Wednesday, 16 December 2020
Thursday, 26 November 2020
Wednesday, 25 November 2020
Wednesday, 11 November 2020
लोकतंत्र अपनी तरह से अपमानित और लांछित हो रहा है
इस बार आशा थी कि कुछ अलग होगा| एग्जिट पोल ने भी इशारा किया था| मैंने तो यहाँ तक सोच लिया था कि इस बार ईवीएम की जय जयकार होगी| विपक्ष फिर से खुश होगा| भाजपा के देश निकाले जाने के खबर आएँगे| उत्साहित विपक्ष के कार्यकर्ता, फेसबुक से लेकर नोटबुक तक, लोकतंत्र की महिमा गाएंगे| बिहार के लोग अनपढ़ और रूढ़िवादी होने से बच जाएँगे| प्रबुद्ध और बुद्धिमान की कसौटी पर खरा मान लिया जाएगा उन्हें| लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ| इस तरह नहीं हुआ कि एक प्रशंसक ने पूरी जनता के विषय में यह निर्णय सुना दिया कि बिहार के लोग ब्राह्मणवाद के चंगुल से बाहर नहीं निकलना चाहते|
लोकतंत्र अपनी तरह से अपमानित और लांछित हो रहा है| विपक्ष के वे बीर जो फेसबुक से लेकर नोटबुक तक बैठाए गए थे, अब आक्रामक मुद्रा में आ गये हैं| निश्चित ही एक दो क्रांति हो जाए तो कोई आशंका नहीं| यह क्रांतियाँ निहायत जातिवादी और सांप्रदायिक होंगी दो राय इसमें भी नहीं है| सबसे बड़ी बात ऐसा उनके द्वारा होगा जो देश में सांप्रदायिक सद्भाव चाहते हैं और समाज में जातिवादी प्रवृत्तियों का अंत|
Wednesday, 4 November 2020
मुनौव्वर राणा जैसे लोग विष हैं समाज के लिए
मुनौव्वर राणा जितना बोल दिए उससे अलग उनका मिज़ाज कभी नहीं रहा| आज कैसे हो सकता था या हो सकता है| यह सिर्फ मुनौव्वर राणा की बात नहीं है यह लगभग मुस्लिम कवियों की कमजोरी है कि वह इस्लाम धर्म आई जड़ता पर बोलने से डरते हैं, घबड़ाते हैं| यदि यह कहें कि इस्लाम धर्म में आई रूढ़ियों को ओढ़ते-बिछाते हैं तो इसे अन्यथा न लिया जाए अपितु एक सच मानकर स्वीकार किया जाए|
हिंदी के कवि या चिंतकों की विश्वसनीयता हर समय शक के दायरे में रही है| सिर काटने की बात हो या धमकी देने की आदत, इनका समर्थन प्रगतिशीलता के आड़ में हिंदी कवियों द्वारा हर समय किया गया है| एक सम्प्रदाय मात्र के लोगों से आप प्रगतिशीलता की अपेक्षा बिलकुल नहीं कर सकते हैं| हिन्दू धर्म की तमाम मान्यताओं पर दिन रात गलत कमेन्ट करने वाले दूसरे धर्म की गलत मान्यताओं पर इतना मौन साध लेते हैं जैसे कुछ दिक्कत ही नहीं है| दिक्कत कहीं भले न हो लेकिन आपकी विश्वसनीयता पर है| हो सके तो उसे बचाइये|
अर्नब गोस्वामी के साथ गलत कर रही महाराष्ट्र सरकार
सत्ता को सिर्फ सत्ता की दृष्टि से देखिये| दूसरे का घर जलते हुए स्वयं को सुरक्षित रखने का स्वप्न संजोने वाले कहीं गहरे अंधकार में गिरते हैं| अर्नब गोस्वामी के साथ महाराष्ट्र सरकार जो कुछ भी कर रही है गलत है| मीडिया की स्वतन्त्रता पर सीधे तौर पर हस्तक्षेप है| मीडिया समूहों को इस स्थिति का संज्ञान लेना चाहिए|
जश्न मना रहे हैं कल मीडिया समूहों की दुरगति पर जब रुदनगान करें, वह भी देखने लायक होगा| हम सही सबको गलत ठहराने की नीति बिलकुल उचित नहीं है|
Wednesday, 14 October 2020
मानव कितना दुर्बल है असहाय बहुत है (माधव कौशिक के नवगीत और कोरोजीवी कविता)
माधव कौशिक अपने समय के जरूरी रचनाकार हैं| ग़ज़ल कविता और
नवगीत में समान रूप से सक्रिय एक ऐसे रचनाकार जो कल्पनाजीवी न होकर यथार्थ भावभूमि
पर चलना पसंद करते हैं| यूं तो ग़ज़ल विधा के बड़े हस्ताक्षरों में से एक हैं लेकिन
नवगीत की ज़मीन को उर्वर बनाने में इनका अपना योगदान है, जिसे किसी भी रूप में
इंकार नहीं किया जा सकता है| ऐसा कहते हुए यह कहना चाहूँगा कि जहाँ अधिकांश
