंत्रमुग्ध करता है कि वह उससे मांसल अनुभूतियों के सहारे ‘शीत में ऊष्मा’ प्राप्त करता है| दरअसल यह कवि-दृष्टि की गहराई ही है कि वह ‘देह-गेह’ में प्रवृत्त होकर अनुभव से अनुभूति तक का सफ़र तय करता हुआ दिहाई देता है| इसे परिपक्वता देने में युवापन से लेकर वृद्धावस्था तक के संघर्ष को रेखांकित करना जरूरी हो जाता है|

नचिकेता का समय यथार्थतः एक ऐसा समय है कि देश में बेरोजगारी और भुखमरी का तांडव अपने चरम पर था| सांप्रदायिक उन्माद और जातीय विद्वेष से समाज आतंकित और भयभीत था| बीमारी-महामारी से गाँव के गाँव आक्रांत थे| संस्कृति कर्मियों के हृदय में जड़ परम्पराओं और रूढ़ियों से समाज को बाहर निकालने की उत्कंठा थी तो सामाजिकों को समन्वय और समानता का मार्ग तलाशने की लालसा| कवि-कलाकार-साहित्यकार अपने अपने तरीके से देश को जड़ताओं से निकाल कर गतिशील बनाने की प्रक्रिया में सक्रिय थे| यह कितनी विसंगति की बात है कि जब लोग बाग विभिन्न आन्दोलनों का हिस्सा होते हैं उस समय कवि ये स्वीकार करता है कि जन-जीवन के श्रम का यथार्थ लिखने की बजाय “मैंने होठों से/ होठों पर प्यार लिखा/ गुच्छे गुच्छे फूल रहा/ कचनार लिखा|”  जिस समय लोगबाग नौकरी आदि के लिए तरस रहे होते हैं, आततायी सत्ता के षड्यंत्रों का शिकार हो रहे होते हैं उस समय की स्थिति में कवि प्रिय-मिलन के सुख से उत्प्लावित होकर निढाल हो रहा होता है| कवि का यह कहना कि “आज/ तुम से गले मिलकर/ खुश हुआ मैं/ मिला तुमसे/ फूल औ’ मकरंद जैसा/ एक अच्छे गीत के/ लय-छंद जैसा/ चाँदनी की तरह खिलकर/ खुश हुआ मैं”  एक कवि से जनता की आशाओं और आकांक्षाओं का मजाक उड़ाना है|

यही सगल और यही चाल है जनवादी कवि रूप में शुमार नचिकेता का जो जनांदोलनों और परिवर्तनकामी समय की परिधि में जनवाद के सहारे देह-गेह में प्रवेश कर अपना समय सुनहरा और भविष्य रंगीन बनाने की कवायद में मस्त और व्यस्त रहे हैं| यह कवायद इनके बड़े गीत के इस छोटे अंश में सिद्दत से देखी जा सकती है-देख मुझे कनखी से/ होंठ काटना/ मुस्काना/ अंगड़ाई लेते ही/ पल्लू/ स्वतः खिसक जाना/ रंग चटख उठना/ उभार पर/ कसती चोली का|” ‘कसती चोली का’ रंग पहचानने की जो दृष्टि नचिकेता द्वारा यहाँ दौड़ाई जाती है वह निहायत ही सस्ती और चलताऊ किस्म की अभिव्यक्ति है जो किसी ग्रामीण युवती के रूप-आकर्षण में डूबे गंभीर कवि की नहीं, ‘सड़क छाप आशिकों’ की अभिव्यक्ति प्रतीत होती है| ऐसी अभिव्यक्ति में साहित्यिकता और जन सरोकार ढूंढना हो सकता है कि आलोचकों और समीक्षकों को रास आया हो लेकिन मादकता के अंतस्तल तक डूबे नचिकेता वासना-व्यसन में निमग्न होकर डूबते उतिराते हैं न कि जन-संवेदना के चित्रण में|  