नवगीतकारों को अभी तक गीत और नवगीत के विभेदक तत्त्वों की जानकारी नहीं हो पायी
वहीं अपने के यथार्थ और समाज की जरूरतों पर लगातार लेखनी करते हुए माधव कौशिक
नवगीत विधा को निरंतर समृद्ध करने में लगे हुए हैं| कोरोना समय की विसंगतियों में
कवि जिस जिम्मेदारी का परिचय देता है जन के प्रति उसका संज्ञान लेना जरूरी
है|
ऐसा समय, जिसकी न तो किसी ने परिकल्पना की थी और न ही तो स्वप्न देखा था, हम सबके बीच आया और विचलित करते चला गया| सब को चिंता हुई, दुःख हुआ और आज भी एक भयानक
सदमे के दौर से दो-चार होना पड़ रहा है परिवेश को| यह एहसास माधव कौशिक को कहीं गहरे में होता है कि बड़ी से बड़ी बाधाओं को दूर करने वाला “मानव कितना दुर्बल है/ असहाय बहुत है/ इस प्रकोप के सम्मुख/ वह निरुपाय बहुत है|” सब कुछ जैसे क्षीण हो गया है उसका| हर कोई जैसे दुश्मन हो गया है| आपदा में अवसर की तलाश करता मानव पहली बार इतना निरुपाय हुआ कि सब कुछ होते हुए भी दो रोटी के लिए तरसने लगा|
यह निरापद नहीं है कि मनुष्य जीवन की इस यथार्थ स्थिति के
प्रति साहित्य में सबसे अधिक कविता ने अपनी भूमिका का निर्वहन किया और भागते
विस्मृत होते जन के पक्ष को लेकर भूखे, नंगे और हताश-परेशान जीवन को केन्द्र में
बनाए रखा| नवगीतकार माधव कौशिक का कवि हृदय देखता है कि आँखों में सजने वाले “चारदीवारी
में सपने/ बन्द हैं|” कवि यह भी देखता है कि भटका हुआ इंसान कहीं खो गया है|
समृद्धि और वैभव की दुनिया में “भागती पीढ़ी अचानक/ रुक गई है/ ऊंची-ऊंची
गरदनें/ सब झुक गई हैं|” किसी को कुछ भी नहीं सूझ रहा है कि वह करे तो क्या
करे? अच्छे दिनों की तरह निमंत्रण न देकर “दबे पाँव आते हैं दुर्दिन/ बिन बुलाये/
किसके आगे दर्द कहें हम/ किस को व्यथा सुनाएं?” खासकर ऐसी स्थिति में जब सभी
जले-भुने, हताश-निराश-परेशान और हैरान हैं|
इस कोरोना काल में हर कोई विशेषगज्ञ बनता दिखाई दिया|
विषेशज्ञता की आड़ में षड्यंत्रों के जो खेल खेले गये उसके निशान लम्बे वर्षों तक
नहीं जाने वाले हैं| इस कोरोना समय में षड्यंत्र की बिसातें इतनी बिछाई गयी हैं कि
स्वतंत्र रहने वाला मानव तमाम पिंजरों में कैद कर के रख दिया गया है| एक पिंजरे से
मुक्त होता है तो दूसरे पिंजरे के सांकल उसे जकड ले रहे हैं| यहाँ वह यह समझने में
असमर्थ हो रहा है कि इस भयानक त्रासदी के दौर में “कौन अब विश्वास को/ आवाज़
देगा/ परकटे पंछी को कब/ परवाज़ देगा?” उसकी अपनी आँखों के सामने “ज़हर घुलता
जा रहा/ वातावरण में/ फर्क कुछ पड़ता नहीं/ जीवन-मरण में|” कलरव और गुंजार से
परिपूर्ण परिवेश किसी श्मशानघाट से कम नहीं लग रहा है| ज़िन्दा आदमी भी मृतकों की
तरह आचरण करने के लिए वेबस है| कवि देखता है कि उसके सामने ही “हँसते-गाते शहर
बन गए/ शमशानों से निर्जन/ चारों ओर सुनाई देता/ जनमानस का क्रंदन” ऐसा क्रंदन
जहाँ चीखना हर कोई चाहता है लेकिन मौन है कि टूटने का नाम नहीं ले रहा है| आवाज़
हलक से बाहर आने के लिए तैयार नहीं है| शहरों तक होता तो भी कुछ गनीमत थी| समस्या
तब अधिक और बढ़ गयी जब “महानगरों से चलकर गाँवों तक/ यह कहर गया|” उन गाँवों
तक जहाँ अभी तक खडंजे और नल पर राजनीति हो रही है| न हॉस्पिटल हैं और न ही तो कोई
अन्य चिकत्सकीय सुविधाएँ|
सही मायने में कहें तो यह ऐसा दौर है जहाँ मनुष्य से मनुष्य
की दूरी बढती जा रही है| कोई किसी से संवाद की स्थिति में तो बिलकुल नहीं दिखाई दे
रहा है| चारों तरफ “तीव्र आँधी है, बुरा माहौल है/ मानवी-मूल्यों का मौसम मंद
है|” किसी के बीमार होने भर से जहाँ पड़ोसी पूरी बस्ती को एक कर देते थे वहीँ
किसी के मरण पर देखने की भी हिमाकत नहीं कर पा रहे हैं| माधव कौशिक का कवि हृदय
ऐसी स्थिति को देखकर द्रवित है| उनकी दृष्टि में “पहले ही अलगाव बहुत था/ अब
सामाजिक दूरी/ कैसे कोई कर पायेगा/ समरसता को पूरी/ जंगल के दावानल जैसा/ संकट पसर
गया” जिस संकट में बस भागम-भाग शेष है| ज़िन्दा बस्ती का बसेरा होता तो कोई
सहायता के लिए भी आता अब क्योंकि सब सूनसान है तो ऐसा लग रहा है जैसे जंगल में आग
लगी हो और सब कुछ तहस-नहस हो रहा है| यही इस समय का यथार्थ है| कहाँ तो संकट के
समय कंधे से कंधा मिलकर चलने की रवायतें थीं कहाँ अब लोग भागने-पराने लगे हैं| समस्या
तो यहाँ तक आ पहुंची है कि “कितना भी कोई प्यारा हो/ छू नहीं सकते/ मरणासन्न
हैं, लेकिन आँसू/ चू नहीं सकते|”
शहरों से गांवों की तरफ आने वाले मजदूरों की स्थिति ने सब
को चिंतित किया| हर कोई इस यंत्रणा को देखकर हैरान और हताश रह गया| इन्होंने सबके
समय को सुनहरा किया लेकिन इनके लिए “मास्क लगाकर घूम रहा है/ समय अभी तक|” जिनके
जिम्मे इनकी रक्षा-सुरक्षा की जिम्मेदारी थी वह इनके सौदागर बन बैठे| सपनों से
लेकर आशाओं और आकांक्षाओं तक की परवाह नहीं की| कवि यहाँ देखता है कि “बाग़ के
हत्यारे/ माली हो चुके हैं|” चुन-चुन कर फूलों और वृक्षों को उजाड़ रहे हैं| यह
उजाड़ना नहीं तो आखिर क्या है कि शहरों की शान-ओ-शौकत बढाने वाले “महानगरों से करें
पलायन/ फटे हाल मजदूर|’’ जिस समय सम्पन्न लोग घरों में ताली-थाली के उत्सव में
व्यस्त थे उसी समय कवि “भूखे-प्यासे खड़े सड़क पर/ बुरे हाल मजदूर” को असहाय और
बेबसी के मंजर में फंसे देखता है| यह मंजर इतना भयानक और त्रासदपूर्ण होता है कि “छलनी
तलुवे चले निरंतर/ पहुँचे सौ-सौ कोस/ लेकिन कभी व्यवस्था को भी/ नहीं देते हैं
दोष” क्योंकि उनकी बचपन से लेकर अब तक की स्थिति में यह कोई नई घटना नहीं होती है|
बार-बार व्यवस्था के हाथों छले जाते हैं लेकिन उतनी ही बार
फिर उठ खड़े होते हैं, ठीक उनको चिढ़ाते हुए| वे सच्चे अर्थों में कर्मपथ पर चलने
वाले राही हैं जिनके हिस्से महज श्रम लिखा है| कवि इनकी स्थिति को देखते हुए जो
शब्द कहता है दरअसल हम सबके हृदय में उनके प्रति वही उदगार हैं| “सर पर गठरी
लिए दुखों की/ और कंधे पर बच्चे/ झूठ फरेबी इस दुनिया में/ निकले ये ही सच्चे|”
इस अर्थ में भी कि माटी की उर्वरता को अपने अंदर समाहित करके चलने वाले लोग हैं न
कि बंजर जमीन की नीरस और उदास साँझ को ढोने वाले व्यापारी| विसंगति इनके साथ यही
हुई कि “गाँव पहुँच कर मुई भूख ने/ ऐसा फिर से घेरा/ महानगर में लौट के आये/ उठा
के टांडा-डेरा/ रगड़-रगड़ कर एड़ी मर गये/ इसी साल मज़दूर” लेकिन व्यवस्था के नुमाइंदे
न तो स्वयं को बदल सके और न ही तो भूख और पीड़ा की यथास्थिति को बदलने में इनकी कोई
सहायता की|
हम “कैद हैं घर में/ घुटन बढ़ने लगी है” जिसका इलाज
हमें तलाशना होगा| कुल मिलाकर हम सभी “इस अराजक वक्त में/ ऐसे फंसे/ दुर्दिनों के
पाश में/ सपने कसे/ किस तरह पीछा छुडायें दर्द से/ सबके सीने की कुढ़न बढ़ने लगी
है|” इस बढ़ते कुढ़न के बीच यह तय है कि हर प्रकार की समस्याओं का भी एक समय होता
है| सुबह के बाद रात होती है तो रात के बाद सुबह भी होता है| अब सब कुछ अधिक हो
गया है| कवि हैरान इस बात से है कि बातचीत, संवाद और प्रेम-प्रक्रिया में प्रवाहित
होने वाला “कम्प्यूटर पर घूम रहा है/ समय अभी तक|” आगे भी “हाल क्या होगा समय का/
राम जाने/ अब तो फूलों में/ चुभन बढ़ने लगी है” यह चुभन अधिक न बढ़े इसके लिए प्रयास