वासना से उद्दीप्त कामुकता की हद तक नचिकेता की यही पारखी दृष्टि अपने आने वाली पीढ़ी को संस्कार देने के लिए जमीन तैयार करती है| स्त्री-स्वतन्त्रता और प्रेम-पवित्रता जैसे शब्दों के आवरण में देह-गेह-व्यापार का नंगा नाच इसी रचनात्मक दृष्टि की आड़ में खेला जाता है| ‘खेल’ की क्रिया में नायक माहिर है लेकिन नायिका की शिथिलता रति-क्रिया में बाधक बनती है| कवि स्वयं स्वीकार करता है कि “गरम सांस में रचा नरम/ आलिंगन मुझे दिया/ रगड़ी मेहुनाई/ माचिस पर लहरी आग नहीं|” अतृप्त वास्नात्मक हृदय की तड़पन और असफल रति-प्रसंग का ऐसा उदहारण समकालीन हिंदी कविता के कामदेव और रसिकरंजन अशोक वाजपेयी के यहाँ भी दुर्लभ है| नचिकेता उनके अनुभवों के यथार्थ से दो कदम आगे बढ़ते हुए अपना अनुभूतिजन्य यथार्थ कुछ इस तरह प्रस्तुत करते हैं कि पाठक भी इस्तर-बिस्तर के दरकन को खोजने लगता है| यथा-
“आज अधूरे मन से तुमने/ चुम्बन मुझे दिया/ भरे कुचों की/ छुअन नहीं गरमाहट भर पाई / मंजरियों से लदी आम की डाली लरुआई/ अंतस्तल में सूखा, प्यासा/ सावन मुझे दिया/ तरु से लिपटी/ अमरबेल में मिला कसाव नहीं/ आँखों के कोये में टुह टुह खिला गुलाब नहीं/ गरम सांस से रचा नरम/ आलिंगन मुझे दिया/ रगड़ी मेहुनाई/ माचिस पर लहरी आग नहीं/ आलापन के बावजूद गा पाया राग नहीं/ फिसलन भरी ढलानों का/ आरोहण मुझे दिया|”

कहना न होगा कि ऐसे गीत ही धीरे-धीरे जन-समाज के लिए नासूर बनने लगते हैं| भोजपुरी हिंदी फिल्मों के गीतों को एक बानगी के तौर पर लिया जा सकता है| “सैंया जी सब कुछ मांगेला गमछा बिछा के” से “लहंगा उठाई देब रिमोट से” तक की यात्रा में भोजपुरी फ़िल्मी गीतों ने जो सीख-संस्कार परिवेश को दिया है, उसका परिणाम हम सबके सामने आ रहा है| नित प्रतिदिन घटित होते घटनाओं के आधार पर यह कहना गलत न होगा कि समाज में स्त्री-शोषण की समस्या यहीं कहीं से ऊर्जा पाती हैं| ऐसा इसलिए क्योंकि स्त्री जहाँ संवेदना और मनुष्य-रूप न होकर इच्छा पूर्ति का साधन भर रह जाती है वहां उसे सिर्फ उपभोग की दृष्टि से ही देखा जा सकता है| कवि स्वयं ऐसा स्वीकार करता है कि भर गयी सिहरन/ हवा में छू तुम्हारी देह/ और मैं पी रहा छककर/ इन्द्रधनुषी नेह” इन्द्रधनुषी नेह को छू कर पीने की यह क्रिया स्त्री को महज वासना के साधन के रूप में प्रयोग करने की हठधर्मिता है|