मनुष्य को ही करना पड़ेगा| यह तो सबको पता है और कवि भी मानता है कि “कुछ दिन अपनी
किस्मत पर/ दुनिया रोती है” बाद में कर्म-पथ पर अडिग रहते हुए दुनिया-निर्माण का
स्वप्न फिर संजोने लगती है| सृजन का कारवाँ कभी रुकता नहीं है तमाम विसंगतियों और
अवरोधों के बावजूद भी| तमाम समस्याओं के आने के बाद भी यह कवि का साहस है कि वह
समय के सुन्दर होने के प्रति आशान्वित है, क्योंकि “कुदरत के गुस्से-प्रकोप की/ हद
होती है|” यह प्रकोप भी हद की सीमा को पार कर गया है| अब नए सवेरे का आगमन होना
सुनिश्चित है|
कोरोजीवी कविता में जन के प्रति जो लगाव है, ऐसा नहीं है कि
वह मात्र कविता में है| गीतों, नवगीतों और ग़ज़लों में भी इसकी दमदार उपस्थिति है|
यूँ तो इन विधाओं में अक्सर लोग सत्ता-पक्ष में रहते हुए जन के यथार्थ को ठीक
तरीके से प्रस्तुत नहीं कर पाए; जबकि उन्हें यह पता है कि पक्ष-विपक्ष में होना एक
बात है और जन-संवेदना की बात करना एकदम दूसरी बात, बावजूद इसके समस्या वहां खड़ी हो
गयी जहाँ लोग भटकते मानव को विस्मृत कर नेतृत्व-गान में व्यस्त हो गये| बतौर
नवगीतकार माधव कौशिक स्वयं कहते हैं “चन्द रचनाकार ही ऐसे बचे हैं/ जिनके बाग़ी
गीत-ग़ज़लें-छंद हैं” बाकी सब एक विशेष प्रकार की भीड़ में शामिल होते हुए विधा
की धार को कमजोर करने में तल्लीन रहे| माधव कौशिक की इन रचनाओं से गुजरते हुए यह
आभास हुआ कि जब तक ऐसे खुले मानसिकता वाले रचनाकार हैं तब तक विधाओं के संकट की
बात करना बेमानी है|
Friday, 2 October 2020
‘लौटते हुए लोग’ को कवि और कविता का विश्वास
यह बस कविता की बात नहीं है और न ही तो कवि की ही बात है| बात है संवेदना और समझ की| जन और तन्त्र के बीच ‘मुसाफ़िर’ बन जूझते उद्देश्य और सोरोकर की| उस चेतना की जो उपेक्षा में जागरूक हो उपेक्षितों का साथ देता है| उस जागरूकता की जो नहीं मानता हार कभी भी और जन-अधिकारों के प्रति सचेष्ट रहता है| बात है दृष्टि की| सृजन और चिंतन की| उपेक्षा में खोया कवि उपेक्षितों का पथ-प्रशस्त करे बात उसी जन-प्रेम की है| कोरोजीविता ने जन-प्रेम, मन-प्रेम और तन-प्रेम वाले कवियों में साफ़ अंतर कर दिया है| आप चाहें तो आसानी से देख सकते हैं| सही अर्थों में जो जन-प्रेम वाले कवि हैं वही कोरोजीवी कविता के सशक्त हस्ताक्षर हैं|
सकती हैं| अनुभव का बहुत कुछ दिया जा सकता है जिस तरह से हम समाज से ले रहे हैं| सवाल प्रतिबद्धता और समझ का है| यह कहाँ से मिलेगा? जन के बीच रहने और आम आदमी बन इस त्रासदपूर्ण समय की विडम्बनाओं को देखने, समझने और स्वयं भोगने से ही सम्भव है| ऐसा करेगा कौन? वह जो मस्त हो व्यस्त होने का नाटक कर रहे हैं या फिर वह जो सक्षम होकर भी राशन लेने की लाइनों में प्रथम पंक्ति में अड़े मिल रहे हैं? जाहिर सी बात है कि नहीं, ये लोग नहीं हो सकते हैं| फिर? भूख का दुःख उसे होता है जो सही अर्थों में भूखा होता है| प्यास की तड़प उसे सालती है जो पानी के अभाव में दम तोड़ रहा होता है| कवि और कविता का रिश्ता बस यही है| यही है सार्थकता कवि के होने और कविता के जन्मने में|
Friday, 11 September 2020
हमारे यहाँ कुछ भी आन्दोलन जैसा नहीं है
दलित विमर्श हो या स्त्री विमर्श, सब महज फैशन है यहाँ पर| सेलेक्टिव विरोध सेलेक्टिव राजनीति| एक मुद्दे पर चुप्पी और एक मुद्दे पर हाय तौबा| इसीलिए कई बार ऐसे मुद्दों पर मैं नहीं बोलता| जानता हूँ कि सब राजनीति है| सब उठने-उठाने, गिरने-गिराने की प्रवृत्ति जैसा| आप सोच रहे होंगे कि ये क्या मैं उल्टा-सीधा बोल रहा हूँ? तो रुकिए दो उदहारण देता हूँ|
जौनपुर में पिछले दिनों दलितों की बस्ती सरेआम दबंग मुस्लिमों द्वारा जला दी जाती है| दसियों बार पोस्ट करने के बाद भी कोई आन्दोलन करता नहीं दिखा| बड़े से बड़े दलित चिंतक महज पोस्ट देखकर गायब हो गए| निर्दयता से सब कुछ हुआ था, इसका अंदाजा उस पोस्ट में जले पशुओं को देखकर लगाया जा सकता है|
रिया के अपराध में संलिप्त होने की आशंका होती है, तो जांच होगी ही| उस एक सीधे से मामले को कहाँ से कहाँ पहुंचा दिया गया, लगा स्त्री विमर्श की सारी कृपा बस इसी में केन्द्रित है| मीडिया के लिए हर कोई एक अच्छा गोस्त है जिसे हर
स्तर पर उतर कर खाना चाहती है|मजे की बात ये है कि हम सब भी उससे अलग अपनी छवि नहीं रख पा रहे हैं| कोरोना काल में जब आम आदमी के पक्ष में पूंजीपतियों को घेरने का समय था, हमारे बुद्धिजीवी रिया-रिया में व्यस्त रहे|
उन्नाव में जो कुछ हुआ सेंगर मामले में वह भी किसी से छिपा नहीं है| भाजपा की नेत्रियों द्वारा जो एकपक्षीय रवैया अपनाया गया वह भी किसी से छिपा नहीं है| तब स्त्री विमर्श और स्त्री-अपमान का किसी को ख्याल नहीं आया| भाजपा वालों का मामला था इसलिए उधर से किसी के न बोलने की पूरी उम्मीद थी| लेकिन विपक्ष जमकर के बवाल काटा| क्रांतिकारी स्त्रियों ने भी कम कमाल नहीं किया|
कंगना के साथ जो कुछ भी हुआ वह उचित नहीं था| सब जानते हैं| सब जान रहे हैं| जो ऑफिस अब तक वैध था वह अचानक कैसे अवैध हो सकता है? यह भी सबको पता है| उसके पक्ष में नहीं बोला गया| उसे दक्षिणपंथी बता दिया गया| हँसी तो तब आई जब बड़ी महिला पक्षधर कहाने वाली लेखिकाओं ने उसके भाजपा एजेंट होने की बात की| सीमा से बाहर जाकर बोलने की नसीहत दी| यही उनके साथ हुआ होता तो अब तक ज़मीन आसमान एक कर देतीं|
खैर, तो कहना यही था कि ऐसे मुद्दों पर अपना समय न बर्बाद करें| ज़मीन से जुड़ें और परिवर्तन को वहां तक पहुँचने दें जहाँ से कंगना जैसी नायिकाओं का उदय हो| स्त्री विमर्श तभी मजबूत होगा| दलित विमर्श के लिए भी यही सोचता हूँ कि गांवों में निकलकर उन्हें चेतना के पाठ पढ़ाए जाएँ ताकि हिंदी साहित्य की अवसरवादी राजनीति से बचते हुए वे स्वयं मजबूत स्तम्भ बन सकें और सक्रिय नागरिक के तौर पर हर क्षेत्र में प्रतिनिधित्व करें|
Monday, 7 September 2020
फेसबुक का सूची दौर और साहित्यकारों का पागलपन
इधर दो-तीन दिनों से कवि-सूची और व्यंग्यकार-सूची देखकर
हँसी आ रही है| व्यापारी अपने व्यापार के लिए कोई भी हथकंडा अपना सकता है लेकिन कवि और
साहित्यकार इतने स्तरहीन और सस्ते हो जाएंगे, मैंने कल्पना नहीं की थी| इन
कलाकारों के लिए इस समय सबसे बड़ी आपदा सूची में शामिल होना और न होना रह गया है,
सारे मुद्दे गए जहन्नुम में|
सूची में शामिल होते हुए कुछ लोग जहाँ खुश होकर अखबारों में
प्रविष्टियाँ देने लगे हैं वहीं कुछ लोग मातम मानने में लग गए हैं| सूची में होने
न होने को लेकर कुछ लोग तो जैसे खाना-पीना ही छोड़कर बैठ गए हैं| युवाओं में नाम
आने न आने का उत्साह तो समझ आता है लेकिन अस्सी-नब्बे वर्ष के बुजुर्ग भी जिस तरह
धमा-चौकड़ी मचा रखे हैं, उन्हें कवि-साहित्यकार माना जाय या नहीं,
अब ऐसा सोचने लगा हूँ|
माना जाए तो किस तरीके से माना जाए? न माना जाए तो फिर किस स्तर में फिट किया जाए, ऐसा भी मन सोच रहा है| कई बार सोचने पर निष्कर्ष निकलता है कि इनसे अच्छे तो वे लोग हैं
जो लिख पढ़ नहीं रहे हैं| कम से कम इस संकट के समय में कुछ विचार कर तो रहे हैं| लोगों की सहायता करने और जरूरत के सामान उपलब्ध करवाने का उपक्रम तो कर रहे हैं?