इस हठधर्मिता के दायरे में स्त्री के कमर, स्तन और यौवन से नचिकेता की भिज्ञता इतनी गहरी है कि एक विक्षिप्त काम-पीड़ित पशुता की हद तक गुजरने के लिए लालायित दिखाई देते हैं| थोडा सा सुकून उन्हें तब मिलता है जब  “गुदगुदाती हो बदन/ हलकी छुअन से/ थकन हर लेती/ छुअन के बाँकपन से/ हँसी अधरों पर/ न पल भर मंद होती|” हालांकि यह कहा जाता है कि बढती उम्र के साथ यौनेच्छा मनुष्य की घटती जाती है लेकिन नचिकेता की अटकती-भटकती देह-इच्छा साठ के पार भी कविता के सार्वजनिक पृष्ठभूमि पर यह चाहती है कि “सांस से/ साँसें मिला लें आज फिर/ फूल होठों पर खिला लें/ आज फिर/ मान की/ मनुहार की बातें करें/ बांह में/ कस लें परस्पर देह फिर/ भरें आदिम राग से/ यह गेह फिर/ सृष्टि के/ संसार की बातें करें|” जबकि यह समय ‘सृष्टि की संसार की बातें’ करने की नहीं समय के विपरीत होने और समाज को अनुभव बाटने का समय होता है| नचिकेता शिक्षा देते भी हैं तो वासना में डूबे हुए काम-बाण से आहत इस रूप में कि “आओ जैसे/ दूध उतरते स्तन में/ मिलने की इच्छाएं जगती/ हैं मन में|”

इन कविताओं को पढ़ते हुए कई बार यह लगता है कि नचिकेता अपना मानसिक संतुलन खो बैठे हैं जिनके लिए सामाजिक व्यवहार की स्मृतियाँ कोई माने नहीं रखती लेकिन देह-मिलन से उपजे यादों का यथार्थ उन्हें बेचैन करता है| वे स्वीकारते हैं कि “मैं भूल नहीं पाया/ गरमाती साँसों को/ पहले आलिंगन के/ अरवा अहसासों को/ है धंसा अधर का/ होना गोलाकार अभी|” यह अधर के गोलाकार होने की स्मृति का ही असर है कि नायिका के विषय में वे कह उठते हैं “पके हुए तरबूजे की/ हो टुहटुह फाकें तुम” जिन्हें “हो रहा है ठण्ड का अहसास/ अब तो पास आओ|” स्त्री-देह के लिए नचिकेता जैसे मदांध लोगों की आकर्षण और घर्षण की ऐसी उद्याम इच्छा ने परिवेश को असंतुलित बनाकर रख दिया है| ऐसे कामी लोगों के लिए स्त्री मनुष्य नहीं है| सहधर्मिणी और सहयात्री तो हो ही नहीं सकती| यदि कुछ हो सकती है तो वासना पूर्ति के संसाधन के रूप में “गन्ने की मिठास/ मिर्ची का तीखापन” हो सकती है|

नचिकेता निश्चित ही गीत और नवगीत के अतीत और वर्तमान हैं| भविष्य भी इनको इस अर्थ में माना जा सकता है कि युवा पीढ़ी को इनसे बहुत कुछ सीखना है| अब यहाँ विडंबना ये है कि जिनसे बाल जीवन कुछ सीख सकता है, जिनका अनुकरण कर सकता है वे देह-राग में मस्त और व्यस्त हैं और जिनसे देश-समाज को कुछ आशाएं हैं वे भक्ति में श्रद्धानवत होकर ऐसे रचनाकारों के प्रचार-प्रसार में जुटे हैं| यह सच है कि हिंदी नवगीत में जनवाद को प्रवेश दिलाने में नचिकेता का विशेष योगदान है लेकिन एक बड़ा सच यह भी है कि भोगवाद की परंपरा में इस विधा को समृद्ध करने में इनके श्रम को नकारा नहीं जा सकता| अब यह तो पाठक-वर्ग को निर्णय करना है कि वह क्या चाहता है? प्रेम के आवरण में वासना के दलदल में फंसे पोर्न कंटेंट पर कार्य करने वाले ऐसे कवि की मांसल अभिव्यक्ति? मस्तराम, अन्तर्वासना डॉट कॉम की तर्ज पर नायिका के सौंदर्य का वर्णन करने वाले कामी और भोगी रचनाकार की मदांध और निष्क्रियता के हद तक गिरी वैचारिक अधोपतन? 
(रेवांत में प्रकाशित)