चरित्र-पतन तो सुना था लेकिन कर्तव्य-पतन के स्तर पर लेखकों
के पतन का ऐसा दौर कभी न सुना था और न देखा था| कभी एक दौर था कि सूचियाँ किसी रोष
या प्रतिरोध के लिए निकला करती थीं और लोग उसमें शामिल होने के लिए जी-जान लगा
देते थे|
एक आवाज उठती थी और लगता था कि हम जिन्दा समाज में हैं|
किसी खास विचारधारा में शामिल होने के बावजूद आफत-विपत में यही सूची हमें प्रेरणा
देती थी आगे बढ़ने के लिए| संघर्ष करने के लिए|
यह वाकई समझने की बात है कि जो स्वयं निष्क्रिय होकर लड़-भिड
रहे हैं, अपनी योग्यता को साबित करने के लिए सूचियों का सहारा ले रहे हैं, उनसे
उम्मीद भी क्या की जा सकती है? फिर वह आम आदमी की चिंता वाली बात? दलित विमर्श,
आदिवासी विमर्श और स्त्री विमर्श वाली बात? किसान की चिंता और मजदूर की चिंता वाली
बात? तो इन सभी मुद्दों का जो रोना था क्या वह सब एक प्रोपोगेन्डा मात्र था? यह
कितनी विडंबना है कि जिसका अपना ही पहचान संकट में है वह भी दूसरों के पहचान को
स्थायित्व देने के लिए संघष का ढोंग लेकर घूम रहा है?
ऐसे दौर में, जब आम आदमी एकदम सड़क पर है, रोजगार छिन रहे हैं, तनख्वाह में कटौती लगातार जारी है, ये कवि और लेखक नामक
प्राणी कर क्या रहे हैं? जिस परिवेश में घर से बेघर हो रहे हैं लोग, रात की नींद
और दिन का चैन गायब है, इन साहित्यकार और कवियों की आत्ममुग्धता समझ से बाहर है| ऐसे
लोगों को कैसे साहित्यकार कहा जा सकता है जो अपनी ज़मीर बेचकर खा रहे हैं और सो रहे
हैं| कहीं खाने की रेसिपी साझा कर रहे हैं तो कहीं ऐय्यासी के तरीके| हद है| मान
और ईमान से गिर चुके ऐसे लेखकों के पास न विरोध का साहस है और न ही प्रतिरोध का
विकल्प|
कोई इन्हें साहित्यकार कह क्यों रहा है? यह प्रश्न आपको भले
न सही लगे, भले न दिखाई दे, मुझे दिखाई दे रहा है| 40 वर्ष के नीचे के
साहित्यकारों में ऐसा पागलपन तो समझ में आता है भला 50 से लेकर 80 वर्ष के
साहित्यकार भी इस आत्मालाप से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं? ये वही लोग हैं जो दिन
रात छाती पीट-पीटकर चिल्ला रहे हैं मीडिया सत्ता की गोद में बैठी है| ये वही लोग
हैं जो आए दिन कहते रहते हैं कि आम आदमी की परेशानियों को मीडिया क्यों नहीं दिखा
रही है?
मीडिया को दिन रात गाली देने वाले ऐसे लोग अपने कर्तव्यों
को किस तरह निभा रहे हैं...इस पर विचार करने की जरूरत है| विचार करने की जरूरत है
कि क्या वाकई साहित्य में प्रतिरोध की शक्ति है? यदि है तो फिर इन प्रचारकों को
किस कोटि में रखा जाएगा? ये प्रश्न ऐसे हैं जिनके दायरे में लगभग लोग आते दिखाई
देंगे...मैं भी इसी के इर्द-गिर्द उपस्थित हूँ, इसमें कोई दो राय नहीं है|
फेसबुक और व्हाट्सएप के दौर से यही कुछ उम्मीद थी| यही कुछ
होना था इधर की अति सक्रियता से| कुछ व्यवहार छिपा हुआ था साहित्यकारों का लेकिन
इधर सब नंगे हुए हैं| कपडे उतारकर टहल रहे हैं| कोई ज़िम्मेदारी नहीं है| कोई
कर्तव्यबोध नहीं है| अपराध है| भ्रष्टाचार है| दुर्व्यवहार है| व्यभिचार है| जो
साहित्यकार इन सभी के प्रतिरोध में होने चाहिए वह सब इनके समर्थन में हैं|
इधर कोरोना ने सब कुछ बदल दिया है| बहुत कुछ तहस-नहस कर
दिया है| हमारे स्वप्न हमारी इच्छाएं सब हवा हो गयी हैं| अभिलाषा तो कुछ रही ही
नहीं दो वक्त की रोटी को छोड़ कर| सरकार अपनी मस्ती में मस्त है| साहित्यकार अपनी
मस्ती में व्यस्त हैं| तो सवाल है कि विकल्प क्या है हमारे पास? संघर्ष का,
प्रतिरोध का और प्रतिशोध का भी? पूंजीपतियों से क्या अपेक्षा? क्या अपेक्षा
धनपशुओं से? जनता लावारिस थी, लावारिस है और लावारिस ही रहेगी, क्या यह मान लिया
जाए?
हम ऐसा भी नहीं मान कर चल सकते| फिर? जनता को अपना मार्ग
स्वयं चुनना है| कोई उसकी सहायता के लिए नहीं आने वाला है| जो कुछ है वह सब
व्यापार है| प्रपंच है| लोभ है| जो बोलेंगे वे मारे जाएंगे| न बोलने का एक ही
तरीका है कि सूची में शामिल हो जाओ| जश्न मनाओ| नहीं होते हो तो सूची बनाने वाले
का विरोध करो, बहिष्कार करो| नाम भी होगा और प्रशंसा भी मिलेगी|
इन सबके अतिरिक्त और चाहिए भी क्या इधर के साहित्यकारों को?
अब निराला, नागार्जुन, मुक्तिबोध का समय नहीं है| संघर्ष और प्रतिरोध के रास्ते पर
कब्ज़ा करके प्रचारकों को जनवादी और मानवतावादी बनाने का दौर है यह| यह दौर फेसबुक
कवि-सूची और व्यंग्यकार सूची में शामिल होने का दौर है|
Friday, 4 September 2020
दुनिया ऐसी ही है इधर की
Wednesday, 2 September 2020
बिम्ब-प्रतिबिम्ब सृजन संस्थान, फगवाड़ा, पंजाब का पहला आयोजन
प्रेस विज्ञप्ति-
हिंदी दिवस के उपलक्ष्य में बिम्ब-प्रतिबिम्ब सृजन संस्थान, फगवाड़ा, पंजाब का प्रथम ऑनलाइन हिंदी भाषण प्रतियोगिता का आयोजन किया जा रहा है| आप सभी सादर आमंत्रित हैं| यह निर्णय संस्थान के निदेशक अनिल कुमार पाण्डेय और अध्यक्ष श्री दिलीप कुमार पाण्डेय द्वारा आज की बैठक में लिया गया|
विचार इस बात पर भी किया गया कि इस आयोजन में वही भाग ले सकेंगे जो उम्र में 25 वर्ष से कम होंगे| इसके लिए प्रतिभागी को अपना जन्म-प्रमाण पत्र भी देना होगा| कोरोना प्रभाव के कारण प्रतियोगिता का आयोजन 13
सितम्बर को ऑनलाइन रखा जाएगा| समय और शर्तें आपको प्रतियोगिता के एक हफ्ते पहले बता दी जाएँगी|
इस आयोजन में हिंदी भाषा एवं साहित्य के वर्तमान स्थिति पर चर्चा-परिचर्चा होना सुनिश्चित हुआ है| कुछ विषय दिए जाएंगे और प्रतिभागी को उन्हीं विषयों को केन्द्र में रखकर अपना विचार रखना होगा| इस प्रतियोगिता में कुल तीन पुरस्कार दिए जाएंगे
प्रथम पुरस्कार : रुपये 1500
द्वितीय पुरस्कार : रुपये 1000
तृतीय पुरस्कार : रुपये 500
इसके अतिरिक्त समकालीन हिंदी कविता के
महत्त्वपूर्ण कवि राजेश जोशी के चयनित कविताओं के संग्रह ‘कवि ने कहा’
कवि मदन कश्यप के चयनित कविताओं के संग्रह ‘कवि ने कहा’
कवि श्रीप्रकाश शुक्ल के चयनित कविताओं का संग्रह ‘कवि ने कहा’ की एक-एक प्रति और
‘रचनावली’ त्रैमासिक पत्रिका की वार्षिक सदस्यता
साथ-साथ संस्थान द्वारा प्रमाण-पत्र भी दिया जाएगा| नकद राशि प्रतियोगिता के एक हफ्ते के अंतराल में सीधे अकाउंट में प्रेषित किया जाएगा जबकि काव्य-संग्रह की प्रति और संस्थान का प्रमाण पत्र कोरियर द्वारा प्रेषित किया जाएगा| इस हेतु आपका सहयोग अपेक्षित होगा|
इस प्रतियोगिता के लिए एक निर्णायक मण्डल होगा जिसका अंतिम निर्णय ही सर्वमान्य होगा| यह कार्यक्रम गूगल मीट पर आयोजित किया जाएगा| प्रतियोगिता के सन्दर्भ में शेष सूचनाएं आपको जल्द ही दी जाएँगी| तब तक बने रहें सृजन संस्थान के साथ|
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Thursday, 27 August 2020
पांजाब में साहित्य की अलख जगा रहे हैं यू०पी०पूर्वांचल के होनहार युवा अनिल पांडेय
संस्था हो, और उसका एक मजबूत व सांगठनिक ढांचा हो, जिसके अंतर्गत साहित्य व समाज के लिए कुछ बेहतर करने का मौका मिल सके, हालाँकि इस कार्य योजना पर तभी से कार्य आरंभ किया जा चुका था। किंतु अनेक आर्थिक व सामाजिक परिस्थितियों के कारण इसे मूर्त रूप दे पाने में कुछ अड़चनें आ रही थी, परंतु अब समय अपनी सही गति से आगे बढ़ रहा है, साथ ही अनेक साहित्यिक व सामाजिक संस्थाओं व समाज के प्रबुद्ध वर्ग खासकर मीडिया, व अनेक साहित्यकारों बुद्धिजीवियों एवं स्वयंसेवी संथाओं के सहमति से संस्था के सांगठनिक ढांचे को मूर्त रूप दिए जाने का कार्य आज सम्पन्न किया गया।
विपरीत परिस्थितियों में भी यह संस्था अपने कार्यों नियमो के अंतर्गत साहित्यिक और सामाजिक क्षेत्र में अपना विशेष योगदान देती रहेगी | संस्था के संस्थापक अध्यक्ष का कार्यभार श्री दिलीप कुमार पाण्डेय जी को सौंपते हुए उन्होंने यह विश्वास जताया कि इनके नेतृत्व में यह संस्था अपने मूल उद्देश्यों पर अडिग रहते हुए उत्तरोत्तर गतिशील बनी रहेगी।
साहित्य, संस्कृति और समाज-हित के लिए सक्रिय रहेगा संस्थान : अनिल पाण्डेय
26 अगस्त, 2020 को बिम्ब-प्रतिबिम्ब सृजन संस्थान, फगवाड़ा, पंजाब की नींव रखी गयी| संस्थान के संस्थापक निदेशक अनिल पाण्डेय ने संस्थान की अध्यक्षता श्री दिलीप कुमार पाण्डेय को सौंपी| संस्थान के प्रथम सांगठनिक मीटिंग में यह निर्णय लिया गया कि यह संस्था साहित्य, संस्कृति और समाज के क्षेत्र में कार्य करने के लिए प्रतिबद्ध होगी| रचनावली और बिम्ब-प्रतिबिम्ब पत्रिका का
प्रकाशन तो इस संस्था के अंतर्गत होगा ही बिम्ब-प्रतिबिम्ब प्रकाशन का कार्य भी इस संस्थान के अंतर्गत किया जाएगा| यह संस्था जरूरतमंद लोगों के लिए एक आश्रयदाता के रूप में कार्य कर सके, इसको लेकर भी कुछ निर्णय लिए गए|
यह भी सुनिश्चित हुआ कि संस्थान का एक पुस्तकालय होगा जिसमें विशेष सदस्यता के
तहत विभिन्न विषयों की पुस्तकें पढ़ी जा सकेंगी| संस्थान के निदेशक अनिल पाण्डेय का
कहना था कि “हम अपने कर्तव्यों के निर्वहन में कभी कोई कमी नहीं आनें देंगे|
विपरीत परिस्थितियों में भी इस संस्था के अंतर्गत साहित्यिक और सामाजिक क्षेत्र
में कार्य किया जाता रहेगा|” संस्थान के अध्यक्ष का कार्यभार श्री दिलीप कुमार
पाण्डेय को सौंपते हुए उन्होंने यह विश्वास जताया कि इनके नेतृत्व में यह संस्थान
अपने उद्देश्यों में सफल सिद्ध होगा|
संस्थान के अध्यक्ष श्री दिलीप कुमार पाण्डेय ने कहा कि “जो भी साहित्य प्रेमी और सामाजिक कार्यकर्ता हमारे संस्थान से जुड़कर कार्य करना चाहते हैं, उनका हर समय स्वागत है| बगैर किसी गुटबंदी और दलबंदी के यह संस्था कार्य करेगी और सबके साथ चलते हुए एक नए परिवेश के निर्माण में अपना सर्वश्रेष्ठ देगी|”
कोरोना के इस दौर में बहुत कम लोगों की उपलब्धता में यह बैठक आयोजित हुई
जिसमें संस्थान के निदेशक अनिल पाण्डेय, अध्यक्ष श्री दिलीप कुमार पाण्डेय, वित्त-सचिव
परमजीत कुमार, शहर के ख्यातनाम ग़ज़लकार मनोज फगवाडी, श्री अशोक खुराना प्रीतम
पाण्डेय उपस्थित रहे| बैठक के अंत में यह भी निर्णय लिया गया अभी बहुत कम संख्या
में ही सही कम से कम 15 दिन में एक बैठक संस्थान की होगी जिसमें नामित सदस्यों का
होना जरूरी होगा| विस्तृत पदाधिकारियों के नाम की सूची जल्द ही दी जाएगी|





















